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ऑन लाइन कार्यशाला में बताए गए पांडुलिपियों के संरक्षण के तौर तरीके
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वृंदावन। वृंदावन शोध संस्थान में मंगलवार को ‘पांडुलिपियों का प्राथमिक संरक्षण’ विषय पर ऑनलाइन कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें लखनऊ स्थित राष्ट्रीय सांस्कृतिक संपदा संरक्षण अनुसंधानशाला के वरिष्ठ कंजर्वेटर प्रमोद पांडेय ने पांडुलिपि संरक्षण पर व्याख्यान प्रस्तुत किया।
प्रमोद पांडेय ने पांडुलिपियों के उचित रखरखाव के बारे में जानकारी दी। बताया कि पांडुलिपियों को 18 से 25 डिग्री सेल्सियस व आद्रता 45-55 प्रतिशत पर रखना चाहिए। इन्हें कीटों व फंगस से बचाने को कॉटन में मेन्थॉल (पिपरमेंट) 10 ग्राम प्रति मीटर क्यूबिक एरिया में एयर टाइट शो-केश में रखना चाहिए। पारंपरिक भारतीय पद्धति के अनुसार लौंग, कपूर, दालचीनी, हल्दी, नीम के पत्ते आदि वस्तुओं का प्रयोग से इन्हें सुरक्षित किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि पांडुलिपियों को लोहे के बक्से में रखने से जंग और इन्हें धूप में सुखाने से फंगस लगने की संभावना रहती है। इनकी वीथिकाओं में गीला कपड़ा नहीं लगाना चाहिए बल्कि वैक्यूम क्लीनर के माध्यम से ड्राईक्लीन कराया जाना चाहिए।
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इस दौरान वृंदावन शोध संस्थान के संरक्षण सहायक करवेंद्र सिंह ने प्रमोद पांडेय का स्वागत और प्रशासनिक अधिकारी रजत शुक्ला ने धन्यवाद ज्ञापन किया। तकनीकी सहयोग उमाशंकर पुरोहित, श्रीकृष्ण गौतम, जुगल शर्मा ने दिया। संस्थान के निदेशक सतीश चंद्र दीक्षित, डॉ. ब्रजभूषण चतुर्वेदी, ममता गौतम के अतिरिक्त संस्कृति विभाग से 130 विशेषज्ञ इस कार्यशाला से जुड़े।
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प्रमोद पांडेय ने पांडुलिपियों के उचित रखरखाव के बारे में जानकारी दी। बताया कि पांडुलिपियों को 18 से 25 डिग्री सेल्सियस व आद्रता 45-55 प्रतिशत पर रखना चाहिए। इन्हें कीटों व फंगस से बचाने को कॉटन में मेन्थॉल (पिपरमेंट) 10 ग्राम प्रति मीटर क्यूबिक एरिया में एयर टाइट शो-केश में रखना चाहिए। पारंपरिक भारतीय पद्धति के अनुसार लौंग, कपूर, दालचीनी, हल्दी, नीम के पत्ते आदि वस्तुओं का प्रयोग से इन्हें सुरक्षित किया जा सकता है।
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उन्होंने बताया कि पांडुलिपियों को लोहे के बक्से में रखने से जंग और इन्हें धूप में सुखाने से फंगस लगने की संभावना रहती है। इनकी वीथिकाओं में गीला कपड़ा नहीं लगाना चाहिए बल्कि वैक्यूम क्लीनर के माध्यम से ड्राईक्लीन कराया जाना चाहिए।
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इस दौरान वृंदावन शोध संस्थान के संरक्षण सहायक करवेंद्र सिंह ने प्रमोद पांडेय का स्वागत और प्रशासनिक अधिकारी रजत शुक्ला ने धन्यवाद ज्ञापन किया। तकनीकी सहयोग उमाशंकर पुरोहित, श्रीकृष्ण गौतम, जुगल शर्मा ने दिया। संस्थान के निदेशक सतीश चंद्र दीक्षित, डॉ. ब्रजभूषण चतुर्वेदी, ममता गौतम के अतिरिक्त संस्कृति विभाग से 130 विशेषज्ञ इस कार्यशाला से जुड़े।