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Mau News: पौराणिक और ऐतिहासिक धरोहरों को पर्यटन स्थल का मिले दर्जा तो विकास को मिले रफ्तार

Wed, 27 Sep 2023 12:29 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 27 Sep 2023 12:29 AM IST
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Tourist places in Mau
सरकार की तरफ से पौराणिक स्थलों तथा ऐतिहासिक धरोहरों को चिह्नित कर पर्यटन स्थल का दर्जा प्रदान कर विकसित करने का फरमान जारी किया गया है लेकिन पर्यटन विभाग सुधि नहीं ले रहा है। उचित रखरखाव न होने से जिले के कई ऐतिहासिक धरोहर अतिक्रमण का शिकार हो रहे हैं।
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हालांकि पूर्वांचल एक्सप्रेस वे, फोरलेन सहित कई प्रोजेक्ट आने के चलते कुछ हालात बदले हैं। जून 2023 तक जिले में 266122 पर्यटक विभिन्न पौराणिक, ऐतिहासिक स्थलों आदि का भ्रमण कर चुके हैं। विभाग की तरफ से पौराणिक, ऐतिहासिक धरोहरों का सुंदरीकरण कर पर्यटन स्थल का दर्जा प्रदान किया जाए तो हजारों युवाओं को प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष तरीके से रोजगार मिल सकता है। साथ ही जिले की विकास गति तेज हो सकी है।
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उपेक्षित हाल में है वनदेवी धाम पौराणिक स्थल
परदहां ब्लाक के कहिनौर गांव के समीप दक्षिण पश्चिमी दिशा में स्थित प्राचीन मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। यहां श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ता है। पूर्वांचल सहित विभिन्न जिलों से मत्था टेकने के लिए लोग आते रहते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजन- अर्चन करने पर सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
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जनश्रुतियों और भौगोलिक साक्ष्यों के आधार पर यह स्थान महर्षि बाल्मिकी की साधना स्थली रहा है। कहा जाता है कि जगत जननी सीता ने भी अपने अखंड पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए यहींं पर लवकुश को जन्म दिया था। इस प्रकार यह स्थान आदि पुरुष बाल्मिकी, मर्यादा पुरुषोत्तम राम तथा माता सीता से जुड़ा हुआ है।
पौराणिक स्थल होने के बाद भी उपेक्षित हाल में है। वनदेवी धाम के पास वन मनोरंजन पार्क बना है, लेकिन उचित रखरखाव के अभाव में बदहाल हो गया है। पार्क में सुविधाएं नगण्य होने से गैर जिलों से आए पर्यटकों को मायूस होना पड़ रहा है।
आस्था का केंद्र है देइया माई का मंदिर
रानीपुर ब्लाक क्षेत्र के रानीपुर मार्ग पर सिरियापुर स्थित देइया माई का मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है।यहां पूर्वांचल के विभिन्न जनपदों से श्रद्धालुओं रेला लगा रहता है। यहां हर रविवार और मंगलवार को भक्त मां को क़ड़ाही तथा पूजन अर्चन करने आते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मां का पूजन अर्चन करने से सभी मनोकामना पूरी हो जाती है। पौराणिक स्थल के सुंदरीकरण और पर्यटन के रूप विकसित करने की मांग उठती रही है। लेकिन अभी तक न तो जिला प्रशासन और न ही पर्यटन विभाग ने सुधि लेने की जहमत नहीं उठाई है।
इस संबंध में क्षेत्र के सूर्यप्रकाश यादव, महेंद्र सिंह, वीर बहादुर मौर्य, रामबदन प्रसाद का कहना है कि पौराणिक स्थल को पर्यटन स्थल का दर्जा प्रदान कर सुंदरीकरण कराए जाने के मामले में प्रशासनिक अधिकारियों को शिकायती पत्र दिया गया, लेकिन मामले को लटका दिया गया है।



खतरे में है महाभारतकालीन वट वृक्ष का अस्तित्व
रानीपुर ब्लाक क्षेत्र के कसारी गांव के पास तमसा नदी तट पर स्थित महाभारतकालीन पौराणिक विशाल वट वृक्ष शासन- प्रसाशन की उपेक्षा का दंश झेल रहा है। बताया जाता है कि पांडव अपने एक साल के अज्ञातवास का समय व्यतीत करने के लिए राजा विराट के महल विराटपृरी में नाम बदलकर शरण लिए थे।
जो वर्तमान में सदर तहसील क्षेत्र के वैराठपुर के नाम से जाना जाता है। अज्ञातवास के दौरान पांडव राजा विराट के महल से गायों को लेकर आते थे और इसी वटवृक्ष के नीचे बैठते थे। इसी कारण इस वटवृक्ष के पास तमसा नदी पर जो घाट है उसे गाय घाट के नाम से जाना जाता है।
महाभारतकालीन वटवृक्ष का देखरेख व शासन- प्रशासन की उपेक्षा के कारण अस्तित्व खतरे में है। वटवृक्ष की बरोह काफी मोटी है। बरसात या बाढ़ के समय वटवृक्ष के नीचे की मिट्टी बहकर नदी में चली जाती है। जिससे वटवृक्ष की जड़ें कमजोर होती जा रही हैं।
प्रबुद्ध वर्ग के लोगों की मानें तो वटवृक्ष के नीचे मिट्टी डलवाकर इसकी बाउंड्री करा दी जाए तो वट वृक्ष सुरिक्षत रहता। इस वट वृक्ष के बगल में करीयवा बाबा का धाम है। इस संबंध में में क्षेत्र के मदनलाल श्रीवास्तव, मुकुंद राय, अमर गुप्ता, विनोद श्रीवास्तव का कहना है कि महाभारतकालीन स्थल का सुंदरीकरण कर पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के मामले में प्रशासनिक अधिकारियों को शिकायती पत्र दिया गया, लेकिन आश्वासन के सिवाय कुछ भी हासिल नहीं हो सका।



