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मस्तक-गर्दन से लोहे का सरिया मोड़कर दिखाया यौगिक बल
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सीसीएसयू में व्यास समारोह का रहा दूसरा दिन
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विवि में ऑनलाइन व्यास समारोह में दूसरे दिन अन्तर्महाविद्यालय वाद-विवाद प्रतियोगिता एवं यौगिक बल का प्रदर्शन किया गया। वाद-विवाद प्रतियोगिता का विषय, हम महान सौभाग्य के लिए सत्य बोलें रहा।
पक्ष में दिव्या ने कहा कि सत्य को ही सौभाग्य का मूल मानते हुए कहा है कि सत्य के द्वारा ही मानसिक व आत्मिक बल प्राप्त होता है। सत्यपालक सत्कर्मों को करता हुआ सुख प्राप्त करता है। बाल्यकाल से ही सत्य का पालन करने के कारण युधिष्ठिर का रथ भूमि से दो हाथ ऊपर चलता था। ऐसी केवल सत्या की ही महिमा है। समेधा ने पक्ष रखा कि सत्य का पालन करने से ही सौभाग्य की प्राप्ति हो सकती है अन्यथा नहीं। विपक्ष में कीर्ति मिश्रा ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वर्तमान समाज में सत्य सभी का मूल है, ऐसा मानना केवल पुस्तकीय वार्ता है। भौतिक धरातल पर व्यवहार में सत्य कोई सहायता नहीं करता। सत्य के द्वारा सामान्य जीवन व्यापन संभव ही नहीं है। क्योंकि सत्यं अत्यधिक कटु होता है और सत्यवादी किसी का भी प्रिय नही होता। वंदना ने भी अपना पक्ष रखा।
द्वितीय सत्र में यौगिक बल प्रदर्शन डॉ. राजवीर आर्य के निर्देशन में हुआ। जिसमें मस्तक पर दीपक रखकर वज्रासन, गरुड़ासन, त्रिकोणासन जैसे अनेक आसन सिखाए। आसनों से होने वाले लाभ के बारे में जानकारी दी। बताया कि योग ही सभी बीमारियों को नष्ट करने वाली औषधि है। छात्रों ने मस्तक, गर्दन से लोहे के सरिये को मोड़ कर यौगिक बल प्रदर्शित कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। चलती मोटर साइकिल पर शीर्षासन करना और वेग से चलती मोटर साइकिल को एक हाथ से रोकना आदि दिखाया गया। निर्णायक के रूप में गोरखपुर के डॉ. चंद्रशेखर. सरिता रस्तौगी, डॉ. गीता शुक्ला मौजूद रहे। समारोह में डॉ. पूनम लखनपाल, डॉ. संतोष कुमारी, डॉ. राजवीर आर्य, डॉ. नरेंद्र कुमार मौजूद रहे।
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मेरठ। चौधरी चरण सिंह विवि में ऑनलाइन व्यास समारोह में दूसरे दिन अन्तर्महाविद्यालय वाद-विवाद प्रतियोगिता एवं यौगिक बल का प्रदर्शन किया गया। वाद-विवाद प्रतियोगिता का विषय, हम महान सौभाग्य के लिए सत्य बोलें रहा।
पक्ष में दिव्या ने कहा कि सत्य को ही सौभाग्य का मूल मानते हुए कहा है कि सत्य के द्वारा ही मानसिक व आत्मिक बल प्राप्त होता है। सत्यपालक सत्कर्मों को करता हुआ सुख प्राप्त करता है। बाल्यकाल से ही सत्य का पालन करने के कारण युधिष्ठिर का रथ भूमि से दो हाथ ऊपर चलता था। ऐसी केवल सत्या की ही महिमा है। समेधा ने पक्ष रखा कि सत्य का पालन करने से ही सौभाग्य की प्राप्ति हो सकती है अन्यथा नहीं। विपक्ष में कीर्ति मिश्रा ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वर्तमान समाज में सत्य सभी का मूल है, ऐसा मानना केवल पुस्तकीय वार्ता है। भौतिक धरातल पर व्यवहार में सत्य कोई सहायता नहीं करता। सत्य के द्वारा सामान्य जीवन व्यापन संभव ही नहीं है। क्योंकि सत्यं अत्यधिक कटु होता है और सत्यवादी किसी का भी प्रिय नही होता। वंदना ने भी अपना पक्ष रखा।
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द्वितीय सत्र में यौगिक बल प्रदर्शन डॉ. राजवीर आर्य के निर्देशन में हुआ। जिसमें मस्तक पर दीपक रखकर वज्रासन, गरुड़ासन, त्रिकोणासन जैसे अनेक आसन सिखाए। आसनों से होने वाले लाभ के बारे में जानकारी दी। बताया कि योग ही सभी बीमारियों को नष्ट करने वाली औषधि है। छात्रों ने मस्तक, गर्दन से लोहे के सरिये को मोड़ कर यौगिक बल प्रदर्शित कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। चलती मोटर साइकिल पर शीर्षासन करना और वेग से चलती मोटर साइकिल को एक हाथ से रोकना आदि दिखाया गया। निर्णायक के रूप में गोरखपुर के डॉ. चंद्रशेखर. सरिता रस्तौगी, डॉ. गीता शुक्ला मौजूद रहे। समारोह में डॉ. पूनम लखनपाल, डॉ. संतोष कुमारी, डॉ. राजवीर आर्य, डॉ. नरेंद्र कुमार मौजूद रहे।
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