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मेरठ में गूंजा हर हर मोदी, घर घर मोदी
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 12 Mar 2017 02:27 AM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
भाजपा ने प्रदेश में रिकॉर्ड सीटें जीतीं तो मेरठ में अब तक के इतिहास में सबसे बड़ी जीत दर्ज की। जिले की सात में से छह सीटों पर पार्टी ने जीत दर्ज की है। इससे पहले भाजपा सिर्फ दो बार चार-चार सीट जीती थी। इस जीत में सबसे अहम सिवालखास सीट पर फतह रही। भाजपा ने यहां पहली बार जीत दर्ज की है।
लोकसभा चुनाव में मोदी लहर का शोर चारों तरफ गूंज रहा था। लेकिन, विधानसभा चुनाव में सूबे में मोदी लहर के बीच भाजपा की इतनी बड़ी जीत का अंदाजा विरोधियों को भी नहीं था। केंद्र सरकार के ढाई साल के कार्यकाल के साथ ही हाल में हुई नोट बंदी को लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे थे। खुद भाजपाई भी नोटबंदी के बाद सकते में थे। प्रत्याशी चयन को लेकर भी बगावत, भितरघात चलने से भाजपा के स्थानीय नेता जीत को लेकर संशय में थे। मतदान के बाद भाजपाई जीत का दावा तो कर रहे थे, लेकिन उनके पास आंकड़े कम और सियासी भाषा ज्यादा नजर आ रही थी। मतगणना के बाद जो आंकड़े आए, उसने भाजपाइयों को भी चौंका दिया। भाजपा कैंट और सरधना पर जीत जहां पूरी तरह से मानकर चल रही थी तो हस्तिनापुर को लेकर भी आश्वस्त थी। लेकिन, किठौर, दक्षिण और सिवालखास पर संशय में थी। जबकि, शहर सीट को पूरी तरह हारी हुई मान रहे थे।
इनमें किठौर में सपा प्रत्याशी और मंत्री शाहिद मंजूर को लगातार चौथी जीत से रोकना आसान नहीं था। लेकिन, यहां हिंदू मतों के ध्रुवीकरण ने शाहिद मंजूर का पूरा गणित बिगाड़ दिया। बसपा के गजराज नागर भी अपनी गुर्जर बिरादरी को एकजुट नहीं कर सके। उनके पक्ष में सिर्फ दलित वोट ही एकजुट दिखा। दक्षिण सीट पर मुस्लिम बंटा तो भाजपा को जीत हासिल हुई। इनमें सिवालखास सीट सबसे ज्यादा अहम रही। यहां भाजपा ने पहली बार जीत दर्ज की। सिवालखास में भाजपा की जीत के पीछे अन्य बिरादरियों (गुर्जर, ठाकुर, ब्राह्मण, त्यागी, सैनी, कश्यप आदि) का एकजुट वोट पड़ा, वहीं जाट बिरादरी में भी सेंधमारी हुई। इससे भाजपा की जीत का रास्ता यहां साफ हो गया। कैंट में रिकार्ड जीत के पीछे बसपा की अंदरूनी राजनीति का लाभ जहां भाजपा प्रत्याशी को मिला तो कांग्रेस के रमेश धींगड़ा अकेले पंजाबी होने के बावजूद पंजाबी वोटों को पूरी तरह अपने पक्ष में नहीं कर पाये। यही नहीं, कैंट का दलित वोट बैंक भी बसपा के पक्ष में एकजुट नहीं हुआ। गोलाबढ़ जैसे दलित बहुल क्षेत्र में भाजपा को अच्छे वोट मिले।
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लोकसभा चुनाव में मोदी लहर का शोर चारों तरफ गूंज रहा था। लेकिन, विधानसभा चुनाव में सूबे में मोदी लहर के बीच भाजपा की इतनी बड़ी जीत का अंदाजा विरोधियों को भी नहीं था। केंद्र सरकार के ढाई साल के कार्यकाल के साथ ही हाल में हुई नोट बंदी को लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे थे। खुद भाजपाई भी नोटबंदी के बाद सकते में थे। प्रत्याशी चयन को लेकर भी बगावत, भितरघात चलने से भाजपा के स्थानीय नेता जीत को लेकर संशय में थे। मतदान के बाद भाजपाई जीत का दावा तो कर रहे थे, लेकिन उनके पास आंकड़े कम और सियासी भाषा ज्यादा नजर आ रही थी। मतगणना के बाद जो आंकड़े आए, उसने भाजपाइयों को भी चौंका दिया। भाजपा कैंट और सरधना पर जीत जहां पूरी तरह से मानकर चल रही थी तो हस्तिनापुर को लेकर भी आश्वस्त थी। लेकिन, किठौर, दक्षिण और सिवालखास पर संशय में थी। जबकि, शहर सीट को पूरी तरह हारी हुई मान रहे थे।
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इनमें किठौर में सपा प्रत्याशी और मंत्री शाहिद मंजूर को लगातार चौथी जीत से रोकना आसान नहीं था। लेकिन, यहां हिंदू मतों के ध्रुवीकरण ने शाहिद मंजूर का पूरा गणित बिगाड़ दिया। बसपा के गजराज नागर भी अपनी गुर्जर बिरादरी को एकजुट नहीं कर सके। उनके पक्ष में सिर्फ दलित वोट ही एकजुट दिखा। दक्षिण सीट पर मुस्लिम बंटा तो भाजपा को जीत हासिल हुई। इनमें सिवालखास सीट सबसे ज्यादा अहम रही। यहां भाजपा ने पहली बार जीत दर्ज की। सिवालखास में भाजपा की जीत के पीछे अन्य बिरादरियों (गुर्जर, ठाकुर, ब्राह्मण, त्यागी, सैनी, कश्यप आदि) का एकजुट वोट पड़ा, वहीं जाट बिरादरी में भी सेंधमारी हुई। इससे भाजपा की जीत का रास्ता यहां साफ हो गया। कैंट में रिकार्ड जीत के पीछे बसपा की अंदरूनी राजनीति का लाभ जहां भाजपा प्रत्याशी को मिला तो कांग्रेस के रमेश धींगड़ा अकेले पंजाबी होने के बावजूद पंजाबी वोटों को पूरी तरह अपने पक्ष में नहीं कर पाये। यही नहीं, कैंट का दलित वोट बैंक भी बसपा के पक्ष में एकजुट नहीं हुआ। गोलाबढ़ जैसे दलित बहुल क्षेत्र में भाजपा को अच्छे वोट मिले।
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