हाशिमपुरा दंगा: 31 साल बाद पीड़ितों को मिला इंसाफ, दिलों में आज भी जिंदा है वो खौफनाक दर्द
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फरवरी 1986 में केंद्र सरकार ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने का आदेश दिया, तो वेस्ट यूपी में माहौल गरमा गया था। इसके बाद 14 अप्रैल 1987 से मेरठ में धार्मिक उन्माद शुरू हुआ। कई लोगों की हत्या हुई, तो दुकानों और घरों को आग के हवाले कर दिया गया था। हत्या, आगजनी और लूट की वारदातें होने लगीं। इसके बाद भी मेरठ में दंगे की चिंगारी शांत नहीं हुई थी। मई का महीना आते-आते कई बार शहर में कर्फ्य जैसे हालात हुए और कर्फ्यू लगाना भी पड़ा।
जब माहौल शांत नहीं हुआ और दंगाई लगातार वारदात करते रहे, तो शहर को सेना के हवाले कर दिया गया था। इसके साथ ही बलवाइयों को काबू करने के लिए 19 और 20 मई को पुलिस, पीएसी तथा सेना के जवानों ने सर्च अभियान चलाया था।
हाशिमपुरा के अलावा शाहपीर गेट, गोला कुआं, इम्लियान सहित अन्य मोहल्लों में पहुंचकर सेना ने मकानों की तलाशी लीं। इस दौरान भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक सामग्री मिली थीं। सर्च अभियान के दौरान हजारों लोगों को पकड़ा गया और गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था। इसी दौरान 22 मई की रात हाशिमपुरा कांड हुआ।
हापुड़ रोड पर गुलमर्ग सिनेमा के सामने हाशिमपुरा मोहल्ले में 22 मई 1987 को पुलिस, पीएसी और मिलिट्री ने सर्च अभियान चलाया था। आरोप था यहां रहने वाले किशोर, युवक और बुजुर्गों सहित कई सौ लोगों को ट्रकों में भरकर पुलिस लाइन ले जाया गया था।
एक ट्रक को दिन छिपते ही पीएसी के जवान दिल्ली रोड पर मुरादनगर गंग नहर पर ले गए थे। उस ट्रक में करीब 50 लोग थे। वहां ट्रक से उतारकर लोगों को गोली मारने के बाद एक एक करके गंग नहर में फेंका गया। कुछ लोगों को ट्रक में ही गोलियां बरसाकर ट्रक को गाजियाबाद हिंडन नदी पर ले गए।
उन्हें हिंडन नदी में फेंका गया था। इनमें से जुल्फिकार, बाबूदीन, मुजीबुर्रहमान, मोहम्मद उस्मान और नईम गोली लगने के बावजूद सकुशल बच गए थे। बाबूदीन ने ही गाजियाबाद के लिंक रोड थाने पहुंचकर रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिसके बाद हाशिमपुरा कांड पूरे देश में चर्चा का विषय बना।
साल दर साल अगली तारीख मिलने का दर्द
इस कांड के बाद अब जाकर पूरा हुआ इंतजार। अमर उजाला टीम ने फैसले के बाद हाशिमपुरा मोहल्ले में पहुंचकर उन लोगों से बातचीत की, जो घटना के पीड़ित हैं और गवाह हैं। इस मामले में गवाह जुल्फिकार का कहना है कि पुलिस के साथ ही प्रदेश सरकार ने भी परेशान किया। कार्रवाई के नाम पर पक्षपात हुआ। मैं खुद इसमें गवाह हूं। पुलिस और सरकार ने हमेशा से इस केस को कमजोर करने की कोशिश की, मगर हमने हिम्मत नहीं हारी और केस लड़ते रहे।
मृतक सिराज की बहन नसीम बानो और अमीर फातमा का कहना है कि उस घटना ने हमारा घर बर्बाद कर दिया। मैं और मेरी बहनें किस हालात में जिए, कितने सितम उठाए हैं वह किसी को बता नहीं सकते। सिराज हमारा इकलौता भाई था। उसकी हत्या करने वालों को सख्त सजा मिलनी चाहिए थी। मृतक कमरुद्दीन के पिता जमालुद्दीन का कहना है कि इंसाफ पाने के लिए इतनी लंबी लड़ाई कहीं नहीं देखी, न सुनी।
मृतक नईम के भाई शकील का कहना है कि सच्चाई कड़वी होती है, जो सरकार और पुलिस वालों ने दबाकर रखी। न्यायालय के चक्कर लगाते लगाते इतने साल बीत गए। इतने इंतजार के बाद ये फैसला आना दुर्भाग्यपूर्ण है। मृतक कमरुद्दीन के भाई शमशुद्दीन का कहना है कि अब इस फैसले का क्या करना हमें तो आज भी वो दिन याद है। तब से लेकर आज तक हम लोगों ने कितनी परेशानियां झेली, बस हम ही जानते हैं।
जहीर अहमद की पत्नी और जावेद की मां जरीना फैसले पर नाराजगी जताती हुई कहती हैं कि ऐसा लगता है वो घटना बस आज की है, एक एक दिन गिनकर काटे हैं। मेरे शौहर और बेटे को पुलिस वालों ने मारा था। तब मेरी गोद में चार दिन का बेटा था। आरोपियों को सजा मिलनी चाहिए थी।
मृतक मोहम्मद यासीन के बेटे इजहार का कहना है कि मेरे वालिद मोहम्मद यासीन तब करीब 55 साल के थे। उनकी हत्या करने वाले पीएसी के जवानों को कतई दर्द नहीं हुआ। आरोपियों को फांसी की सजा होनी चाहिए थी।
सदमे में चल बसे पिता, मां हो गई विक्षिप्त
हाशिमपुरा कांड में किसी परिवार से सगे भाईयों, किसी से पिता पुत्र और किसी की इकलौती औलाद की जान गई। हाशिमपुरा के लोग आरोप लगाते हुए कहते हैं कि शब्बीर का इकलौता बेटा सिराज भी पीएसी के जवानों ने मार दिया था।
सिराज की बहन नसीम बानो और अमीर फातमा ने बताया कि सिराज की मौत के सदमे में कुछ साल बाद पिता शब्बीर का इंतकाल हो गया, तो सिराज की मां रश्के जहां मानसिक संतुलन खो बैठी थी। काफी उपचार कराने के बाद भी वह ठीक नहीं हुई और वह भी चल बसीं।
इसके बाद परिवार मुसीबतों से घिरा रहा। कोई कमाने वाला नहीं बचा। वह चार बहनें थीं, जिसके चलते सिलाई-कढ़ाई का काम करके गुजर बसर की गई। भाई की मौत के बाद बाप और मां का इंतकाल होने पर नसीम बानो को उसके पति ने तलाक दे दिया। इसके अलावा जमील और उसके बेटे नसीम, जहीर व उसके बेटे जावेद तथा सगे भाई नौशाद और शमशाद की मौत का दर्द हाशिमपुरा कांड के पीड़ितों को हर दिन कराहने पर मजबूर करता है लेकिन इस कभी न खत्म होने वाले अपनों से बिछड़ने के दर्द के बीच दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले ने पीड़ितों के दिल को एक तसल्ली दी है।
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