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इहलीला के मंच से अदृश्य हुए हरिगोविंद महाराज
अमर उजाला वृंदावन
Updated Mon, 25 Jul 2016 11:31 PM IST
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पद्मश्री से सम्मानित देश के प्रसिद्ध रासाचार्य का निधन
- फोटो : अमर उजाला
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रासलीला कला को विदेशोें तक पहचान दिलाने वाले देश के प्रसिद्ध रासाचार्य पद्मश्री स्वामी हरिगोविंद महाराज सोमवार को इहलीला मंच से हमेशा के लिए अदृश्य हो गए। वृंदावन के रमणरेती स्थित गोविंद विहार में अपने निवास पर दोपहर के समय उन्हाेंने अंतिम सांस ली। 91 वर्षीय स्वामी हरिगोविंद बीते कई दिन से बीमार चल रहे थे। हृदय गति रुकने उनका निधन हो गया। यह खबर मिलते ही जिले भर में शोक की लहर दौड़ गई।
भरतपुर, राजस्थान के गांव जनूथर में जन्मे स्वामी हरिगोविंद महाराज 1934 में आठ वर्ष की आयु में परिवार के साथ कान्हा की क्रीड़ास्थली वृंदावन आ बसे। यहां स्वामी किशनलाल से रासलीला की कला सीखी और रासलीला मंचन में रम गए। 1936 में पहली बार हरिगोविंद महाराज ने भगवान कृष्ण का अभिनय किया। उनकी यह प्रस्तुति लोगों ने वर्षों तक सराही। इसके बाद 1945 में स्वामी हरिगोविंद खुद की रासलीला मंडली बनाकर रासलीला विधा को आगे बढ़ाने के कार्य में जुट गए।
ये वो का दौर था जब यह रासलीला संपन्न परिवारों के आंगन तक ही सीमित थी लेकिन हरिगोविंद महाराज इसे आमलोगों के बीच खुले पंडाल में ले गए। 1960 और 1961 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान पर हरिगोविंद महाराज ने रासलीला मंडली का निर्देशन किया। यहां भारत के प्रमुख राजनेता उनके मुरीद हो गए। 91 वर्ष की आयु में भी स्वामी हरिगोविंद का रासलीला के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ। 2016 के ही उज्जैन कुंभ में उन्होंने रासलीला का निर्देशन किया। अंतिम सांस तक वे रासलीला को नई ऊंचाई देने में जुट रहे।
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2006 में मिला पद्मश्री सम्मान
स्वामी हरिगोविंद महाराज को सबसे पहले 1972 में संगीत नाटक अकादमी दिल्ली की ओर से सम्मानित किया गया। 1978 में कर्नाटक के राज्यपाल ने बैंगलोर में सम्मानित किया। 1979 में संगीत नाटक अकादमी उत्तर प्रदेश और 1999 में मध्य प्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय तुलसी सम्मान से नवाजा। कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाओं को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2006 में उन्हें पद्मश्री सम्मान की देने घोषणा की। तत्कालीन राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों राष्ट्रपति भवन में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया।
अंतिम समय श्रीधाम में बिताने की रही इच्छा
स्वामी हरिगोविंद महाराज के पौत्र रजनीश शर्मा ने बताया कि बीते 15 दिनों से हरिगोविंद महाराज मथुरा के नयति हास्पीटल में भर्ती थे। उपचार के दौरान ही उन्होंने अंतिम समय श्रीधाम वृंदावन में बिताने की इच्छा जाहिर की। इस पर परिवारीजन उन्हें रविवार को वृंदावन स्थित निज निवास पर लेकर आए। यहां सोमवार को दोपहर में करीब तीन बजे उन्होंने देहत्याग किया।
चैतन्य गौरांग लीला के जनक
रासलीला विधा को विदेशों तक पहचान दिलाने वाले पद्मश्री हरिगोविंद महाराज चैतन्य गौरांग लीला के जनक माने जाते हैं। स्वामी हरिगोविंद ने रासलीला के साथ ही देश में पहली बार चैतन्य गौरांग लीला की प्रस्तुति आम जनता के सामनेे रखी। बताया जाता है कि स्वामी हरिगोविंंद की चैतन्य गौरांग लीला का मंचन दर्शकों को भावविभोर कर देता था। अपनी जीवन यात्रा में उन्होंने पूरे भारत देश के साथ ही थाईलेंड, बैंकाक, सिंगापुर में भी रासलीला का निर्देशन किया। उनके द्वारा शुरू की गई रासलीला की परंपरा को उनकी दूसरी पीढ़ी उतने ही शुद्ध भावों से सींच रही है। स्वामी हरि गोविंद महाराज के बड़े पुत्र स्वामी राम प्रसाद शर्मा और स्वामी अवधेश शर्मा आज भी रासलीला को आगे बढ़ा रहे हैं।
