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एकल परिवार और कॉरपोरेट कल्चर में डिप्रेशन हावी
अमर उजाला ब्यूरों
Updated Tue, 19 Jul 2016 02:12 AM IST
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वर्तमान परिवेश में एकल परिवार का चलन बढ़ रहा है। शहरीकरण और विकास की दौड़ मेें संयुक्त परिवार हाशिए पर आ गए हैं। एकाकी जीवन और विचारों का आदान-प्रदान नहीं होने के कारण एकल परिवार के सदस्य डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। तनाव से बचने के लिए कुछ बच्चे नशे का सहारा ले रहे हैं, तो महिलाएं मानसिक बीमारियों से जूझ रही हैं। लाला लाजपत राय मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग की ओर से किए गए अध्ययन में एकल परिवार और कॉरपोरेट कल्चर को तनाव की बड़ी वजह माना जा रहा है।
58 फीसदी मरीज एकल परिवार से
मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग द्वारा एक साल तक ओपीडी में आने वाले मरीजों पर अध्ययन किया गया। 21 हजार से अधिक मरीज ओपीडी में आये जिसमें से 8629 मरीज डिप्रेशन से पीड़ित थे। उनकी काउंसिलिंग के दौरान पर्सनल लाइफ हिस्ट्री को जाना गया तो पता चला कि करीब 58 फीसदी मरीज एकल परिवार से संबंधित हैं।
तनाव की मुख्य वजह
तनाव के पीछे कारण घरेलू झगड़े या फिर एक-दूसरे के लिए समय ना देना है। जिसके चलते पहले झगड़े से शुरू हुई खींचतान तनाव तक जा पहुंची और एक स्थिति के बाद व्यक्ति डिप्रेशन में चला गया। मनोचिकित्सक डॉ. रवि राणा के नेतृत्व में हुए अध्ययन में सामने आया कि जिन परिवारों में दंपति नौकरी पेशा है या फिर कोई कारोबार करते हैं, उनके बच्चों में मानसिक बीमारियां ज्यादा हैं। क्योंकि ऐसे परिवार बच्चों को टाइम नहीं दे पा पाते। जिसके चलते बच्चे अपनी परेशानी को किसी से शेयर नहीं कर पाते हैं। अध्ययन में पता चला कि स्टडी का बोझ या फिर क्लास में किसी से लड़ाई होने की बात बच्चे अपने माता-पिता को नहीं बता पाये। जिसके चलते काफी समय तक डर में रहे और एक समय के बाद यह डर डिप्रेशन में बदल गया।
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1251 बच्चों की काउंसिलिंग
मनोचिकित्सा विभाग ने एक साल के दौरान 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की काउंसिलिंग की। इनमें से 80 फीसदी बच्चे ऐसे थे जो एकल परिवार में रहते हैं और उनके माता-पिता नौकरी करते हैं। बच्चों ने काउंसिलिंग के दौरान तनाव के पीछे स्टडी का बोझ ज्यादा बढ़ने व दूसरे स्टूडेंट्स के क्लास में आगे निकल जाने का जिक्र किया। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने यह बात अपने परिवार में किसी से शेयर की तो जवाब मिला कि उनके पास हमारी समस्या सुनने के लिए कभी पूरा समय नहीं होता है या फिर सुनने के बाद उसका समाधान नहीं बता पाए।
महिलाओं में ज्यादा डिप्रेशन
अध्ययन के अनुसार 8629 में से 4867 महिलाएं तो 3762 पुरुष डिप्रेशन के शिकार मिले। इनमें भी सबसे ज्यादा 20-40 आयु वर्ग के लोगों में सबसे ज्यादा डिप्रेशन मिला। जिनकी संख्या 4784 रही। खास बात यह रही कि शहर में रहने वाले लोग (पुरुष व स्त्री) सबसे ज्यादा डिप्रेशन के शिकार हैं। अध्ययन में 60 फीसदी से अधिक डिप्रेशन के मरीज शहरी थे, जबकि 40 फीसदी से कम ग्रामीण।
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58 फीसदी मरीज एकल परिवार से
मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग द्वारा एक साल तक ओपीडी में आने वाले मरीजों पर अध्ययन किया गया। 21 हजार से अधिक मरीज ओपीडी में आये जिसमें से 8629 मरीज डिप्रेशन से पीड़ित थे। उनकी काउंसिलिंग के दौरान पर्सनल लाइफ हिस्ट्री को जाना गया तो पता चला कि करीब 58 फीसदी मरीज एकल परिवार से संबंधित हैं।
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तनाव की मुख्य वजह
तनाव के पीछे कारण घरेलू झगड़े या फिर एक-दूसरे के लिए समय ना देना है। जिसके चलते पहले झगड़े से शुरू हुई खींचतान तनाव तक जा पहुंची और एक स्थिति के बाद व्यक्ति डिप्रेशन में चला गया। मनोचिकित्सक डॉ. रवि राणा के नेतृत्व में हुए अध्ययन में सामने आया कि जिन परिवारों में दंपति नौकरी पेशा है या फिर कोई कारोबार करते हैं, उनके बच्चों में मानसिक बीमारियां ज्यादा हैं। क्योंकि ऐसे परिवार बच्चों को टाइम नहीं दे पा पाते। जिसके चलते बच्चे अपनी परेशानी को किसी से शेयर नहीं कर पाते हैं। अध्ययन में पता चला कि स्टडी का बोझ या फिर क्लास में किसी से लड़ाई होने की बात बच्चे अपने माता-पिता को नहीं बता पाये। जिसके चलते काफी समय तक डर में रहे और एक समय के बाद यह डर डिप्रेशन में बदल गया।
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1251 बच्चों की काउंसिलिंग
मनोचिकित्सा विभाग ने एक साल के दौरान 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की काउंसिलिंग की। इनमें से 80 फीसदी बच्चे ऐसे थे जो एकल परिवार में रहते हैं और उनके माता-पिता नौकरी करते हैं। बच्चों ने काउंसिलिंग के दौरान तनाव के पीछे स्टडी का बोझ ज्यादा बढ़ने व दूसरे स्टूडेंट्स के क्लास में आगे निकल जाने का जिक्र किया। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने यह बात अपने परिवार में किसी से शेयर की तो जवाब मिला कि उनके पास हमारी समस्या सुनने के लिए कभी पूरा समय नहीं होता है या फिर सुनने के बाद उसका समाधान नहीं बता पाए।
महिलाओं में ज्यादा डिप्रेशन
अध्ययन के अनुसार 8629 में से 4867 महिलाएं तो 3762 पुरुष डिप्रेशन के शिकार मिले। इनमें भी सबसे ज्यादा 20-40 आयु वर्ग के लोगों में सबसे ज्यादा डिप्रेशन मिला। जिनकी संख्या 4784 रही। खास बात यह रही कि शहर में रहने वाले लोग (पुरुष व स्त्री) सबसे ज्यादा डिप्रेशन के शिकार हैं। अध्ययन में 60 फीसदी से अधिक डिप्रेशन के मरीज शहरी थे, जबकि 40 फीसदी से कम ग्रामीण।