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दाऊजी ने ओढ़ी रजाई, समझो जोर की सर्दी आई
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दाऊजी महाराज का भव्य मंदिर।
- फोटो : MATHURA
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बलदेव (मथुरा)। दाऊजी महाराज का 440वां प्राकट्योत्सव 30 दिसंबर से मनाया जाएगा। सुबह से शाम तक विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम होंगे। दाऊजी महाराज को विशेष रजाई (गद्दल) धारण कराई जाएगी। श्रीदाऊजी महाराज रजाई ओढ़ अपने भक्तों को सर्दी से बचाव का संदेश देंगे। शहनाई वादन व बलभद्र सहस्त्र नाम का पाठ होगा। पंचामृत केशर स्नान कराकर अभिषेक के साथ गर्म वस्त्र धारण कराए जाएंगे। भोग में दोपहर को मेवायुक्त खीर व रात को गर्म मेवायुक्त दूध का भोग लगेगा। सर्दी में काजू, पिस्ता, केसर आदि की मात्रा बढ़ा दी है। सुहागा व सोंठ का भोग लगता है। दोनों समय अंगीठी जलाई जा रही है।
प्राकट्योत्सव से जुड़ा है ऐतिहासिक प्राचीन मेला
बलदेव। दाऊजी महाराज का 440वां पाटोत्सव प्राकट्योत्सव मेला मार्ग शीर्ष शुक्ल पूर्णिमा से शुरू होता है। आज के ही दिन 440 वर्ष पूर्व श्री बलदेव जी, रेवती जी का प्राकट्य मार्गशीर्ष शुक्ल 15 संवत 1638 ईस्वी सन 1582 को हुआ। उस समय श्रीमद बल्लभाचार्य महाप्रभु के पौत्र गोस्वामी गोकुलनाथ ने पर्ण कुटी में उक्त विशाल श्रीविग्रह की प्राण प्रतिष्ठा की। एक वर्ष बाद नए मंदिर में संवत 1639 सन 1583 को बलदेव व रेवती मैया के विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा की। पूजा व्यवस्था गोस्वामी कल्याण देव को सौंपी। यह व्यवस्था आज भी उनके वंशज निर्वहन कर रहे हैं। नए विशाल मंदिर का निर्माण दिल्ली के श्यामलाल सेठ ने कराया था। तभी से यह मेला प्राकट्य से जुड़ा है। मेला लक्खी मेला के रूप में प्रसिद्ध है।
सबसे प्राचीन विग्रह है श्रीदाऊजी का
बलदेव। श्री दाऊजी महाराज का विग्रह पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार ब्रज के सभी मंदिरों में प्राचीन है, जोकि कुषाणकालीन है। बलदेव जी का आठ फीट ऊंचा व साढ़े तीन फीट चौड़ा श्री विग्रह है, जोकि पूरे ब्रज में विशाल विग्रह है। बलदेव जी के पीछे शेषनाग सात फनों से युक्त हैं, मुख्य मूर्ति की छाया कर रहे हैं जो साक्षात स्वरूप में विष्णु भगवान शेषनाग हैं। बलदेव जी के सामने उनकी सहधर्मिणी रेवती मैया का विग्रह सुदंर, मनोहारी भाव में है। प्रथम दिन भोग प्रसाद में मेवायुक्त खीर का भोग लगाया जाता है।
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दाऊ दादा व मैया की रजाई में लगता है 75 मीटर कपड़ा
बलदेव। दाऊ दादा व रेवती मैया की रजाई में 75 मीटर कपड़ा लगता है। कोट में 56 मीटर कपड़े का प्रयोग होता है। पुजारी रामनिवास शर्मा ने बताया कि सर्दी से बचाव के लिए श्रीदाऊ व रेवती मैया की रजाई में 75 मीटर गर्म कपड़ा व 12 किलो रुई भरी जाती है। बलदेव जी के कोट में 56 मीटर कपड़ा व 8 किलो रुई भरी जाती है। सर्दी से बचाव का विशेष इंतजाम होता है।
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प्राकट्योत्सव से जुड़ा है ऐतिहासिक प्राचीन मेला
बलदेव। दाऊजी महाराज का 440वां पाटोत्सव प्राकट्योत्सव मेला मार्ग शीर्ष शुक्ल पूर्णिमा से शुरू होता है। आज के ही दिन 440 वर्ष पूर्व श्री बलदेव जी, रेवती जी का प्राकट्य मार्गशीर्ष शुक्ल 15 संवत 1638 ईस्वी सन 1582 को हुआ। उस समय श्रीमद बल्लभाचार्य महाप्रभु के पौत्र गोस्वामी गोकुलनाथ ने पर्ण कुटी में उक्त विशाल श्रीविग्रह की प्राण प्रतिष्ठा की। एक वर्ष बाद नए मंदिर में संवत 1639 सन 1583 को बलदेव व रेवती मैया के विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा की। पूजा व्यवस्था गोस्वामी कल्याण देव को सौंपी। यह व्यवस्था आज भी उनके वंशज निर्वहन कर रहे हैं। नए विशाल मंदिर का निर्माण दिल्ली के श्यामलाल सेठ ने कराया था। तभी से यह मेला प्राकट्य से जुड़ा है। मेला लक्खी मेला के रूप में प्रसिद्ध है।
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सबसे प्राचीन विग्रह है श्रीदाऊजी का
बलदेव। श्री दाऊजी महाराज का विग्रह पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार ब्रज के सभी मंदिरों में प्राचीन है, जोकि कुषाणकालीन है। बलदेव जी का आठ फीट ऊंचा व साढ़े तीन फीट चौड़ा श्री विग्रह है, जोकि पूरे ब्रज में विशाल विग्रह है। बलदेव जी के पीछे शेषनाग सात फनों से युक्त हैं, मुख्य मूर्ति की छाया कर रहे हैं जो साक्षात स्वरूप में विष्णु भगवान शेषनाग हैं। बलदेव जी के सामने उनकी सहधर्मिणी रेवती मैया का विग्रह सुदंर, मनोहारी भाव में है। प्रथम दिन भोग प्रसाद में मेवायुक्त खीर का भोग लगाया जाता है।
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दाऊ दादा व मैया की रजाई में लगता है 75 मीटर कपड़ा
बलदेव। दाऊ दादा व रेवती मैया की रजाई में 75 मीटर कपड़ा लगता है। कोट में 56 मीटर कपड़े का प्रयोग होता है। पुजारी रामनिवास शर्मा ने बताया कि सर्दी से बचाव के लिए श्रीदाऊ व रेवती मैया की रजाई में 75 मीटर गर्म कपड़ा व 12 किलो रुई भरी जाती है। बलदेव जी के कोट में 56 मीटर कपड़ा व 8 किलो रुई भरी जाती है। सर्दी से बचाव का विशेष इंतजाम होता है।