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सहफसली खेती की प्रयोगशाला बनी बांकेगंज की धरती
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बांकेगंज के खेत में खिले गुलदाउदी के फूल।
क्षेत्र के किसान भी लीक से हटकर खेती में नित नए कर रहे प्रयोग
स्ट्राबेरी-केला, लहसुन-पुदीना, पपीता-अदरक और फूलों की खेती से किसानों ने पकड़ी मुनाफे की राह
बांकेगंज। कस्बा के किसान पुराने समय से ही प्रयोग धर्मी रहे हैं। कभी यह नील की खेती के लिए मशहूर था तो कभी गन्ने की नई प्रजातियां उगाने में अपना नाम कमाया। पिछले कुछ सालों से गन्ना भुगतान समस्या के चलते किसानों ने यहां स्ट्राबेरी-केला, लहसुन-पपीता, पपीता-अदरक और फूलों की खेती शुरू कर नया प्रयोग किया।
स्टेशनपुरवा गांव निवासी किसान यदुनंदन सिंह पुजारी ने करीब दो दशक पहले जब स्ट्राबेरी की खेती शुरू की तो लोगों को विश्वास नहीं हुआ कि इससे वह कुछ मुनाफा भी कमा पाएंगे, लेकिन उन्होंने यहां से स्ट्राबेरी बड़े-बड़े शहरों में भेजकर न केवल पैसा, बल्कि नाम भी कमाया। परंपरागत खेती छोड़कर केले की खेती विपिन शर्मा, कृष्ण कुमार दिवाकर, अरुण मिश्रा आदि ने शुरू। उनसे प्रेरणा लेकर धौरहरा में केले की खेती शुरू हुई और वहां के किसानों के लिए खुशहाली का माध्यम बनी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां की केले की खेती और तैयार होने वाले अन्य उत्पादों का जिक्र अपने मन की बात कार्यक्रम में कर चुके हैं।
किसान यदुनंदन सिंह पुजारी ने बताया कि 16 माह में तैयार होने वाली केले की फसल में करीब 60 हजार रुपये प्रति एकड़ लागत आती है। फसल तैयार होने पर डेढ़ से दो लाख रुपये प्रति एकड़ मुनाफा होता है। इसी तरह छह माह में तैयार होने वाली स्ट्राबेरी फसल में प्रति एकड़ लागत तीन लाख और 5 से 6 लाख रुपये सालाना मुनाफा होता है, जबकि बहुवर्षीय कही जाने वाली पपीते की फसल 14 माह में तैयार होती है। इसमें प्रति एकड़ लागत 40 हजार और मुनाफा दो लाख तक ही होता है। (संवाद)
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स्ट्राबेरी-केला, लहसुन-पुदीना, पपीता-अदरक और फूलों की खेती से किसानों ने पकड़ी मुनाफे की राह
बांकेगंज। कस्बा के किसान पुराने समय से ही प्रयोग धर्मी रहे हैं। कभी यह नील की खेती के लिए मशहूर था तो कभी गन्ने की नई प्रजातियां उगाने में अपना नाम कमाया। पिछले कुछ सालों से गन्ना भुगतान समस्या के चलते किसानों ने यहां स्ट्राबेरी-केला, लहसुन-पपीता, पपीता-अदरक और फूलों की खेती शुरू कर नया प्रयोग किया।
स्टेशनपुरवा गांव निवासी किसान यदुनंदन सिंह पुजारी ने करीब दो दशक पहले जब स्ट्राबेरी की खेती शुरू की तो लोगों को विश्वास नहीं हुआ कि इससे वह कुछ मुनाफा भी कमा पाएंगे, लेकिन उन्होंने यहां से स्ट्राबेरी बड़े-बड़े शहरों में भेजकर न केवल पैसा, बल्कि नाम भी कमाया। परंपरागत खेती छोड़कर केले की खेती विपिन शर्मा, कृष्ण कुमार दिवाकर, अरुण मिश्रा आदि ने शुरू। उनसे प्रेरणा लेकर धौरहरा में केले की खेती शुरू हुई और वहां के किसानों के लिए खुशहाली का माध्यम बनी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां की केले की खेती और तैयार होने वाले अन्य उत्पादों का जिक्र अपने मन की बात कार्यक्रम में कर चुके हैं।
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किसान यदुनंदन सिंह पुजारी ने बताया कि 16 माह में तैयार होने वाली केले की फसल में करीब 60 हजार रुपये प्रति एकड़ लागत आती है। फसल तैयार होने पर डेढ़ से दो लाख रुपये प्रति एकड़ मुनाफा होता है। इसी तरह छह माह में तैयार होने वाली स्ट्राबेरी फसल में प्रति एकड़ लागत तीन लाख और 5 से 6 लाख रुपये सालाना मुनाफा होता है, जबकि बहुवर्षीय कही जाने वाली पपीते की फसल 14 माह में तैयार होती है। इसमें प्रति एकड़ लागत 40 हजार और मुनाफा दो लाख तक ही होता है। (संवाद)
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