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Mau News: नकाब उतरता है या पहने ही सो जाते हो...

Thu, 18 Sep 2025 11:33 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 18 Sep 2025 11:33 PM IST
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Does the mask come off or do you fall asleep wearing it?
नगर के डीसीएसके पीजी कॉलेज में हिंदी पखवारा के अंतर्गत आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं में स्थान प
मऊ। नगर स्थित डीसीएसके पीजी कॉलज के सभागार में बृहस्पतिवार को हिंदी पखवाड़ा के तहत लोकरंग और कवि सम्मेलन का आयोजन प्राचार्य प्रो. शर्वेश पांडेय की अध्यक्षता में हुआ। प्रथम सत्र लोकरंग में कार्यक्रम की संयोजक प्रो. कंचन राय ने कजली सुनाकर समा बांध दिया है।
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हिंदी विभाग की छात्राओं निरमा, नीलम, कंचन यादव, मनीषा व पूजा ने लोकगीतों की प्रस्तुति दी। द्वितीय सत्र में काव्य-पाठ करते हुए युवा कवि सुमित उपाध्याय ने आज की आभासी दुनिया पर व्यंग्य करते हुए - नकाब उतरता है या पहने ही सो जाते हो पंक्तियां सुनाई। जबकि वरिष्ठ कवि दयाशंकर तिवारी ने - सड़क पर उतरकर मुखर आदमी करता है अपराध होकर निडर आदमी... सुनाया। नागेश शांडिल्य ने बचपन की याद दिलाते हुए - भले हुए ज्ञान में कच्चा बना देना, मां मुझे फिर से बच्चा बना देना... सुनाया। हास्य व्यंग्य के वरिष्ठ कवि बादशाह प्रेमी ने - जान से ज्यादा जानती है बीबी मेरी... पर हंसने को विवश कर दिया। ओज के कवि मिथिलेश गहमरी ने - न्यौछावर कर दो तन-मन वतन तुम्हें बुलाता है... सुनाया।
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भोजपुरी के गज़लकार डॉ. कमलेश राय - देखली हं सुधि के झोका क दरपन कबो-कबो... सुनाया। मृत्युंजय तिवारी ने - नफरतों की चल रही आंधियां... प्रस्तुत किया। अनुप्रिया राय अंतिमा ने - तो मां लिखती हूं... सुनाया। वरिष्ठ कवि जितेंद्र मिश्र काका ने - निरख रहा है लड़के वाले, लाडो थर- थर कांप रही है... की प्रस्तुति दी। बापूनंदन मिश्र डॉ. रामनिवास राय ने भी रचना सुनाई। अंत में निबंध, भाषण एवं लोकरंग प्रतियोगिताओं के विजेताओं एवं प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किया गया। प्रथम सत्र का संचालन अभय राय एवं काव्य सत्र का संचालन मिथिलेश गहमरी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. प्रद्युम्न ने किया। इससे पहले कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. सूर्यभूषण द्विवेदी ने किया। प्रो. शर्वेश पांडेय ने कहा कि हमारे देश का साहित्य प्राचीन है। हमारे साहित्य के विषय वस्तु को निष्कर्ष के बाद प्रस्तुत किया गया है। यह अलग बात है कि अभी तक गौरव बोध के अभाव में सही ढंग से भारतीय साहित्य की चर्चा नहीं हो पाई है। जब भी हिंदी साहित्य की बात करते हैं तो इसका मतलब पूरे भारतीय साहित्य की बात करते हैं। इस दौरान आनंद प्रताप सिंह, योगेंद्र सिंह, डॉ.चन्द्रप्रकाश राय, डॉ. आनंद द्विवेदी, डॉ .एसपी दीक्षित, तारकेश्वर शाही आदि रहे।
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