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लाकडाउन में ग्रामीणों के लिए महुआ बना रोजगार का साधन

Fri, 01 May 2020 02:00 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 01 May 2020 02:00 AM IST
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Mahua make bussiness in villager
महुआ से भरी टोकरी ले कर जाते ग्रामीण - फोटो : LALITPUR
ललितपुर। लॉकडाउन के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार न के बराबर मिल रहा है। ऐसे में श्रमिकों ने महुआ को आय का जरिया बना लिया है। दिन भर में पांच-सात किलोग्राम महुआ एकत्रित कर पाते हैं, जिसकी कीमत लगभग सौ रुपये के आसपास ही होती है। श्रमिक महुआ बीनकर अपने परिवार की गुजर-बसर कर रहे हैं।
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कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम के लिए देश लॉकडाउन में है। इससे व्यापारिक कार्य थम गए हैं। सामाजिक दूरियां बनाने के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में भी रोजगार का सृजन न के बराबर रह गया है। इस कारण श्रमिकों ने महुआ बीनना प्रारंभ कर दिया है। ब्लाक बार के ग्राम कारीटोरन में अलसुबह से ही लोग महुआ फूल की रखवाली के लिए घरों से निकल जाते हैं। इस दौरान सुरक्षा के लिए हाथ में लाठी व महुआ फूल रखने के लिए टोकरी साथ लेकर जाते हैं। जैसे ही सूरज निकलता है , वैसे ही परिवार के अन्य सदस्य कलश में पानी लेकर महुआ फूल बीनने के लिए पहुंच जाते हैं। सूर्य के चढ़ते ही पेड़ से फूल गिरना कम हो जाते हैं।
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इस तरह लोगों का पूरा दिन महुआ फूल बीनने में गुजर जाता है। वर्तमान में गल्ला मंडी बंद होने से लोगों को महुआ के फूल के सही रेट नहीं मिल पा रहे हैं। स्थानीय दुकानदार मनमाने रेट पर खरीद कर रहे हैं। किसी दुकान पर पंद्रह रुपये किलोग्राम तो कहीं बीस रुपये किलोग्राम महुआ फूूल बिक रहा है। यदि इन्हें सूखने के लिए रख देते हैं तो उनका वजन घटकर आधा रह जाता है।
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बाहर से आ चुके 28 श्रमिक
महानगरों से करीब 28 श्रमिक ग्राम इमलिया व कारीटोरन में आ चुके हैं, इनमें से भी कई श्रमिकों को मनरेगा में काम उपलब्ध कराया गया है।
महुआ फूल बीनने में काफी मेहनत होती है। पहले तो इनकी रखवाली आधी रात से करनी पड़ती है, तब जाकर महुआ फूल बच पाते हैं। वरना, जानवर इन्हें खा जाते हैं। महुआ फूल पेड़ से नीचे एक-एक कर गिरते हैं जो आसपास बिखर जाते हैं।
- प्रकाश विश्वकर्मा
इस समय गांव में कोई काम नहीं बचा है, ऐसे में महुआ फूल आय का जरिया बन गया है। गांव में महुआ फूल पंद्रह से बीस रुपये प्रति किलोग्राम रेट में बिक रहा है। यदि सूखा महुआ फूल हो तो उसकी कीमत थोड़ी अधिक मिल जाती है। इस काम में मेहनत ज्यादा है, तब जाकर हाथ में कुछ पैसे आते हैं।
- बाबूूलाल प्रजापति
महुआ फूल का आखिरी समय चल रहा है। कुछ दिन बाद फूल गिरना पेड़ों से बंद हो जाएंगे। इसके बाद गुली फल पेड़ की टहनियों में आने लगता है तो नीम में निबोरी आ जाती है। कुल मिलाकर पेड़ों से हमें कुछ न कुछ मिलता रहता है।
- मनीराम
इस समय कोरोना बीमारी ने लोगों को डरा दिया है। अब लोग एक साथ काम करने से कतराते हैं, जिससे गांव में रोजगार का सृजन लगभग बंद ही है। मनरेगा में भी लोगों को काम नहीं मिल रहा है।
- उदय
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ग्राम कारीटोरन और इमलिया में लगभग तीन सौ से ऊपर जॉबकार्ड धारक हैं, इनमें से अभी 90 के आसपास श्रमिकों को काम मिला हुआ है। आने वाले दिनों में काम बढ़ेंगे तो और भी श्रमिकों को काम मिलने लगेगा।
- रामदयाल
ग्राम प्रधान, कारीटोरन
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महुआ फूल का इस्तेमाल कई तरह से होता है। मौजूदा समय में इससे सैनिटाइजर बनाया जा रहा है। इससे शराब भी बनती है। इसके अलावा महुआ से सिरका, लड्डूूू और गुड़ भी बनता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग उसे उबालकर खाते भी हैं। महुआ का प्रयोग कई दवाओं में होता है। ललितपुर में मार्च से इसका टपकना प्रारंभ होता है, जो मई के उत्तरार्द्घ तक चलता है। जिले में इसका उत्पादन करीब पचास से साठ ट्रक होता है।

- जेडी सिंह
एसडीओ वन, महरौनी
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महुआ का फूल गुजरात, राजस्थान व बिहार जाता है। मंडी में करीब चार हजार रुपये क्विंटल इसका रेट चल रहा है। हालांकि, वर्तमान में मंडी बंद है। महुआ का सबसे ज्यादा उपयोग शराब बनाने में होता है।
- अरविंद सिंघई
व्यवसायी
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