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भरतपुर, राजस्थान के गांव जनूथर में जन्मे स्वामी हरिगोविंद महाराज 1934 में आठ वर्ष की आयु में परिवार के साथ कान्हा की क्रीड़ास्थली वृंदावन आ बसे। यहां स्वामी किशनलाल से रासलीला की कला सीखी और रासलीला मंचन में रम गए। 1936 में पहली बार हरिगोविंद महाराज ने भगवान कृष्ण का अभिनय किया। उनकी यह प्रस्तुति लोगों ने वर्षों तक सराही। इसके बाद 1945 में स्वामी हरिगोविंद खुद की रासलीला मंडली बनाकर रासलीला विधा को आगे बढ़ाने के कार्य में जुट गए।
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ये वो का दौर था जब यह रासलीला संपन्न परिवारों के आंगन तक ही सीमित थी लेकिन हरिगोविंद महाराज इसे आमलोगों के बीच खुले पंडाल में ले गए। 1960 और 1961 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान पर हरिगोविंद महाराज ने रासलीला मंडली का निर्देशन किया। यहां भारत के प्रमुख राजनेता उनके मुरीद हो गए। 91 वर्ष की आयु में भी स्वामी हरिगोविंद का रासलीला के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ। 2016 के ही उज्जैन कुंभ में उन्होंने रासलीला का निर्देशन किया। अंतिम सांस तक वे रासलीला को नई ऊंचाई देने में जुट रहे।
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2006 में मिला पद्मश्री सम्मान
स्वामी हरिगोविंद महाराज को सबसे पहले 1972 में संगीत नाटक अकादमी दिल्ली की ओर से सम्मानित किया गया। 1978 में कर्नाटक के राज्यपाल ने बैंगलोर में सम्मानित किया। 1979 में संगीत नाटक अकादमी उत्तर प्रदेश और 1999 में मध्य प्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय तुलसी सम्मान से नवाजा। कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाओं को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2006 में उन्हें पद्मश्री सम्मान की देने घोषणा की। तत्कालीन राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों राष्ट्रपति भवन में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया।
अंतिम समय श्रीधाम में बिताने की रही इच्छा
स्वामी हरिगोविंद महाराज के पौत्र रजनीश शर्मा ने बताया कि बीते 15 दिनों से हरिगोविंद महाराज मथुरा के नयति हास्पीटल में भर्ती थे। उपचार के दौरान ही उन्होंने अंतिम समय श्रीधाम वृंदावन में बिताने की इच्छा जाहिर की। इस पर परिवारीजन उन्हें रविवार को वृंदावन स्थित निज निवास पर लेकर आए। यहां सोमवार को दोपहर में करीब तीन बजे उन्होंने देहत्याग किया।
चैतन्य गौरांग लीला के जनक
रासलीला विधा को विदेशों तक पहचान दिलाने वाले पद्मश्री हरिगोविंद महाराज चैतन्य गौरांग लीला के जनक माने जाते हैं। स्वामी हरिगोविंद ने रासलीला के साथ ही देश में पहली बार चैतन्य गौरांग लीला की प्रस्तुति आम जनता के सामनेे रखी। बताया जाता है कि स्वामी हरिगोविंंद की चैतन्य गौरांग लीला का मंचन दर्शकों को भावविभोर कर देता था। अपनी जीवन यात्रा में उन्होंने पूरे भारत देश के साथ ही थाईलेंड, बैंकाक, सिंगापुर में भी रासलीला का निर्देशन किया। उनके द्वारा शुरू की गई रासलीला की परंपरा को उनकी दूसरी पीढ़ी उतने ही शुद्ध भावों से सींच रही है। स्वामी हरि गोविंद महाराज के बड़े पुत्र स्वामी राम प्रसाद शर्मा और स्वामी अवधेश शर्मा आज भी रासलीला को आगे बढ़ा रहे हैं।