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मनू सतरूपा के तप से विष्णु , रावण के तप से प्रसन्न हुए ब्रह्मा
lalitpur
Updated Wed, 10 Oct 2018 02:00 AM IST
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- फोटो : amar ujala
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पाली। रामलीला के दूसरे दिन मंचन में रावण जन्म व दिग्विजय लीला दिखाई जाती है ।जिसका शुभारंभ भगवान विष्णु की आरती से होती है । मांगलिक आरती में लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा लेकर भगवान के जयकारों से पूरा वातावरण धार्मिक कर देते हैं ।
प्रथम दृश्य में सूर्यवंश के राजा मनू कई वर्षों तक राज्य करने के पश्चात अपनी पत्नी सतरूपा के साथ वन में तपस्या करने चले जाते है। प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उन्हें दर्शन देकर वर मांगने को कहते। दोनों ने भगवान से वर मांगा की उन्हीं के समान ही सुंदर संतान उनके घर जन्म ले। भगवान विष्णु तथास्तु कहकर अंर्तध्यान हो जाते हैं। मंचन के दूसरे द्रश्य में पिता की आज्ञा पाकर कैकसी विश्रवा के पास गई। उस समय भयंकर आंधी चल रही थी। आकाश में मेघ गरज रहे थे। कैकसी का अभिप्राय जानकर विश्रवा ने कहा कि भद्रे! तुम इस कुबेला में आई हो। मैं तुम्हारी इच्छा तो पूरी कर दूंगा परन्तु इससे तुम्हारी संतान दुष्ट स्वभाव वाली और कुकर्मी होगी। मुनि की बात सुनकर कैकसी उनके चरणों में गिर पड़ी और बोली कि भगवन्! आप ब्रह्मवादी महात्मा हैं।आपसे मैं ऐसी दुराचारी संतान पाने की आशा नहीं करती। अत: आप मुझ पर कृपा करें। कैकसी के वचन सुनकर मुनि विश्रवा ने कहा कि अच्छा तो तुम्हारा सबसे छोटा पुत्र सदाचारी और धर्मात्मा होगा। ऽइस प्रकार कैकसी के दस मुख वाले पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम दशानन (रावण) रखा गया। उसके पश्चात कुम्भकर्ण, शूर्पणखा और विभीषण के जन्म हुए। रावण और कुम्भकर्ण अत्यंत दुष्ट थे, किन्तु विभीषण धर्मात्मा प्रकृति का था। शक्तिशाली बनने के लिये रावण ने अपने भाइयों सहित ब्रह्माजी की तपस्या की। ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर व वरदान मिलने से विभीषण प्रभू भक्ति में लीन हो जाता , कुंभकर्ण सोने को चला जाता तो वही रावण को अपने वरदान का अभिमान हो जाता उसके आतंक के चलते पूरे में हाहाकार मच जाता ।
मंचन में आगे रावण अपने पुत्र के साथ देवलोक पर आक्रमण बोल देवताओं को बंदी बना लेता । मंचन को देख लोग रामलीला के रस में डूबे रहे । इस मौके पर व्यास गद्दी पर बैठे अरुण चौरसिया(जख्मी) , श्याम प्रसाद भौंडेले , विनोद चौरसिया, मिथलेश चौरसिया, पप्पू झनकार , लक्ष्मण पाठकर, अभय जैन, कृष्णमुरारी, आदि मौजूद रहे ।
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प्रथम दृश्य में सूर्यवंश के राजा मनू कई वर्षों तक राज्य करने के पश्चात अपनी पत्नी सतरूपा के साथ वन में तपस्या करने चले जाते है। प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उन्हें दर्शन देकर वर मांगने को कहते। दोनों ने भगवान से वर मांगा की उन्हीं के समान ही सुंदर संतान उनके घर जन्म ले। भगवान विष्णु तथास्तु कहकर अंर्तध्यान हो जाते हैं। मंचन के दूसरे द्रश्य में पिता की आज्ञा पाकर कैकसी विश्रवा के पास गई। उस समय भयंकर आंधी चल रही थी। आकाश में मेघ गरज रहे थे। कैकसी का अभिप्राय जानकर विश्रवा ने कहा कि भद्रे! तुम इस कुबेला में आई हो। मैं तुम्हारी इच्छा तो पूरी कर दूंगा परन्तु इससे तुम्हारी संतान दुष्ट स्वभाव वाली और कुकर्मी होगी। मुनि की बात सुनकर कैकसी उनके चरणों में गिर पड़ी और बोली कि भगवन्! आप ब्रह्मवादी महात्मा हैं।आपसे मैं ऐसी दुराचारी संतान पाने की आशा नहीं करती। अत: आप मुझ पर कृपा करें। कैकसी के वचन सुनकर मुनि विश्रवा ने कहा कि अच्छा तो तुम्हारा सबसे छोटा पुत्र सदाचारी और धर्मात्मा होगा। ऽइस प्रकार कैकसी के दस मुख वाले पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम दशानन (रावण) रखा गया। उसके पश्चात कुम्भकर्ण, शूर्पणखा और विभीषण के जन्म हुए। रावण और कुम्भकर्ण अत्यंत दुष्ट थे, किन्तु विभीषण धर्मात्मा प्रकृति का था। शक्तिशाली बनने के लिये रावण ने अपने भाइयों सहित ब्रह्माजी की तपस्या की। ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर व वरदान मिलने से विभीषण प्रभू भक्ति में लीन हो जाता , कुंभकर्ण सोने को चला जाता तो वही रावण को अपने वरदान का अभिमान हो जाता उसके आतंक के चलते पूरे में हाहाकार मच जाता ।
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मंचन में आगे रावण अपने पुत्र के साथ देवलोक पर आक्रमण बोल देवताओं को बंदी बना लेता । मंचन को देख लोग रामलीला के रस में डूबे रहे । इस मौके पर व्यास गद्दी पर बैठे अरुण चौरसिया(जख्मी) , श्याम प्रसाद भौंडेले , विनोद चौरसिया, मिथलेश चौरसिया, पप्पू झनकार , लक्ष्मण पाठकर, अभय जैन, कृष्णमुरारी, आदि मौजूद रहे ।
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