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कोरोना वारियर बनकर मां-बेटी ने जीता लोगों का भरोसा
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एएनएम पूनम व आंगनवाड़ी कार्यकर्ता मीरा
- फोटो : LALITPUR
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ललितपुर। अपने कार्य के प्रति समर्पण सीखना है तो विकासखंड तालबेहट की मीरा व पूनम से सीखा जा सकता है। दोनों ने कोरोना काल में लोगों को ऐसा भरोसा जीता कि जब भी क्षेत्रवासियों को स्वास्थ्य के विषय में जानकारी लेना हो तो वे मीरा और पूनम से सलाह लेना नहीं भूलते हैं। यह दोनों मां-बेटी हैं। मां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं और बेटी एएनएम का काम कर रही है।
एएनएम पूनम बताती हैं कि उनका पौने तीन वर्ष का बेटा है। कोरोना काल में बच्चे को संभालना व ड्यूटी करना किसी चुनौती से कम नहीं था। जब प्रवासी मजदूरों की वापसी हुई, तब उन्हें अक्सर रात को भी ड्यूटी के लिए जाना पड़ जाता था। इस दौरान कंट्रोल रूम से आदेश आने के बाद प्रवासी मजदूरों को आइसोलेशन के लिए नामित स्कूल में ले जाते थे। कोरोना से बचाव के लिए आज भी घर लौटते ही पहले नहाना और फिर सामान को सैनिटाइज करना नहीं भूलते हैं।
मीरा का कहना है कि वह स्वयं तालबेहट ब्लॉक के ही ककडारी गांव में कार्यरत हैं। दोनों अक्सर साथ में काम करते हैं। क्षेत्रवासी उनसे सलाह लेते हैं।
पूनम ने बताया कि कई बार लोग कोरोना के टेस्ट के लिए भी आनाकानी करते हैं। सहरिया समुदाय के कई लोग अपने बच्चों का टीकाकरण नहीं कराते हैं। ऐसे लोगों को जागरूक करते हैं। उनकी मां और उन्होंने अब तक सात बार कोरोना का टेस्ट करवाया है। अभी तक सबकी रिपोर्ट नेगेटिव ही रही है।
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जीवन में शिक्षा का योगदान अहम : मीरा
मीरा बताती हैं कि जब उनकी शादी हुई थी, तब वह हाईस्कूल पास थीं। पति से जब काम करने की इच्छा जाहिर की तो उन्होंने उनका पूरा साथ दिया। वर्ष 2000 में वह आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के तौर में जुड़ीं। नौकरी करते हुए उन्होंने इंटर और बीए की परीक्षा पास की। जब वह काम पर जाती थीं तो आसपास के लोग उन्हें ताने मारते थे। परिवार नियोजन की बातें समझाने पर कई बार विरोध का सामना भी करना पड़ा है लेकिन धीरे-धीरे यह सब बंद हो गया। पूनम के अलावा एक और बेटी भी झांसी के एक निजी चिकित्सालय में नर्स है।
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एएनएम पूनम बताती हैं कि उनका पौने तीन वर्ष का बेटा है। कोरोना काल में बच्चे को संभालना व ड्यूटी करना किसी चुनौती से कम नहीं था। जब प्रवासी मजदूरों की वापसी हुई, तब उन्हें अक्सर रात को भी ड्यूटी के लिए जाना पड़ जाता था। इस दौरान कंट्रोल रूम से आदेश आने के बाद प्रवासी मजदूरों को आइसोलेशन के लिए नामित स्कूल में ले जाते थे। कोरोना से बचाव के लिए आज भी घर लौटते ही पहले नहाना और फिर सामान को सैनिटाइज करना नहीं भूलते हैं।
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मीरा का कहना है कि वह स्वयं तालबेहट ब्लॉक के ही ककडारी गांव में कार्यरत हैं। दोनों अक्सर साथ में काम करते हैं। क्षेत्रवासी उनसे सलाह लेते हैं।
पूनम ने बताया कि कई बार लोग कोरोना के टेस्ट के लिए भी आनाकानी करते हैं। सहरिया समुदाय के कई लोग अपने बच्चों का टीकाकरण नहीं कराते हैं। ऐसे लोगों को जागरूक करते हैं। उनकी मां और उन्होंने अब तक सात बार कोरोना का टेस्ट करवाया है। अभी तक सबकी रिपोर्ट नेगेटिव ही रही है।
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जीवन में शिक्षा का योगदान अहम : मीरा
मीरा बताती हैं कि जब उनकी शादी हुई थी, तब वह हाईस्कूल पास थीं। पति से जब काम करने की इच्छा जाहिर की तो उन्होंने उनका पूरा साथ दिया। वर्ष 2000 में वह आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के तौर में जुड़ीं। नौकरी करते हुए उन्होंने इंटर और बीए की परीक्षा पास की। जब वह काम पर जाती थीं तो आसपास के लोग उन्हें ताने मारते थे। परिवार नियोजन की बातें समझाने पर कई बार विरोध का सामना भी करना पड़ा है लेकिन धीरे-धीरे यह सब बंद हो गया। पूनम के अलावा एक और बेटी भी झांसी के एक निजी चिकित्सालय में नर्स है।