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कैराना उपचुनाव: अखिलेश ने एक तीर से साधे दो निशाने, मुस्लिम, दलित, जाट समीकरण पर खेला दांव

Mon, 07 May 2018 10:56 AM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, आनंद प्रकाश, शामली
यूपी डेस्क, अमर उजाला, आनंद प्रकाश, शामली Updated Mon, 07 May 2018 10:56 AM IST
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Kairana byelection: Alliance between SP-BSP and RLD, अखिलेश ने दांव लगाया
फाइल फोटो

प्रत्याशी सपा का और चुनाव चिन्ह रालोद का, कैराना उप चुनाव में सपा, बसपा और रालोद गठबंधन ने मुस्लिम, दलित और जाट समीकरण पर दांव खेला है। एक तीर से दो निशाने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने साधे हैं। उनके इस दांव से उप चुनाव में गठबंधन प्रत्याशी की हारजीत के साथ रालोद की प्रतिष्ठा भी जुड़ गई है, साथ ही  2014 के आम चुनाव में भाजपा के पाले में चले गए जाट वोटों को तबस्सुम को दिलाने की भी चुनौती है। 

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गठबंधन का यह फार्मूला काफी चौंकाने वाला रहा है, साथ ही राजनीतिक हल्कों में इसके नफे नुकसान को लेकर भी मंथन शुरू हो गया है। कैराना में विधान सभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव, यहां बाबू हुकुम सिंह और पूर्व सांसद मुनव्वर हसन परंपरागत प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। मुनव्वर हसन के निधन के बाद 2009 लोकसभा चुनाव में उनकी पत्नी तबस्सुम बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ी थीं और भाजपा प्रत्याशी हुकुम सिंह को हराकर सांसद बनी थीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में कैराना से तबस्सुम के बेटे नाहिद हसन सपा के टिकट पर चुनाव लड़े, उन्हें भाजपा प्रत्याशी हुकुम सिंह ने हरा दिया था। हुकुम सिंह के इस्तीफे से रिक्त हुई विधानसभा सीट पर हुए उप चुनाव में नाहिद हसन भाजपा प्रत्याशी अनिल चौहान को हराकर विधायक बने। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी नाहिद हसन ने सपा के टिकट पर कैराना सीट से चुनाव लड़ा और भाजपा प्रत्याशी और हुकुम सिंह की पुत्री मृगांका सिंह को हराकर जीत दर्ज की। शुक्रवार को सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी के बीच लखनऊ में हुई वार्ता के बाद यह तय हो गया था कि सपा बसपा गठबंधन में रालोद भी शामिल हो रहा है। इसमें कैराना से सपा और नूरपुर से रालोद प्रत्याशी को चुनाव लड़ाने की बात सामने आई थी, सपा से तबस्सुम का नाम सामने आया, लेकिन इससे ध्रुवीकरण होने का अंदेशा भी था, देर रात मंथन के बाद यह तय हुआ कि रालोद के चुनाव चिन्ह पर तबस्सुम को लड़ाया जाए तो रालोद का परंपरागत जाट मतदाता भी उनके साथ जुड़ जाएगा। कुछ सपा नेताओं का भी मानना था कि रालोद को सीट देने से ध्रुवीकरण नहीं होगा। दलित और मुस्लिम मतों में जाट मतदाताओं के मिलने से एक मजबूत समीकरण बनेगा। रालोद के प्रदेश प्रवक्ता सुनील रोहटा ने बताया कि तबस्सुम हसन को गठबंधन की तरफ से कैराना लोकसभा सीट पर प्रत्याशी बनाना तय हो गया है।
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पढ़ें : कैराना उपचुनाव 2018: भाजपा ने दलितों और पिछड़ों के बीच उतारे नेता

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बिखरे समीकरण को संजोना है मकसद

Kairana byelection: Alliance between SP-BSP and RLD, अखिलेश ने दांव लगाया
फाइल फोटो

वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगे के बाद रालोद का जाट-मुसलिम गठजोड़ बिखर गया था। जाट बिरादरी का वोट बड़ी संख्या में भाजपा की तरफ चला गया था। यही वजह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कैराना सीट पर रालोद प्रत्याशी करतार भड़ाना को महज 42,706 वोट मिल पाए थे। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में भी कैराना सीट पर रालोद प्रत्याशी अनिल चौहान 19,903 वोट लेकर तीसरे,  शामली सीट पर बिजेंद्र मलिक 33,551 वोट लेकर तीसरे और थानाभवन सीट पर भी रालोद प्रत्याशी जावेद राव 31,275 वोट लेकर तीसरे स्थान पर ही रहा था। इसी के चलते रालोद ने अपने पुराने गठजोड़ को जीवंत करने के लिए शामली और मुजफ्फरनगर में सामाजिक समरसता सम्मेलन किए। पूर्व सांसद अमीर आलम, पूर्व चेयरमैन अशरफ अली खान को रालोद में शामिल करके भी यही संदेश दिया था। अब कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव में तबस्सुम हसन को प्रत्याशी बनाया गया है। देखने वाली बात यह होगी कि रालोद द्वारा किए गए प्रयास और प्रत्याशी के चयन में अपनाए गए नए फार्मूले से गठबंधन को कितना फायदा होता है और कितना नुकसान।  

हुकुम सिंह को मिले थे सबसे ज्यादा वोट  
कैराना लोकसभा सीट पर 2014 में हुए चुनाव में हुकुम सिंह विजयी हुए थे और उनको 5,65,909 वोट मिले थे। वहीं, सपा प्रत्याशी नाहिद हसन को 3,29,081, बसपा प्रत्याशी कंवर हसन को 1,60,414 और रालोद प्रत्याशी करतार भड़ाना को 42,706 वोट मिले थे। इन तीनों ही प्रत्याशियों के वोटों को जोड़ा जाए तो 5,32,201 वोट बैठते हैं। इस लिहाज से भाजपा प्रत्याशी को तीनों पार्टियों से 33,708 वोट ज्यादा प्राप्त हुए थे।

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