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‘मेरौ दाऊ बड़ौ मतवालौ, होरी में खेले हुरंगा’
अजय खंडेलवाल/राजेश पाठक, मथुरा
Updated Sun, 08 Mar 2015 12:06 AM IST
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‘आ जइयो श्याम बलदेव, तेरे गुलचा चार लगाय दूंगी, होरी कौ मजा चखाय दूंगी’, मेरौ दाऊ बड़ौ मतवालौ, होरी में खेले हुरंगा। बरसाना की लठामार, गोकुल की छड़ीमार होरी के बाद बलदेव के हुरंगा के साथ ही ब्रज के होली महोत्सव ने शिखर को छू लिया। देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालु इस अद्भुत नजारे के साक्षी बने। गोपियों के कोड़ों की मार ने कृष्ण सखाओं को आनंदित कर दिया। रंग, अबीर-गुलाल की मार से बदरा भी लाल हो गए।
शनिवार को बलदेव के प्रसिद्ध दाऊजी मंदिर में होली का उल्लास छाया। अपराह्न से ही सेवायत गोस्वामी समाज की महिलाएं सज-धजकर मंदिर प्रांगण पहुंचने लगीं। इधर गोस्वामी समाज के बंधु भी अपनी तैयारियों के साथ पहुंचने लगे। अबीर, गुलाल, टेसू के फूलों से तैयार रंग की बौछार के साथ होरी गायन के बीच होली की मस्ती छाने लगी।
‘सखी री होरी नांय हुरंगा ऐ,
दाऊ खैलें संग रेवती, बाजत ढ़प भौचंगा है,
सखी री होरी नांय हुरंगा ऐ’
‘ऐरी सखी निकसे श्री बलराम, खेलन ब्रज में फाग हो,
गांव वृंद सब नाचत गावत, गलियन उड़त गुलाल हो, खेलन ब्रज में फाग हो...
दाऊ में मचियौ हुरंगा,
गोप वधू सब खेलन आई, गावत गीत सुरंगा, दाऊ में मचियौ हुरंगा...
गोप सखा सब लै पिचकारी, डारत ऊपर रंगा,
खैंच पोतना ब्रज नारी सब, मानत मोद सुरंगा: दाऊ में मचियौ हुरंगा।
बारह बजे मंदिर प्रांगण में भगवान श्रीकृष्ण और बलदेव के प्रतीकात्मक झंडों को लेकर गोस्वामी समाज के लोग प्रवेश करते हैं। परिक्रमा के दौरान समाज की महिलाओं और पुरुषों में झंडा को लेेने की प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। रसिया-धमार सस्वरों के बीच ये प्रतिस्पर्धा कोड़ों की मार में बदलने लगी। कोड़ों को सहने की पुरुषों में होड़ मच गई। हर कोई इस मार को लालायित हो उठता है। कोड़ों की तड़तड़ाहट से प्रांगण गूंज उठा, परम आनंद की बारिश भक्तों को सराबोर करने लगी। एक घंटे तक चलेे इस अद्भुत नजारे को निहारने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा।
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‘देखि देखि या ब्रज की होरी, ब्रहमा मन ललचाय’
मथुरा। बलदेव प्रांगण में हुरंगे के अद्भुत नजारे ने ‘देखि देखि या ब्रज की होरी, ब्रह्मा मन ललचाय’ पंक्तियों को साकार कर दिया। प्रांगण मेें मंच पर बलराम, श्रीकृष्ण के स्वरूपों के साथ ही कंधे पर हल और हाथ में बांसुरी लिए कान्हा और बलदाऊ के अलग-अलग स्वरूपों की झलकियां आकर्षण का केंद्र रहीं। नफीरी, ढोल, मृदंग की तान के साथ होरी-रसियाओं के स्वरों ने वातावरण को होलीमय कर दिया। मंदिर के पट खुलते ही भगवान बलराम और रेवती मैया जी की छवि ने मन मोह लिया।
