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भारत हिंदू राष्ट्र है: मोहन भागवत
ब्यूरो, अमर उजाला मथुरा
Updated Thu, 11 Jun 2015 11:35 PM IST
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संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि आरएसएस के लिए यह अनुकूल समय है। इस समय आरएसएस से जुड़े संगठनों की संख्या और प्रभाव दोनों बढ़ने हैं। सभी संगठनों में तालमेल बिठाने के लिए हमे अपना तंत्र भी मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा कि जितनी ऊंची इमारत की बुनियाद भी मजबूत होनी चाहिए। आधार मजूबत करने के लिए शाखाएं भी बढ़ानी होंगी। कमजोर आधार की इमारत धराशायी होने में वक्त नहीं लगता।
मथुरा के श्रीजी बाबा सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित आरएसएस के पश्चिमी क्षेत्र के प्रशिक्षण शिविर में भागवत राष्ट्र और राष्ट्रीयता विषय पर स्वयंसेवकों को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत हिंदू राष्ट्र है, इस विचार को छोड़कर कुछ भी बदला जा सकता है। इस विचार को साधने के लिए हमें अपनी कार्यपद्धति बदलनी पड़े तो बदल सकते हैं।
हमें हिंदू कहा तो बाहर अरब के लोगों ने कहा। हममें से कोई अपने को हिंदू कहे, भारतीय कहे, आर्य कहे या कहे कि मैं मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखता या रखता हूं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उन्होंने कहा अरब के लोग स को ह कहते हैं। सिंधु नदी से हमें हिंदू कहा गया, जो अब पाकिस्तान में है।
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सरसंघचालक ने स्वयंसेवकों को बताया कि इस भू-भाग में रहने वालों की नागरिकता अलग-अलग हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीयता एक है। इसके लिए उन्होंने भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि 1947 से पहले सभी भारतीय थे। इसके बाद यहां रहने वाले पाकिस्तान, फिर 1971 के बाद एक हिस्से के बांग्लादेशी हो गए। इनमें से किसी ने घर नहीं छोड़ा, लेकिन नागरिकता उनकी बदलती रही।
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मथुरा के श्रीजी बाबा सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित आरएसएस के पश्चिमी क्षेत्र के प्रशिक्षण शिविर में भागवत राष्ट्र और राष्ट्रीयता विषय पर स्वयंसेवकों को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत हिंदू राष्ट्र है, इस विचार को छोड़कर कुछ भी बदला जा सकता है। इस विचार को साधने के लिए हमें अपनी कार्यपद्धति बदलनी पड़े तो बदल सकते हैं।
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हमें हिंदू कहा तो बाहर अरब के लोगों ने कहा। हममें से कोई अपने को हिंदू कहे, भारतीय कहे, आर्य कहे या कहे कि मैं मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखता या रखता हूं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उन्होंने कहा अरब के लोग स को ह कहते हैं। सिंधु नदी से हमें हिंदू कहा गया, जो अब पाकिस्तान में है।
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सरसंघचालक ने स्वयंसेवकों को बताया कि इस भू-भाग में रहने वालों की नागरिकता अलग-अलग हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीयता एक है। इसके लिए उन्होंने भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि 1947 से पहले सभी भारतीय थे। इसके बाद यहां रहने वाले पाकिस्तान, फिर 1971 के बाद एक हिस्से के बांग्लादेशी हो गए। इनमें से किसी ने घर नहीं छोड़ा, लेकिन नागरिकता उनकी बदलती रही।