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न जमीन न खाद, सिर्फ 40 दिन में तैयार होगी हरी सब्जियां, पढ़ें इस टेक्नॉलॉजी की खासियत

Wed, 25 Jul 2018 10:59 AM IST
सुनील कैथवास, अमर उजाला, मेरठ
सुनील कैथवास, अमर उजाला, मेरठ Updated Wed, 25 Jul 2018 10:59 AM IST
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Do not waste land, green vegetables will be ready in just 40 days, read technology
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

बगैर जमीन, खाद, धूप और बिना मौसम के 40 दिनों में सब्जियां उग सकतीं हैं भला! वह भी इतनी साफ सुथरी और कि तोड़ो और बगैर धोए खा लो। कुछ ऐसा ही अनूठा काम मुजक्कीपुर निवासी विपेंदर सिंह कर रहे हैं। 

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दरअसल वह हाइड्रोपोनिक फार्मिंग पर काम कर रहे हैं जिसे नासा बेस्ड खेती कहा जा रहा है। खास बात यह है कि इस पद्घति से चालीस बाई आठ फीट के कंटेनर में इतनी फसल का उत्पादन हो सकेगा जितना एक बीघा जमीन में होता है। मोहिउद्दीनपुर मिल से दस किमी. दूर गांव मुजक्कीपुर निवासी विपेंदर सिंह ने सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कर रखा है। खेती के साथ लगभग 25 वर्ष तक ऑटोमेशन के काम में लगे रहे और कुछ अलग कर दिखाने के जुनून ने इन्हें हाइड्रोपोनिक फार्मिंग की और आकर्षित किया। विपेंदर ने गांव में एक एयर टाइट कमरे में कृत्रिम रोशनी, एयर कंडीशनर, कार्बन डाईआक्साइड जेनरेटर, आटो न्यूट्रिशन डिलीवरी सिस्टम, एयर प्यूरीफायर से खेती के लिये वातावरण तैयार किया।

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स्पेस सेंटर के लिए तकनीक

Do not waste land, green vegetables will be ready in just 40 days, read technology
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

इस टेक्नॉलॉजी की खोज स्पेस सेंटर में खेती के लिए हुई थी। 99 प्रतिशत बैक्टीरिया रहित इस खेती में 90 प्रतिशत पानी की बचत होती है। ये खेत ऐसे हैं कि इसके लिए जमीन की भी जरूरत नहीं है। एक एयर टाइट कंटेनर में किया जा सकता है। अभी इसका इस्तेमाल शिप, स्पेस सेंटर और सिंगापुर, टोकियो, लोअर मैनहट्टन जैसी जगहों पर हो रहा है।

ऐसे पैदा होती है फसल
फिलहाल विपेंदर का एक 40 बाई 8 फीट का कंटेनर इसके लिए बिल्कुल तैयार है। उसमें यह खेती हो रही है। विपेंदर बताते हैं कि इसमें फसल को उगाने के लिए उचित वातावरण की जरूरत होती है। कंटेनर में एसी लगे हैं। सप्लाई के लिए अलग से दस किलोवाट का सोलर प्लांट लगाया है। हैपा फिल्टरों से एयर फिल्टर करने के बाद ही भीतर जा रही है। पौधों को कार्बनडाईऑसाइड के लिए सिलेंडर लगाए हैं और जेनरेटर भी जो रोज 1500 पीपीएम कार्बन डाई आक्साइड देते हैं। यह नार्मल से तीन गुना ज्यादा है। टेबलेट भी है जो पानी में डालकर यह कमी पूरी करती है।

साल में आठ फसल
मिट्टी के स्थान पर एक्सपेंडेड क्ले की गोलियों को एक छोटे से गमले में डाला जाता है। फिर बीज डालकर खनिज व पोषक तत्व के घोल को पानी के जरिये जरूरत के हिसाब से दी जाती है। कुछ पौधों को खनिज व पोषक तत्व भाप के जरिये दी जाती है। 40 फीट के कंटेनर में 7-8 बीघा खेती के बराबर फसल का उत्पादन का दावा है एक फसल करीब 35-40 दिन में तैयार होती है इस तरह एक साल में आठ से दस फसल उगा सकते हैं।

Do not waste land, green vegetables will be ready in just 40 days, read technology
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

अब तक दो करोड़ खर्च
इस खेती में पैसा पानी की तरह बह रहा था। पूरे प्रयोग पर अब तक दो करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। इस प्रोजेक्ट के लिए विपेदर ने अपना मकान भी बेच दिया। 

यह है खासियत
- यह रोग रहित है
- तुरंत इसे काटकर कच्चा भी खाया जा सकता है
- इसमें जगह कम लगती है
- भविष्य में इस तरह की खेती की संभावनाएं विकसित हो रही हैं
- कंटेनर को कहीं भी ले जाया जा सकता है

कई जगह दिए हैं मॉडयूल
विपेंदर ने बताया कि वह कई जगह अब तक यह मॉडयूल दे चुके हैं। कई फाइव स्टार होटलों में इस प्रयोग को दिखा चुके हैं और आर्डर आए हैं। यही इस खेती के बाद आय का जरिया है।

लाइटों का खास महत्व
पौधों को सूरज की रोशनी का अहसास देने के लिए एलईडी लाइटें लगाई गई है। एक लाइट पांच गुणा पांच फीट एरिया कवर करती है। 18 घंटे यह रोशनी दी जाती है और 6 घंटे अंधेरा। पौधों को जितने कार्बनडाइआक्साइड की जरूरत है उतना ही जेनरेट किया जाता है। 99 प्रतिशत बैक्टीरिया रहित करने के लिये एयर प्यूरीफायर भी लगाया जाता है। आटो न्यूट्रिशन डिलीवरी सिस्टम से सभी पौधों को समान रूप से सही मात्रा में न्यूट्रिशन मिलता रहता है। इंटरनेट के जरिये रिमोट मॉनीटरिंग कर सकते हैं।

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