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दो वक्त की रोटी की खातिर खेतों में जाकर बीन रहे गेहूं के दाने

Sat, 25 Apr 2020 01:18 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Sat, 25 Apr 2020 01:18 AM IST
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Collect weat for two time bread
डोंगराखुर्द में गेंहू की बाल बीनतीं महिलाएं - फोटो : LALITPUR
डोंगराखुर्द। वैश्विक महामारी कोरोना के कहर से गांव व शहर सब बंद पड़े हैं। उद्योग व कारखाने ठप हैं। पलायन कर चुके लोग शहरों को छोड़कर अपने गांव में वापस आ गए हैं, लेकिन गांव में परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटा पाना दूभर हो रहा है। गांवों के आदिवासी व अन्य जरूरतमंद लोग किसानों के खाली पड़े खेतों में जाकर वहां फसलों की बालियों व दानों को बीनकर पेट भरने का जुगाड़ करते हैं।
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हालात ऐसे हैं कि कोई भी व्यक्ति जरूरतमंदों को उधार देने को तैयार नहीं है। लोगों का कहना है कि इस वक़्त सरकार द्वारा जो मदद मिल रही है, वह नाकाफी है। बाजार में जरूरत की सामग्रियों के दामों में उछाल है। कई अति आवश्यक चीजों को ख़रीद पाना जेब से बाहर हो गया है। सुरक्षित जिंदगी के लिए सरकार के लॉकडाउन का स्वागत है, लेकिन इसमें गरीबों की पीड़ा का भी ध्यान रखा जाए। रबी सीजन की फसल पककर और कटकर तैयार हो गई है। ज्यादा लागत के कारण छोटे-बड़े किसान मजदूरों से गेंहू फसलों की कटाई न कराकर हार्वेस्टिंग मशीन चलवाते हैं, जिससे गांव के भूमिहीन मजदूरों के हाथ खाली रह जाते हैं। आलम यह है कि मजदूरों के हाथों को काम कहीं मिल नहीं रहा है, ऐसे में परिवार का पेट भरने का जिम्मा लोग सुबह से अपने परिवार के बड़े एवं बच्चों के साथ खेतों की ओर रुख कर जाते हैं और वहां चिलचिलाती धूप में फसलों के कटे पड़े अवशेषों में फसलों की बालियां व दाने बीनते नजर आते हैं।
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हार्वेस्टिंग मशीन के दौरान जिन किसानों की फसलों को सही थ्रेसिंग नहीं हो पाती है, वह किसान अपने खेतों में इन गरीब लोगों को बालियां एवं दाने बीनने का न्योता दे जाते हैं। ऐसा न्योता पाकर इन गरीबों के चेहरे पर मुस्कान बिखर जाती है। सुबह से शाम तक लोग चार - पांच किलोग्राम दाने एकत्रित कर लेते हैं।
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शराब बंदी से मिला सहारा
लॉकडाउन में शराब एवं गुटखे पर लगा। प्रतिबंध सराहनीय कदम है। अगर शराब और गुटखे पर पाबंदी नहीं होती तो कई परिवारों के हालात बद से बदतर हो जाते। हालांकि, कई जगह अवैध शराब की बिक्री हो रही है, जिस पर भी अंकुश जरूरी है।
महुआ के नहीं मिल रहे खरीदार
महुआ को बुंदेलखंड की किशमिश कहा जाता है। यही महुआ गरीब तबके के लोगों खासतौर से सहरिया आदिवासी लोगों का बड़ा सहारा होते हैं। बाजार बंद के कारण गरीबों की मेहनत को दुकानदारों ने ओने- पोने दामों में खरीद लिया। पेट के लिए महुआ बेचना गरीबों की मजबूरी रही।
आधारकार्ड लिंक न होने से छिना निवाला
राशनकार्ड पर परिवार के जितने लोगों के आधारकार्ड नंबर लिंक होंगे, उनको ही राशन उपलब्ध होगा। कोरोना के इस संकट में सरकार लोगों को मुफ्त राशन मुहैया करा रही है। जिले में पहले आधरकार्ड सुलभता से बन जाते थे। इसके बाद आधार कार्ड बैंक और डाकखानों की दहलीज पर बनने लगे। लंबी कतारें लगने लगीं। इससे कई गरीब परिवारों के पूरे सदस्यों के आज भी आधार कार्ड नहीं हैं। इससे उनको राशन नहीं मिल पा रहा।

इस साल कम हुआ महुआ
बादलों की तेज गर्जना और रात में ठंड होने से महुआ की फसलों का फूल नष्ट हो गया, जिससे इस साल महुआ बहुत कम निकल रहे हैं। जबकि, महुआ की अच्छी फसल के लिए रात में तेज गर्मी पड़ना जरूरी है।
बीमारी के कारण कोई काम नहीं मिल रहा है। खेतों में से अनाज निकालकर गुजारा कर रहे हैं। बड़ी परेशानी उठानी पड़ रही है।
- कमलो सहरिया
गांव में मजदूरी नहीं मिल रही है। पहले तो काम करने बाहर निकल जाते थे, लेकिन अब ऐसे में खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है।
- हर्षपुरवारी सहरिया
महुआ की फसल पर उम्मीद थी, लेकिन बदले मौसम, तेज गर्जना और हवा से महुआ का फूल नष्ट हो गया, जिससे हर साल की अपेक्षा इस साल महुआ बहुत कम निकल रहे हैं।
- राधा सहरिया
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