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Maharajganj News: जिले में पनामा का असर, सचेत रहें केले की खेती करने वाले किसान

Sat, 30 Sep 2023 01:11 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sat, 30 Sep 2023 01:11 AM IST
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Impact of Panama in the district, banana cultivators should be alert
5500 हेक्टेयर में केले की खेती कर रहे करीब 6000 किसान, बचाव के लिए कृषि विशेषज्ञों की सलाह जरूरी
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संवाद न्यूज एजेंसी
महराजगंज। जिले में निचलौल क्षेत्र केले की फसलों में पनामा रोग हल्का असर है। 5500 हेक्टेयर में केले की खेती होती है। करीब छह हजार किसान केले की खेती करते हैं। पनामा का असर होने से किसान परेशान हैं। फसल के बचाव के लिए जरूरी दवाओं का प्रयोग कर रहे हैं। इसका प्रभाव जिले में अभी ज्यादा नहीं है।
उद्यान निरीक्षक विकास श्रीनेत ने बताया कि पनामा रोग एक घातक कवक रोग है और मिट्टी में पैदा होने वाले कवक फ्यूजेरियम ऑक्सिस्पोरम एफ के कारण होता है। कवक फसल में जड़ों के माध्यम से आक्रमण करता है। तने से होते हुए जाइलम या जल-संवाहक ऊतकों में पहुंच जाता है। धीरे-धीरे ये बीजाणु पौधों के लगभग सभी भागों में पहुंच जाते हैं और पानी के प्रवाह को पूरी तरह से अवरुद्ध कर पौधों के मुरझाने का बड़ा कारण बनते हैं।
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केले की पूरी फसल को बर्बाद कर देती पनामा बीमारी
- पनामा एक कवक रोग है। इसके संक्रमण से केले की फसल पूरी तरह बर्बाद हो सकती है। पनामा विल्ट फुसैरियम विल्ट टीआर-2 नामक कवक के कारण होता है। जिससे केले के पौधों का विकास रुक जाता है। इस रोग के लक्षणों की बात करें तो केले के पौधे की पत्तियां भूरी होकर गिर जाती हैं और तना भी सड़ने लगता है। यह एक बहुत ही घातक बीमारी मानी जाती है जो केले की पूरी फसल को बर्बाद कर देती है। यह फंगस से होने वाली बीमारी है।
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पनामा रोग होने का कारण

-तापमान में बदलाव होना।
-एक ही खेत में कई वर्षों तक केले की लगातार खेती करना।
-अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग।
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केले के पौधों को पनामा रोग से बचाने के उपाय:-
-रोग के प्रति अवरोधी फसलों का फसल चक्र अपनाएं।

-प्रति लीटर पानी में दो ग्राम मैंकोजेब डब्लूपी 75 प्रतिशत मिला कर छिड़काव करें। यह कवक रोगों को अधिक फैलने से रोकता है।
-रोग बढ़ने पर मैंकोजेब डब्लूपी 75 छिड़काव के 10 दिन बाद प्रति एकड़ की दर से साबू (कार्बेंडाजिम 12 प्रतिशत मैंकोजेब 63 प्रतिशत डब्लूपी ) 400-450 ग्राम इस्तेमाल करें।
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किसान केवल प्रमाणित स्रोतों से प्राप्त स्वस्थ पौध सामग्री का ही प्रयोग करें। अगर उपलब्ध हों तो पौधे की प्रतिरोधी प्रजातियां लगाएं। खेत में जल निकासी की व्यवस्था अच्छी करें। हर दूसरे सप्ताह पौधों की जांच करें। गंभीर रूप से प्रभावित पौधों को उखाड़ दें और उन्हें भूमि पर अलग से जला दें। सोडियम हायपोक्लोराइट ब्लीच का प्रयोग करके औज़ारों, उपकरणों व खेत की मशीनों को संक्रमण मुक्त करें। अगले 3-4 वर्षों के लिए अत्यधिक रूप से संक्रमित भूमि में केले का पौधा नहीं लगाएं।
-- डॉ. रामलखन सिंह, वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र मनकापुर गोंडा
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