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छेवले के फूलों के रंग और ईसुरी की फागों ने दी बुंदेलखंड को पहचान

Tue, 23 Mar 2021 01:40 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Tue, 23 Mar 2021 01:40 AM IST
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bundenkhand holi celebrated
holi cutout.jpg - फोटो : holi cutout.jpg
ललितपुर। बुंदेलखंड में हुरियारे फाल्गुन माह में ईसुरी की फागें गाते हैं। खासकर परमा और दोज को ईसुरी की फागों का गायन होता है। इस दौरान पलाश के फूलों के रंग से होली खेली जाती है। बुंदेली हुरियारे होली पर ज्यादातर ईसुरी की श्रृंगार रस की फागों का गायन करते हैं। यह फागें नगड़िया की तान पर गाई जाती हैं।
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हुरियारों की टोली कमर में नगड़िया बांधकर निकलती है। ईसुरी 19वीं शताब्दी के बुंदेली के प्रसिद्ध कवि थे, जिन्होंने फाल्गुन में होली पर फागें गाईं। जो चौकड़ियों में हैं। बुंदेलखंड के हुरियारों की फाग बिना ईसुरी की फागों के अधूरी रहमी है। साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा ने इन पर कही ईसुरी फाग नाम से उपन्यास लिखा है। साहित्यकार और राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त हरगोविंद कुशवाहा के हर भाषण में ईसुरी की चौकड़ियां मौजूद रहती हैं। अब ईसुरी पर विश्वविद्यालयों के साहित्यिक संस्थानों द्वारा बहुत काम किया जा रहा है।
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कुछ इस तरह होती हैं ईसुरी की फागें
ऐंगर बैठ लेओ कछु कानें, काम जनम भर रानें, सबकों लगो रहै जीवन भर जौ नहिं कबहुं बढ़ानें, कर लओ काम घड़ी भर रै कें कछु बिगर नहीं जानें। धंधे के बीच ईसुरी करत- करत मर जाने। इसका अर्थ है कि पल भर के लिए सट के मेरे बगल में कुछ पलों के लिए बैठ लो, क्योंकि जिंदगी भर काम तो लगा ही रहना है। सभी को काम जीवन भर करना ही है, यह कभी खत्म नहीं होने वाला है। इसलिए कुछ देर मेरे पास बैठने के बाद भी कुछ बिगड़ेगा नहीं।
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ईसुरी का जन्म झांसी जिले की मऊरानीपुर तहसील के मेंड़की गांव में सन 1838 में हुआ था। इनका नाम हरलाल उर्फ ईसुरी अरजरिया था। बाद में जीवनयापन के लिए वे चतुर्भुज जमींदार के कारिंदा बन गए थे, लेकिन उन्हें बघोरा गांव से ज्यादा लगाव था। वह खुद लिखते हैं कि गंगा तट पर मरें ईसुरी ..दाग बघैरा दैहो।

- देवेंद्र गुरु, नामित सभासद
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ग्रामीण क्षेत्रों में फागों की प्रतियोगिता शुरू हो जाती है। फगुआरों की एक टोली एक फाग गाती है तो दूसरी टोली जवाबी फाग गाती है। गांवों में लोगों को इनकी फागें याद हैं, लेकिन दुखद यह है कि नई पीढ़ी इसे भूलती जा रही है। सागर युनिवर्सिटी में इनकी फागों पर कई विद्वानों ने शोध किया है।
- अक्षय किलेदार, शिक्षक
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