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मतदान रुझान पर भारी पड़ा रिजर्वेशन
Updated Thu, 23 Nov 2017 03:38 AM IST
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राजदीप जाखड़
मेरठ। नगर निगम चुनाव में उम्मीद से कम मतदान होने के पीछे के कारणों में मुख्य मेयर सीट का आरक्षित होना माना जा रहा है। लोगों की वोट कटने और दिलचस्पी नहीं दिखाने के चलते आंकड़ा 51 फीसदी को भी नहीं छू सका। कम मतदान प्रतिशत के चलते मेयर प्रत्याशियों में खलबली है। फिलहाल सभी का भविष्य ईवीएम में कैद हो गया है। शहर की खिदमत करने की ताकत किसे मिलेगी एक दिसंबर को साफ होगा।
नगर निगम में महापौर का पद अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित होने के चलते चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे सूरमाओं के सपने चकनाचूर हो गए थे। पार्टी हाईकमान के फरमान के चलते इन नेताओं ने सक्रियता तो दिखाई, लेकिन पार्टी प्रत्याशी के लिए वोटरों को बूथ तक पहुंचाने के लिए ताकत नहीं लगाई। इसका असर रहा कि सामान्य वर्ग के वोटर ने बूथ से दूरी बनाए रखी। हालांकि जो वोटर पहुंचे, उन्हें बूथ तक पहुंचाने में पार्षद प्रत्याशियों का बड़ा हाथ रहा। पार्षद प्रत्याशी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए रहे। वे स्वयं और उनके समर्थक कॉलोनियों में पहुंचकर मतदान करने की अपील करते दिखाई दिए। पार्षद प्रत्याशी एक से दूसरे बूथ तक चक्कर लगाते रहे।
सामान्य और ओबीसी बहुल इलाकों में कम रहारुझान
सामान्य, ओबीसी बहुल इलाकों में मतदान के प्रति रुझान बेहद कम दिखाई दिया। गेटबंद कॉलोनियों से मतदाताओं ने बूथ तक पहुंचने में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई। वे दोपहर को या शाम को वोट डालने जाने की बात कहकर बहाना बनाते रहे। हालांकि दलित एवं मुस्लिम बहुल इलाकों के वोटरों में उत्साह दिखाई दिया। इनके बूथों पर सुबह से शाम तक लंबी-लंबी कतारें लगी रहीं।
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सामान्य होती सीट तो अलग दिखती रंगत
शहरवासियों का कहना है कि मेयर सीट अगर सामान्य होती तो चुनाव का रंग दूसरा होता। पार्टियों के धुरंधरों ने मेयर चुनाव की पूरी तैयारी कर रखी थी। पिछले एक साल से दावतों का दौर चल रहा था। समर्थकों और कार्यकर्ताओं को तैयार रहने के लिए बोला हुआ था। आरक्षण की घोषणा से सामान्य जाति के प्रत्याशियों के अरमानों पर पानी फिर गया। अपना टिकट नहीं होने पर न तो उन्होंने चुनाव में दिलचस्पी दिखाई और न ही कार्यकर्ताओें और समर्थकों में जोश भरा।
मुख्य बातें
सामान्य जाति में नहीं दिखाई दिया मतदान के प्रति ज्यादा रुझान
पार्षद प्रत्याशियों की मशक्कत के बाद ही बूथ तक पहुंचे मतदाता
कार्यकर्ता काटते रहे मतदाताओं के घरों के चक्कर
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मेरठ। नगर निगम चुनाव में उम्मीद से कम मतदान होने के पीछे के कारणों में मुख्य मेयर सीट का आरक्षित होना माना जा रहा है। लोगों की वोट कटने और दिलचस्पी नहीं दिखाने के चलते आंकड़ा 51 फीसदी को भी नहीं छू सका। कम मतदान प्रतिशत के चलते मेयर प्रत्याशियों में खलबली है। फिलहाल सभी का भविष्य ईवीएम में कैद हो गया है। शहर की खिदमत करने की ताकत किसे मिलेगी एक दिसंबर को साफ होगा।
नगर निगम में महापौर का पद अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित होने के चलते चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे सूरमाओं के सपने चकनाचूर हो गए थे। पार्टी हाईकमान के फरमान के चलते इन नेताओं ने सक्रियता तो दिखाई, लेकिन पार्टी प्रत्याशी के लिए वोटरों को बूथ तक पहुंचाने के लिए ताकत नहीं लगाई। इसका असर रहा कि सामान्य वर्ग के वोटर ने बूथ से दूरी बनाए रखी। हालांकि जो वोटर पहुंचे, उन्हें बूथ तक पहुंचाने में पार्षद प्रत्याशियों का बड़ा हाथ रहा। पार्षद प्रत्याशी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए रहे। वे स्वयं और उनके समर्थक कॉलोनियों में पहुंचकर मतदान करने की अपील करते दिखाई दिए। पार्षद प्रत्याशी एक से दूसरे बूथ तक चक्कर लगाते रहे।
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सामान्य और ओबीसी बहुल इलाकों में कम रहारुझान
सामान्य, ओबीसी बहुल इलाकों में मतदान के प्रति रुझान बेहद कम दिखाई दिया। गेटबंद कॉलोनियों से मतदाताओं ने बूथ तक पहुंचने में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई। वे दोपहर को या शाम को वोट डालने जाने की बात कहकर बहाना बनाते रहे। हालांकि दलित एवं मुस्लिम बहुल इलाकों के वोटरों में उत्साह दिखाई दिया। इनके बूथों पर सुबह से शाम तक लंबी-लंबी कतारें लगी रहीं।
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सामान्य होती सीट तो अलग दिखती रंगत
शहरवासियों का कहना है कि मेयर सीट अगर सामान्य होती तो चुनाव का रंग दूसरा होता। पार्टियों के धुरंधरों ने मेयर चुनाव की पूरी तैयारी कर रखी थी। पिछले एक साल से दावतों का दौर चल रहा था। समर्थकों और कार्यकर्ताओं को तैयार रहने के लिए बोला हुआ था। आरक्षण की घोषणा से सामान्य जाति के प्रत्याशियों के अरमानों पर पानी फिर गया। अपना टिकट नहीं होने पर न तो उन्होंने चुनाव में दिलचस्पी दिखाई और न ही कार्यकर्ताओें और समर्थकों में जोश भरा।
मुख्य बातें
सामान्य जाति में नहीं दिखाई दिया मतदान के प्रति ज्यादा रुझान
पार्षद प्रत्याशियों की मशक्कत के बाद ही बूथ तक पहुंचे मतदाता
कार्यकर्ता काटते रहे मतदाताओं के घरों के चक्कर