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हर तीसरे परिवार में एक बच्चा अतिकुपोषित
अमर उजाला ब्यूरो, मैनपुरी
Updated Thu, 28 Apr 2016 11:10 PM IST
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अतिकुपोषित
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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कुपोषित बच्चों के लिए जिले में लाखों रुपये प्रतिमाह खर्च हो रहे हैं। यही नहीं जिला अस्पताल में पोषण पुनर्वास केंद्र तक बनाया जा चुका है। इसके बाद भी हालात सिर्फ कागजों में ही सुधर रहे हैं। औंछा में रहने वाले हर तीसरे परिवार में एक बच्चा अतिकुपोषित की श्रेणी में है। वहीं लोगों का कहना है कि आंगनबाड़ी से लेकर सीएचसी तक जो सुविधाएं सरकार ने मुहैया कराई हैं वो उन्हें नहीं मिल रही हैं। एएनएम केंद्र पर सन्नाटा रहता है।
प्रदेश में राज्य पोषण मिशन की शुरुआत नवंबर 2014 में हुई थी। इसके बाद गांवों में कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी लाने के लिए गांव को जिला स्तरीय अधिकारियों को गोद देने का क्रम शुरू हुआ था। योजना शुरू हुए एक साल हो गया लेकिन कुपोषित बच्चों की संख्या कम के बजाए बढ़ती ही जा रही है। हालांकि कागजों में आंकड़े कुछ और ही बताते हैं। कस्बा औंछा में हर तीसरे घर में एक बच्चा कुपोषण का शिकार है। यहां के लोगों का कहना है कि आंगनबाड़ी केंद्र सिर्फ कागजों में चल रहे हैं। केंद्रों पर आने वाली पंजीरी कुपोषित बच्चों को नहीं दी जाती। उसे पशुओं के लिए लोगों को बेच दिया जाता है। यही नहीं केंद्रों पर गर्भवती महिलाओं को आयरन की गोलियां और पंजीरी भी नहीं मिल रही है। सरकार अस्पतालों में भी गर्भवती महिलाओं को दवा नहीं मिल रही है। गांव औंछा के मोहल्ला टंकी में प्रिंस, डिंपल, कुलदीप, आशीष, मोहल्ला खिड़की में बिजरेश, तनवीर, सौरभ,
मोहल्ला मुसलिम बस्ती में अकील, बकील, रिजवान, इमरान अली अतिकुपोषित हैं। औंछा में कुल 50 से अधिक बच्चे अतिकुपोषित हैं। वहीं बड़ी संख्या में कुपोषित बच्चे भी हैं। इन बच्चों को सरकार की योजना का लाभ नहीं मिल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि आंगनबाड़ी केंद्रों और न ही स्वास्थ्य विभाग के केंद्रों पर बच्चों और गर्भवती को किसी योजना का लाभ दिया जाता है।
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आंकड़ों की बाजीगरी ने बिगाड़ी हालत
बाल विकास पुष्टाहार विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी पूर्व में कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों के बड़े पैमाने पर चिन्हांकन होने पर आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को फटकार लगाते रहे हैं। साथ ही इनकी संख्या कागजों में कम करने की कह रहे हैं। इसके चलते ही हालात बिगड़े हैं।
कुपोषित बच्चों के चिह्नांकन की जिम्मेदारी हमारी नहीं है। यह जिम्मेदारी बाल विकास पुष्टाहार विभाग की है। हमें बच्चे चिह्नित करके बताए जाते हैं तो हम उनका उपचार करते हैं।
- डाक्टर केके शर्मा, सीएमओ
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प्रदेश में राज्य पोषण मिशन की शुरुआत नवंबर 2014 में हुई थी। इसके बाद गांवों में कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी लाने के लिए गांव को जिला स्तरीय अधिकारियों को गोद देने का क्रम शुरू हुआ था। योजना शुरू हुए एक साल हो गया लेकिन कुपोषित बच्चों की संख्या कम के बजाए बढ़ती ही जा रही है। हालांकि कागजों में आंकड़े कुछ और ही बताते हैं। कस्बा औंछा में हर तीसरे घर में एक बच्चा कुपोषण का शिकार है। यहां के लोगों का कहना है कि आंगनबाड़ी केंद्र सिर्फ कागजों में चल रहे हैं। केंद्रों पर आने वाली पंजीरी कुपोषित बच्चों को नहीं दी जाती। उसे पशुओं के लिए लोगों को बेच दिया जाता है। यही नहीं केंद्रों पर गर्भवती महिलाओं को आयरन की गोलियां और पंजीरी भी नहीं मिल रही है। सरकार अस्पतालों में भी गर्भवती महिलाओं को दवा नहीं मिल रही है। गांव औंछा के मोहल्ला टंकी में प्रिंस, डिंपल, कुलदीप, आशीष, मोहल्ला खिड़की में बिजरेश, तनवीर, सौरभ,
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मोहल्ला मुसलिम बस्ती में अकील, बकील, रिजवान, इमरान अली अतिकुपोषित हैं। औंछा में कुल 50 से अधिक बच्चे अतिकुपोषित हैं। वहीं बड़ी संख्या में कुपोषित बच्चे भी हैं। इन बच्चों को सरकार की योजना का लाभ नहीं मिल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि आंगनबाड़ी केंद्रों और न ही स्वास्थ्य विभाग के केंद्रों पर बच्चों और गर्भवती को किसी योजना का लाभ दिया जाता है।
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आंकड़ों की बाजीगरी ने बिगाड़ी हालत
बाल विकास पुष्टाहार विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी पूर्व में कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों के बड़े पैमाने पर चिन्हांकन होने पर आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को फटकार लगाते रहे हैं। साथ ही इनकी संख्या कागजों में कम करने की कह रहे हैं। इसके चलते ही हालात बिगड़े हैं।
कुपोषित बच्चों के चिह्नांकन की जिम्मेदारी हमारी नहीं है। यह जिम्मेदारी बाल विकास पुष्टाहार विभाग की है। हमें बच्चे चिह्नित करके बताए जाते हैं तो हम उनका उपचार करते हैं।
- डाक्टर केके शर्मा, सीएमओ