20 क्विंटल टेसू के फूलों से तैयार हुआ रंग
मथुरा। विश्व प्रसिद्ध हुरंगे को भव्य बनाने के लिए 20 क्विंटल टेसू के फूल, 50 बोरा अबीर-गुलाल, 10 बोरा भुडभुड, 120 किलो गुलाब गेंदा के फूल मंगवाए गए। टेसू के फूलों से तैयार रंगों को मंदिर प्रांगण में हौदों में भरा गया।
हुरंगा में ये रहे मौजूद
बलदेव क्षेत्र के विधायक पूरन प्रकाश, जिला जज दिनेश कुमार सिंह, एसएसपी मंजिल सैनी, अपर जिला जज वीके लाल, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट तृप्ता चौधरी, सिविल जज ओमवीर सिंह, एडीएम द्वय धीरेंद्र प्रताप सिंह, एसके शर्मा, एसएसपी मंजिल सैनी, एसडीएम महावन विश्वभूषण मिश्रा, चेयरमैन रामकृष्ण वर्मा, रिसीवर आरके पांडेय, पूर्व विधायक अजय पोइया, सपा जिलाध्यक्ष गुरुदेव शर्मा आदि मौजूद रहे।
कोड़ों की मार खाने को लालायित विदेशी
बलदेव। वेलडन! दिस इज हुरंगा भगवान दाऊजी महाराज। विदेशी भक्तों के मुंह से ये शब्द दाऊजी के हुरंगा को देखने के बाद निकले। विदेशों से आए भक्त इस अद्भुत नजारे को देख आनंदित हो गए। गोपिकाओं के कोड़ों की मार के लिए लालायित हो उठे। मंदिर प्रांगण में रंगों से सराबोर विदेशी भक्तों ने भी जमकर आनंद लिया।
1582 में बलदाऊजी की स्थापना संग चल रही परंपरा
मथुरा। बलदाऊ की नगरी बलदेव में हुरंगा की परंपरा पांच सौ साल पुरानी है। माना जाता है कि श्री बल्दाऊजी के विग्रह की प्रतिष्ठा स्थापना 1582 में हुई। उनके स्थापत्य काल से बलदाऊ के हुरंगा खेलने की परंपरा पड़ी।
हुरंगा से पहले लगता है भंाग का भोग
मथुरा। ब्रज के राजा बलदाऊ को हुरंगा से पहले सेवक ताम्र पत्र लगी भांग का भोग लगाते हैं। इसके बाद भांग के प्रसाद के रूप मेें बांटा जाता है।
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शनिवार को बलदेव के प्रसिद्ध दाऊजी मंदिर में होली का उल्लास छाया। अपराह्न से ही सेवायत गोस्वामी समाज की महिलाएं सज-धजकर मंदिर प्रांगण पहुंचने लगीं। इधर गोस्वामी समाज के बंधु भी अपनी तैयारियों के साथ पहुंचने लगे। अबीर, गुलाल, टेसू के फूलों से तैयार रंग की बौछार के साथ होरी गायन के बीच होली की मस्ती छाने लगी।
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‘सखी री होरी नांय हुरंगा ऐ,
दाऊ खैलें संग रेवती, बाजत ढ़प भौचंगा है,
सखी री होरी नांय हुरंगा ऐ’
‘ऐरी सखी निकसे श्री बलराम, खेलन ब्रज में फाग हो,
गांव वृंद सब नाचत गावत, गलियन उड़त गुलाल हो, खेलन ब्रज में फाग हो...
दाऊ में मचियौ हुरंगा,
गोप वधू सब खेलन आई, गावत गीत सुरंगा, दाऊ में मचियौ हुरंगा...
