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बरसों पुरानी यादें संजोए मेरठ कॉलेज का जूलॉजी म्यूजियम
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बरसों पुरानी यादें संजोए है मेरठ कॉलेज का जूलॉजी म्यूजियम
- म्यूजियम ऑफ द वर्ल्ड ऑफ गिग जर्मनी में है दर्ज
मेरठ। मेरठ कॉॅलेज का जूलॉजी म्यूजियम वेस्ट यूपी में एक अलग ही पहचान रखता है। यहां पर बरसों पुराने मृत जीवों को संरक्षित करके रखा गया है। सन 1946 में बने जूलॉजी विभाग में इस म्यूजियम का उद्घाटन सन 1971 में हुआ था। ये सारे दुर्लभ जीव म्यूजियम में इससे पहले ही आ चुके थे। उस वक्त विभाग के प्रोफेसर, छात्र-छात्राएं और दूसरे लोग जंगलों से मृत जीवों को यहां लाकर संरक्षित करके रखते थे। सन 1972 में वन्य जीव अधिनियम बनने की वजह से यहां पर किसी भी मृत जीव को संरक्षित करके नहीं रखा गया।
यूजीसी से मिली ग्रांट के बाद जूलॉजी म्यूजियम को एक नई पहचान मिली है। यहां कसेरूकी और आकसेरूकी संरक्षित जंतुओं का अच्छा खासा संग्रह मौजूद है। बैल की अस्थियों का ढांचा हो या फिर ऊंट के शरीर की संरचना। महिला के शरीर के ढांचे से लेकर सन 1965 में जन्में दो सिर वाले बच्चे को यहां संरक्षित करके रखा गया है। इसके अलावा यहां पर सांप, बिच्छू, मेंढक, मछली का अच्छा खासा संग्रह है।
जूलॉजी के विभागाध्यक्ष डॉ. नीरज कुमार बताते हैं कि म्यूजियम में दूसरे कॉलेजों के छात्र-छात्राएं भी समय लेकर आ सकते हैं। म्यूजियम में छात्र-छात्राओं के लिए अच्छा संग्रह है। अब यहां रखे गए हजारों स्पेसीमैन के बारे में सारी जानकारी छात्र-छात्राओं को कंप्यूटर पर एक क्लिक में मिल जाती है। उस वक्त इन जंतुओं का रहन-सहन, प्रवृित्त, कौन कहां जंगल में कैसे मिला। इन सबकी जानकारी छात्रों को दी जाती है। जूलॉजी म्यूजियम का नाम म्यूजियम ऑफ द वर्ल्ड ऑफ गिग जर्मनी में दर्ज है।
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विशेष रसायनों के जरिए वर्षों तक रहते हैं संरक्षित
मृत जंतुओं को फार्मलीन और गिलिसरीन के अलावा विशेष रसायनों में रखा जाता है। जिसके चलते ये वर्षों तक उसी स्थिति में रहते हैं, जिस स्थिति में ये मिले थे। कुछ स्पेसीमैन पर जिंक ऑक्साइड और अन्य रसायनों का छिड़काव किया जाता है।
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- म्यूजियम ऑफ द वर्ल्ड ऑफ गिग जर्मनी में है दर्ज
मेरठ। मेरठ कॉॅलेज का जूलॉजी म्यूजियम वेस्ट यूपी में एक अलग ही पहचान रखता है। यहां पर बरसों पुराने मृत जीवों को संरक्षित करके रखा गया है। सन 1946 में बने जूलॉजी विभाग में इस म्यूजियम का उद्घाटन सन 1971 में हुआ था। ये सारे दुर्लभ जीव म्यूजियम में इससे पहले ही आ चुके थे। उस वक्त विभाग के प्रोफेसर, छात्र-छात्राएं और दूसरे लोग जंगलों से मृत जीवों को यहां लाकर संरक्षित करके रखते थे। सन 1972 में वन्य जीव अधिनियम बनने की वजह से यहां पर किसी भी मृत जीव को संरक्षित करके नहीं रखा गया।
यूजीसी से मिली ग्रांट के बाद जूलॉजी म्यूजियम को एक नई पहचान मिली है। यहां कसेरूकी और आकसेरूकी संरक्षित जंतुओं का अच्छा खासा संग्रह मौजूद है। बैल की अस्थियों का ढांचा हो या फिर ऊंट के शरीर की संरचना। महिला के शरीर के ढांचे से लेकर सन 1965 में जन्में दो सिर वाले बच्चे को यहां संरक्षित करके रखा गया है। इसके अलावा यहां पर सांप, बिच्छू, मेंढक, मछली का अच्छा खासा संग्रह है।
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जूलॉजी के विभागाध्यक्ष डॉ. नीरज कुमार बताते हैं कि म्यूजियम में दूसरे कॉलेजों के छात्र-छात्राएं भी समय लेकर आ सकते हैं। म्यूजियम में छात्र-छात्राओं के लिए अच्छा संग्रह है। अब यहां रखे गए हजारों स्पेसीमैन के बारे में सारी जानकारी छात्र-छात्राओं को कंप्यूटर पर एक क्लिक में मिल जाती है। उस वक्त इन जंतुओं का रहन-सहन, प्रवृित्त, कौन कहां जंगल में कैसे मिला। इन सबकी जानकारी छात्रों को दी जाती है। जूलॉजी म्यूजियम का नाम म्यूजियम ऑफ द वर्ल्ड ऑफ गिग जर्मनी में दर्ज है।
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विशेष रसायनों के जरिए वर्षों तक रहते हैं संरक्षित
मृत जंतुओं को फार्मलीन और गिलिसरीन के अलावा विशेष रसायनों में रखा जाता है। जिसके चलते ये वर्षों तक उसी स्थिति में रहते हैं, जिस स्थिति में ये मिले थे। कुछ स्पेसीमैन पर जिंक ऑक्साइड और अन्य रसायनों का छिड़काव किया जाता है।