आश्चर्यजनक है वटवृक्ष के पास नदी की जलधारा
सबसे आश्चर्य की बात है की तमसा नदी की धारा महाभारतकालीन विशाल पौराणिक वटवृक्ष के ठीक सामने पश्चिम दिशा से आई है और वटवृक्ष को स्पर्श करने के पश्चात तमसा नदी की धारा पूरब जाने की बजाय सीधे उतर दिशा की ओर जाने के बाद तब पूरब दिशा की ओर गई है।


उपेक्षित है भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली
जिला मुख्यालय से 40 किमी उत्तर वाराणसी-गोरखपुर नेशनल हाइवे पर स्थित गोंठा में भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली प्रशासनिक उपेक्षा के चलते अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। पर्यटन विभाग के उपेक्षा के चलते यह स्थली अपना अस्तित्व खोने के कगार पर पहुंच गई है। लोगों ने संबंधित विभाग के आला अधिकारियों को अवगत कराया बावजूद सुधि लेने की जहमत तक नहीं उठाई जा सकी है।

गोठा स्थित भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली आज भी लोगों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां देश विदेश से श्रद्धालु आते हैं। प्रशासनिक उपेक्षा के चलते गंतव्य तक पहुंचने में लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है। यहां पर पीपल का विशालकाय वृक्ष ही उनके यादों को समेटे है।
भगवान बुद्ध के भाई नंद यहीं पर शिष्य बने थे। आज भी यहां एक छोटे से मंदिर में श्रद्धालु गाय का दूध चढ़ाते हैं। मंदिर में नंद की मूर्ति स्थापित है। इसलिए इस मंदिर को नंद बाबा का मंदिर कहा जाता है। भगवान बुद्ध बिहार में सिद्धि प्राप्त करने करने के बाद पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उपदेश देने के लिए निकले।
जिले के दोहरीघाट क्षेत्र के गोठा गांव में एक टीले पर पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर प्रमुख शिष्यों को उपदेश दिया था। इसी स्थान पर बौद्ध भिक्षु, चिंतन और गोष्ठी किया करते थे। गोष्ठी केंद्र होने के कारण कालांतर में यह गोष्ठा अथवा गोठा बन गया। यहां के एक छोटे से मंदिर में एक लाट पर बोधिसत्व के रूप में गौतम बुद्ध की मूर्ति स्थापित है जो लगभग दो हजार वर्ष पूर्व बतायी जाती है।
इस संबंध में जयप्रकाश राय, हरिराम विश्वकर्मा, संत बहादुर,भरत कुमार, अवधेश प्रसाद का कहना है कि भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली होने के बावजूद इस स्थल को विकसित नहीं किया जा सका है। उन्होंने उपदेश स्थली को पर्यटन केंद्र का दर्जा देकर सुंदरीकरण कराए जाने की मांग की है।

प्रशासनिक उपेक्षा से खतरे में है नागवंशी किला का अस्तित्व
चिरैयाकोट कस्बा स्थित बाजार के दक्षिण छोर पर स्थित ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक नागवंशी किला चेरूवंश के शासन काल से जुड़े इतिहास की याद दिलाता है। राजस्व विभाग के रिकार्ड मे ऐतिहासिक धरोहर का दर्जा दिया गया है लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के चलते अतिक्रमण का शिकार है।
बताया जाता है कि चेरूवंश के शासन काल मे तत्कालीन नागवंशी राजाओं ने चिरैयाकोट इलाके मे कई निर्माण कराए थे। चिरैयाकोट बाजार के निकट स्थित नागवंशी कोट उनमें से एक है। जिसके नाम पर ही चिरैयाकोट कस्बा का नाम रखा गया है। यह कोट उस समय की विकसित शिल्प और हस्तकला का एक नायाब नमूना है।
लगभग 25 वर्षों से लगातार किले के चारों तरफ जारी अतिक्रमण के कारण किले का दायरा सिमटता जा रहा है। यही नहीं विभागीय मिलीभगत से एक निजी विद्यालय उसकी पूरी जमीन पर चलाया जा रहा है। पुरातत्व विभाग की तरफ से किले का अस्तित्व बचाने को लेकर कोई कदम नहीं उठाया जा सका है।

यही नही बेहतरीन शिल्पकला के बेजोड़ नमूने रहे किले के दरवाजों, खिड़कियों तथा दीवारों में जड़ी गई आकर्षक ईंटों और पत्थरों को भी अतिक्रमणकारी उजाड़ने लगे हैं। यही हाल रहा तो ऐतिहासिक धरोहर का अस्तित्व ही मिट जाएगा।
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