गोप सखा सब लै पिचकारी, डारत ऊपर रंगा,
खैंच पोतना ब्रज नारी सब, मानत मोद सुरंगा: दाऊ में मचियौ हुरंगा।
बारह बजे मंदिर प्रांगण में भगवान श्रीकृष्ण और बलदेव के प्रतीकात्मक झंडों को लेकर गोस्वामी समाज के लोग प्रवेश करते हैं। परिक्रमा के दौरान समाज की महिलाओं और पुरुषों में झंडा को लेेने की प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। रसिया-धमार सस्वरों के बीच ये प्रतिस्पर्धा कोड़ों की मार में बदलने लगी। कोड़ों को सहने की पुरुषों में होड़ मच गई। हर कोई इस मार को लालायित हो उठता है। कोड़ों की तड़तड़ाहट से प्रांगण गूंज उठा, परम आनंद की बारिश भक्तों को सराबोर करने लगी। एक घंटे तक चलेे इस अद्भुत नजारे को निहारने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा।
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‘देखि देखि या ब्रज की होरी, ब्रहमा मन ललचाय’
मथुरा। बलदेव प्रांगण में हुरंगे के अद्भुत नजारे ने ‘देखि देखि या ब्रज की होरी, ब्रह्मा मन ललचाय’ पंक्तियों को साकार कर दिया। प्रांगण मेें मंच पर बलराम, श्रीकृष्ण के स्वरूपों के साथ ही कंधे पर हल और हाथ में बांसुरी लिए कान्हा और बलदाऊ के अलग-अलग स्वरूपों की झलकियां आकर्षण का केंद्र रहीं। नफीरी, ढोल, मृदंग की तान के साथ होरी-रसियाओं के स्वरों ने वातावरण को होलीमय कर दिया। मंदिर के पट खुलते ही भगवान बलराम और रेवती मैया जी की छवि ने मन मोह लिया।
20 क्विंटल टेसू के फूलों से तैयार हुआ रंग
मथुरा। विश्व प्रसिद्ध हुरंगे को भव्य बनाने के लिए 20 क्विंटल टेसू के फूल, 50 बोरा अबीर-गुलाल, 10 बोरा भुडभुड, 120 किलो गुलाब गेंदा के फूल मंगवाए गए। टेसू के फूलों से तैयार रंगों को मंदिर प्रांगण में हौदों में भरा गया।
हुरंगा में ये रहे मौजूद
बलदेव क्षेत्र के विधायक पूरन प्रकाश, जिला जज दिनेश कुमार सिंह, एसएसपी मंजिल सैनी, अपर जिला जज वीके लाल, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट तृप्ता चौधरी, सिविल जज ओमवीर सिंह, एडीएम द्वय धीरेंद्र प्रताप सिंह, एसके शर्मा, एसएसपी मंजिल सैनी, एसडीएम महावन विश्वभूषण मिश्रा, चेयरमैन रामकृष्ण वर्मा, रिसीवर आरके पांडेय, पूर्व विधायक अजय पोइया, सपा जिलाध्यक्ष गुरुदेव शर्मा आदि मौजूद रहे।
कोड़ों की मार खाने को लालायित विदेशी
बलदेव। वेलडन! दिस इज हुरंगा भगवान दाऊजी महाराज। विदेशी भक्तों के मुंह से ये शब्द दाऊजी के हुरंगा को देखने के बाद निकले। विदेशों से आए भक्त इस अद्भुत नजारे को देख आनंदित हो गए। गोपिकाओं के कोड़ों की मार के लिए लालायित हो उठे। मंदिर प्रांगण में रंगों से सराबोर विदेशी भक्तों ने भी जमकर आनंद लिया।
1582 में बलदाऊजी की स्थापना संग चल रही परंपरा
मथुरा। बलदाऊ की नगरी बलदेव में हुरंगा की परंपरा पांच सौ साल पुरानी है। माना जाता है कि श्री बल्दाऊजी के विग्रह की प्रतिष्ठा स्थापना 1582 में हुई। उनके स्थापत्य काल से बलदाऊ के हुरंगा खेलने की परंपरा पड़ी।
हुरंगा से पहले लगता है भंाग का भोग
मथुरा। ब्रज के राजा बलदाऊ को हुरंगा से पहले सेवक ताम्र पत्र लगी भांग का भोग लगाते हैं। इसके बाद भांग के प्रसाद के रूप मेें बांटा जाता है।