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पानी नहीं मिलने से मर रहे वन पशु
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 25 Apr 2016 01:18 AM IST
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- फोटो : demo pic
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नाराहट (ललितपुर)। सूखा का असर गांवों में दिखाई देने लगा है। सबसे अधिक मार पशुओं पर पड़ रही है। पानी का कोई इंतजाम नहीं होने के कारण पशु बेमौत मर रहे हैं।
दो वर्ष पूर्व बोरिंग कराने पर 40 से 100 फुट पर पानी निकल आता था, लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है। जिला प्रशासन द्वारा जो हैंडपंप रीबोर कराए जा रहे हैं, वह 130 फुट से अधिक के बाद ही पानी दे रहे हैं। हाल ही में बस स्टैंड के पास एक रीबोर कराया गया, जिसमें 130 फुट के बाद पानी निकला। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि भूजल स्तर कितनी गहराई तक चला गया है। नाराहट में एक मात्र तालाब है, लेकिन उसमें भी पानी नहीं है।
ऐसे में हैंडपंप ही लोगों का सहारा हैं। हालांकि, पानी की टंकी बनाने के लिए पहले कई बार सर्वे हो चुका है, लेकिन अब तक कार्ययोजना को मूर्त रूप नहीं दिया जा सका है।
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आदमी तो जैसे-तैसे प्यास बुझा रहा है, लेकिन पशुओं के लिए पानी का इंतजाम नहीं होने के कारण वह प्यासे मर रहे हैं। जंगल में बने नाले और पोखरों में पानी समाप्त हो गया है। पशुपालकों ने भी अपने पशु छुट्टा छोड़ दिए हैं। एक तो भूसा नहीं मिलने से पहले से ही मवेशियों के सामने भोजन का संकट था, रही-सही कसर पानी की कमी ने पूरी कर दी है, जिससे पशुओं की जान पर बन आई है। गांव का नाला तीन माह पूर्व ही सूख गया था। वन विभाग द्वारा बनवाए गए चेकडैम भी सूखे पड़े हैं। वहीं, पानी की तलाश में जंगली जानवर गांव में आ रहे हैं, जिससे वह लोगों का शिकार हो रहे हैं। शिकारी जाल बिछाए रात-रात भर जानवरों का इंतजार करते हैं।
सबसे ज्यादा शिकार सुअरों का किया जा रहा है, जिससे उनकी जान पर बन आई है। यदि समय रहते जानवरों के लिए पानी का इंतजाम नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं, जब इनके अस्तित्व पर संकट मंडराने लगेगा।
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दो वर्ष पूर्व बोरिंग कराने पर 40 से 100 फुट पर पानी निकल आता था, लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है। जिला प्रशासन द्वारा जो हैंडपंप रीबोर कराए जा रहे हैं, वह 130 फुट से अधिक के बाद ही पानी दे रहे हैं। हाल ही में बस स्टैंड के पास एक रीबोर कराया गया, जिसमें 130 फुट के बाद पानी निकला। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि भूजल स्तर कितनी गहराई तक चला गया है। नाराहट में एक मात्र तालाब है, लेकिन उसमें भी पानी नहीं है।
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ऐसे में हैंडपंप ही लोगों का सहारा हैं। हालांकि, पानी की टंकी बनाने के लिए पहले कई बार सर्वे हो चुका है, लेकिन अब तक कार्ययोजना को मूर्त रूप नहीं दिया जा सका है।
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आदमी तो जैसे-तैसे प्यास बुझा रहा है, लेकिन पशुओं के लिए पानी का इंतजाम नहीं होने के कारण वह प्यासे मर रहे हैं। जंगल में बने नाले और पोखरों में पानी समाप्त हो गया है। पशुपालकों ने भी अपने पशु छुट्टा छोड़ दिए हैं। एक तो भूसा नहीं मिलने से पहले से ही मवेशियों के सामने भोजन का संकट था, रही-सही कसर पानी की कमी ने पूरी कर दी है, जिससे पशुओं की जान पर बन आई है। गांव का नाला तीन माह पूर्व ही सूख गया था। वन विभाग द्वारा बनवाए गए चेकडैम भी सूखे पड़े हैं। वहीं, पानी की तलाश में जंगली जानवर गांव में आ रहे हैं, जिससे वह लोगों का शिकार हो रहे हैं। शिकारी जाल बिछाए रात-रात भर जानवरों का इंतजार करते हैं।
सबसे ज्यादा शिकार सुअरों का किया जा रहा है, जिससे उनकी जान पर बन आई है। यदि समय रहते जानवरों के लिए पानी का इंतजाम नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं, जब इनके अस्तित्व पर संकट मंडराने लगेगा।