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बाजार में पिट गया सब्जियों का ‘राजा’, ये है पिछले पांच सालों का रिकॉर्ड

Mon, 20 Feb 2017 09:53 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ Updated Mon, 20 Feb 2017 09:53 AM IST
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king of vegetable rate goes down
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

इस साल सब्जियों का ‘राजा’ यानी आलू बाजार में बुरी तरह पिट गया है। पिछले साल के मुकाबले कीमत आधी रह गई है, जो पांच साल में सबसे निचले स्तर पर है। पिछले साल आलू 900 रुपये प्रति क्विंटल बिका था, लेकिन इस सीजन में 450 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर कीमत नहीं गई। जानकार बंपर पैदावार और बढ़े हुए रकबे को कारण मान रहे हैं। वहीं किसान बड़े नुकसान में चले गए हैं। उनकी लागत तक नहीं निकली है।

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वेस्ट यूपी में गन्ने के बाद आलू की खेती की जाती है। यहां पर किसान गन्ने के साथ-साथ आलू को भी नकदी फसल मानते हैं। लेकिन इस साल हाल खराब है। पूरे प्रदेश में आलू के दाम कम हैं। नोटबंदी के बाद किसानों को आलू से आर्थिक मदद मिलने की संभावना थी, लेकिन उनकी लागत तक नहीं निकली। अगर पिछले वर्ष की तुलना करें तो दाम आधे ही रह गए। खुदाई के समय आलू के दाम पिछले साल 450 रुपये से 550 रुपये कट्टा (50 किलो) था। इस बार आलू के दाम 200 रुपये से 225 रुपये ही रह गया है। अभी किसानों को उम्मीद है कि कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने के बाद कुछ महीने बाद दाम बढ़ सकते है, लेकिन आगे का सीजन भी पिट गया तो उन्हें काफी नुकसान होगा।
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पिछले पांच वर्षों में कीमत
2013           300 से 375
2014           250 से 320
2015           280 से 330
2016          400 से 500
2017          200 से 225
नोट: दाम प्रति कट्टे (50 किलो) में खुदाई के समय के दिए गए हैं।

पिछले साल महंगा बिका था बीज
किसानों की मानें तो पिछले साल बीज महंगा बिका था। किसानों को उम्मीद थी कि आलू 1 हजार रुपये क्विंटल तक बिक जाएगा। अक्तूबर तक आलू का बीज 600 से 700 तक पहुंच गया था। नोटबंदी होते ही दाम ऐसे गिरे कि आलू का बीज फ्री देना पड़ा। मोदीपुरम के राजकीय शीतगृह केंद्र पर तो सिर्फ कट्टे के ही पैसे लिए गए।
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यहां ज्यादा होती है खेती
मेरठ, हापुड़, गाजियाबाद, मुरादाबाद, रामपुर, संभल, बिजनौर, हाथरस, बदायूं, मथुरा, आगरा, फर्रुखाबाद, शिकोहाबाद, एटा, इटावा, मैनपुरी, पीलीभीत, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, संभल, अलीगढ़, बरेली, शाहजांहपुर आदि जनपदों में आलू की खेती बड़े स्तर पर होती है।

पैदावार और रकबा बढ़ गया
पिछली साल से इस बार दस प्रतिशत अधिक रकबे में आलू की खेती की गई है। वहीं प्रति बीघा आलू की पैदावार भी अधिक हुई है। कहीं-कहीं तो एक बीघा में सवा गुना अधिक फसल हुई है। मौसम साफ रहने और पाला कम गिरने के कारण फसल अच्छी हुई।

पानी और खाद हुए महंगे
पिछले पांच साल की तुलना में इस साल पानी और खाद दोनों ही महंगे हो गए हैं। आलू के रेट तो कम हो गए लेकिन लागत बढ़ गई है। इससे किसानों को दोहरी मांग पड़ रही है।

न्यूनतम दर तय हो
आलू की फसल के लिए भी न्यूनतम दर तय होनी चाहिए। जब फसल बाजार में आती है तो दाम कम हो जाता है। अगर न्यूनतम दर तय हो जाएगी तो किसानों को भी लाभ होगा। इस बार आलू के दाम बहुत ही कम हैं।

- भोपाल सिंह किसान फंफूड़ा

किसानों को नुकसान
वेस्ट यूपी में गन्ने के साथ-साथ आलू की खेती भी बड़े स्तर पर होती है। दाम कम होने से किसानों को नुकसान हो रहा है। अगर आगे भी दाम ऐसे ही कम रहे तो मुश्किलें और भी बढ़ जाएंगी।
- डॉ. आरएस सेंगर, वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक, कृषि विवि

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