{"_id":"5c9e5d90bdec222dc913091a","slug":"71553882512-maharajganj-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"अब तो यादों में सिमट कर रह गया सक्सेना जी का नेवता ़","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अब तो यादों में सिमट कर रह गया सक्सेना जी का नेवता ़
विज्ञापन
टॉप बॉक्स बनाएं
फोटो
सक्सेना जी का नेवता आ गया, चलना है वोट देने
प्रत्याशी और समर्थकों के घर की महिलाएं अपील करने के लिए लिखती थीं पर्चियां
जिले में 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव की यादें ताजा हैं बुजुर्गों के जेहन में
टिन के भोपू से दिया जाता था भाषण, पैदल-साइकिल से प्रचार करते थे कार्यकर्ता
संजय कुमार पांडेय
महराजगंज। टिन के भोपू से भाषण देना, टिन पर शब्द काटकर दीवारों पर छपवाना, साइकिल से प्रचार करना अब शायद ही किसी को याद हो, लेकिन गुजरे वक्त में चुनाव प्रचार ऐसे ही होता था। जनता और कार्यकर्ता अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए खुद प्रचार करते थे। वर्ष 1952 में पहली बार हुए महराजगंज लोकसभा के चुनाव पर अगर दृष्टि डालें तो सक्सेना जी का नेवता आज भी पुराने लोगों के जेहन में बसा हुआ है। इस नेवते को तैयार करती थीं खुद सक्सेना के परिवार और कार्यकर्ताओं के घर की महिलाएं। इसे ही लोगों के बीच बांटकर वोट मांगे जाते थे।
वर्ष 1952 से शुरू हुआ महराजगंज लोकसभा का सफर 2019 तक आ पहुंचा है। यहां के लोगों ने भी चुनाव प्रचार में तमाम उतार-चढाव देखे, लेकिन यादों के झरोखों में कुछ ऐसी बातें हैं, जिसे लोग याद करते हैं। महराजगंज के पहले सांसद प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना का जीवन-दर्शन आज भी बहुत से लोगों के लिए अनुकरणीय है। 1952 में महराजगंज की साक्षरता दर बेहद कम थी। लोग पढे़-लिखे नहीं थे। अंगूठा लगाकर काम चलाते थे। जब प्रो. सक्सेना ने पहली बार सांसद का चुनाव लड़ा तो उनके प्रचार का तरीका जमीन से जुड़ा था। उनके कार्यकर्ता टिन का भोपू लेकर पैदल और साइकिल से गांव-गांव पहुंचते थे। तब पोस्टर नहीं लगाए जाते थे। टिन की ही शीट पर प्रचार वाले शब्दों को काटकर दीवारों पर लिखा जाता था।
जवाहर लाल नेहरू पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज के रक्षा अध्ययन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. परशुराम गुप्त बताते हैं कि प्रो. सक्सेना जैसा व्यक्तित्व अब नहीं दिखता है। जब वह चुनाव लड़ते थे तो उनके और कार्यकर्ताओं के घर की महिलाएं मतदाता पर्ची लिखती थीं। उसे ही सक्सेना जी का नेवता कहा जाता था। इसे लोगों में वितरित का वोट मांगे जाते थे। मतदाता भी यही कहते थे सक्सेना जी का नेवता आ गया, चलना है वोट देने। तब समर्थकों और कार्यकर्ताओं के भोजन, पानी और रहने का इंतजाम जनता स्वयं करती थी। डॉ. परशुराम के मुताबिक वक्त बीतने के बाद भी प्रो. सक्सेना के प्रचार का तरीका ज्यादा नहीं बदला। वह जीप के आगे बैठ जाया करते थे। उनके पीछे ढोल, मंजीरा, हारमोनियम, झाल आदि के माध्यम से गीतों के जरिये उनके कार्यों का बखान किया जाता था। जीप के ऊपर लाउडस्पीकर बंधा होता था।
विज्ञापन
विज्ञापन
फोटो
सक्सेना जी का नेवता आ गया, चलना है वोट देने
प्रत्याशी और समर्थकों के घर की महिलाएं अपील करने के लिए लिखती थीं पर्चियां
जिले में 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव की यादें ताजा हैं बुजुर्गों के जेहन में
टिन के भोपू से दिया जाता था भाषण, पैदल-साइकिल से प्रचार करते थे कार्यकर्ता
संजय कुमार पांडेय
महराजगंज। टिन के भोपू से भाषण देना, टिन पर शब्द काटकर दीवारों पर छपवाना, साइकिल से प्रचार करना अब शायद ही किसी को याद हो, लेकिन गुजरे वक्त में चुनाव प्रचार ऐसे ही होता था। जनता और कार्यकर्ता अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए खुद प्रचार करते थे। वर्ष 1952 में पहली बार हुए महराजगंज लोकसभा के चुनाव पर अगर दृष्टि डालें तो सक्सेना जी का नेवता आज भी पुराने लोगों के जेहन में बसा हुआ है। इस नेवते को तैयार करती थीं खुद सक्सेना के परिवार और कार्यकर्ताओं के घर की महिलाएं। इसे ही लोगों के बीच बांटकर वोट मांगे जाते थे।
वर्ष 1952 से शुरू हुआ महराजगंज लोकसभा का सफर 2019 तक आ पहुंचा है। यहां के लोगों ने भी चुनाव प्रचार में तमाम उतार-चढाव देखे, लेकिन यादों के झरोखों में कुछ ऐसी बातें हैं, जिसे लोग याद करते हैं। महराजगंज के पहले सांसद प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना का जीवन-दर्शन आज भी बहुत से लोगों के लिए अनुकरणीय है। 1952 में महराजगंज की साक्षरता दर बेहद कम थी। लोग पढे़-लिखे नहीं थे। अंगूठा लगाकर काम चलाते थे। जब प्रो. सक्सेना ने पहली बार सांसद का चुनाव लड़ा तो उनके प्रचार का तरीका जमीन से जुड़ा था। उनके कार्यकर्ता टिन का भोपू लेकर पैदल और साइकिल से गांव-गांव पहुंचते थे। तब पोस्टर नहीं लगाए जाते थे। टिन की ही शीट पर प्रचार वाले शब्दों को काटकर दीवारों पर लिखा जाता था।
विज्ञापन
जवाहर लाल नेहरू पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज के रक्षा अध्ययन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. परशुराम गुप्त बताते हैं कि प्रो. सक्सेना जैसा व्यक्तित्व अब नहीं दिखता है। जब वह चुनाव लड़ते थे तो उनके और कार्यकर्ताओं के घर की महिलाएं मतदाता पर्ची लिखती थीं। उसे ही सक्सेना जी का नेवता कहा जाता था। इसे लोगों में वितरित का वोट मांगे जाते थे। मतदाता भी यही कहते थे सक्सेना जी का नेवता आ गया, चलना है वोट देने। तब समर्थकों और कार्यकर्ताओं के भोजन, पानी और रहने का इंतजाम जनता स्वयं करती थी। डॉ. परशुराम के मुताबिक वक्त बीतने के बाद भी प्रो. सक्सेना के प्रचार का तरीका ज्यादा नहीं बदला। वह जीप के आगे बैठ जाया करते थे। उनके पीछे ढोल, मंजीरा, हारमोनियम, झाल आदि के माध्यम से गीतों के जरिये उनके कार्यों का बखान किया जाता था। जीप के ऊपर लाउडस्पीकर बंधा होता था।
विज्ञापन