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छोटीकाशी में मृग रूप में घूमे थे शिव, कई पुराणों में है उत्तर गोकर्ण के माहात्म्य का वर्णन
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शिवलिंग तैयार करते लोग।
शिव मंदिर में भगवान भोलेनाथ का चारों प्रहर होगा शृंगार
नीलकंठ मैदान में 151 पार्थिव शिवलिंग का होगा रूद्र रुद्रा महाभिषेक
गोला गोकर्णनाथ। मंदिरों की नगरी के रूप में काशी की तरह प्रसिद्ध गोला गोकर्णनाथ में पुरातन काल में यहां के वनों और भू-भाग में भगवान शंकर ने मृग रूप में विचरण किया था। पवित्र और सिद्ध क्षेत्र गोला नगरी में महाशिवरात्रि को लेकर जहां एक और भगवान शिव के पौराणिक मंदिर को सजाया जा रहा है, वहीं नीलकंठ मैदान में होने वाले महारुद्राभिषेक की तैयारियां भी जोरों पर हैं। महाशिवरात्रि पर नगर शिवमय हो जाता है। पौराणिक शिव मंदिर की साज-सज्जा के साथ आयोजन की तैयारियां शुरू हो गई हैं।
वराह पुराण में है गोला गोकर्णनाथ का वर्णन
वराह पुराण में वर्णन है कि भगवान शंकर वैराग्य उत्पन्न होने पर इस वन क्षेत्र में भ्रमण करने आए थे और सुंदर स्थान देखकर यहीं रम गए थे। ब्रह्मा विष्णु और देवराज इंद्र को चिंता हुई वह उन्हें ढूंढने के लिए निकले तो इस वन प्रांत में विशाल मृग को सोते देखकर यही शिव है ऐसा विचार कर निकट गए तो आहट पाकर मृग भागा। फिर देवताओं ने उनका पीछा कर उनके सींग पकड़ लिए दो वह तीन टुकड़ों में विभक्त हो गया। उनमें से सींग का मूल भगवान विष्णु ने यहां स्थापित किया, जो गोकर्णनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। सींग का दूसरा टुकड़ा ब्रह्मा जी ने बिहार के श्रंगवेश्वर में स्थापित किया। तीसरा टुकड़ा देवराज इंद्र अपने साथ ले गए, जिसे उन्होंने अमरावती में स्थापित किया। रावण पुत्र मेघनाद ने जब इंद्र पर आक्रमण कर उन्हें परास्त किया तो रावण अमरावती से वह श्रंग लंका ले जाने के लिए कांवड़ में लेकर चला किंतु परिस्थितियों बस वह श्रंग दक्षिण गोकर्ण में स्थापित हो गया। यह प्रसंग एवं शिव का वर्णन शिव पुराण, वामन पुराण, कूर्म पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है।
नीलकंठ मैदान में 151 पार्थिव शिवलिंग का होगा रुद्रामहाभिषेक
इस बार भी शिव भक्तों ने उत्साह के साथ महाशिवरात्रि की तैयारियां शुरू कर दी हैं। जहां महाशिवरात्रि पर जहां एक और शिव मंदिर में भगवान भोलेनाथ का रात्रि के चारों पहर पूजन और शृंगार होगा। भक्त रात जागरण करेंगे। वहीं नीलकंठ मैदान में भव्य पंडाल के अंदर 151 पार्थिव शिवलिंग से सजी वेदियों पर दूरदराज से आए अजमान भगवान शिव का रात के चारों पर प्रहर रुद्राभिषेक करेंगे। आयोजक एवं आचार्य पंडित राम देव मिश्र शास्त्री शिव भक्तों के साथ पार्थिव शिवलिंग तैयार करने में जुटे हैं। चित्रकार अनिरुद्ध कुमार वर्मा और सौरभ कुमार की टीम गोकर्ण तीर्थ के आरती चबूतरे पर महाशिवरात्रि की शाम 5:00 बजे आकर्षक रंगोली सजाएंगे। जबकि, आयोजक दीपक सक्सेना ने बताया कि विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी गोकर्ण तीर्थ तट पर 12वां दीप यज्ञ शाम 5:00 बजे से हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा।
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शिवालयों की नगरी है छोटी काशी
पौराणिक शिव मंदिर के साथ छोटी काशी गोला गोकर्णनाथ की पहचान मंदिरों और शिवालयों के रूप में है। अलीगंज रोड पर 1920 में निर्मित बाबा गोकर्ण मंदिर, मोहम्मदी रोड पर प्राचीन कंजा देवस्थान पर स्थापित द्वादश ज्योतिर्लिंग, खुटार रोड पर मंगला देवी सिद्ध पीठ, फुल बाबा मंदिर देवालय, तंत्र साधना पर आधारित बाबा त्रिलोकी नाथ मंदिर, नगर से खुटार रोड पर 5 किलोमीटर की दूरी पर बाबा क्लेश हरण धाम आस्था का केंद्र है यह देवालय सुदूर क्षेत्रों तक अपनी महत्ता के लिए विख्यात है।
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नीलकंठ मैदान में 151 पार्थिव शिवलिंग का होगा रूद्र रुद्रा महाभिषेक
गोला गोकर्णनाथ। मंदिरों की नगरी के रूप में काशी की तरह प्रसिद्ध गोला गोकर्णनाथ में पुरातन काल में यहां के वनों और भू-भाग में भगवान शंकर ने मृग रूप में विचरण किया था। पवित्र और सिद्ध क्षेत्र गोला नगरी में महाशिवरात्रि को लेकर जहां एक और भगवान शिव के पौराणिक मंदिर को सजाया जा रहा है, वहीं नीलकंठ मैदान में होने वाले महारुद्राभिषेक की तैयारियां भी जोरों पर हैं। महाशिवरात्रि पर नगर शिवमय हो जाता है। पौराणिक शिव मंदिर की साज-सज्जा के साथ आयोजन की तैयारियां शुरू हो गई हैं।
वराह पुराण में है गोला गोकर्णनाथ का वर्णन
वराह पुराण में वर्णन है कि भगवान शंकर वैराग्य उत्पन्न होने पर इस वन क्षेत्र में भ्रमण करने आए थे और सुंदर स्थान देखकर यहीं रम गए थे। ब्रह्मा विष्णु और देवराज इंद्र को चिंता हुई वह उन्हें ढूंढने के लिए निकले तो इस वन प्रांत में विशाल मृग को सोते देखकर यही शिव है ऐसा विचार कर निकट गए तो आहट पाकर मृग भागा। फिर देवताओं ने उनका पीछा कर उनके सींग पकड़ लिए दो वह तीन टुकड़ों में विभक्त हो गया। उनमें से सींग का मूल भगवान विष्णु ने यहां स्थापित किया, जो गोकर्णनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। सींग का दूसरा टुकड़ा ब्रह्मा जी ने बिहार के श्रंगवेश्वर में स्थापित किया। तीसरा टुकड़ा देवराज इंद्र अपने साथ ले गए, जिसे उन्होंने अमरावती में स्थापित किया। रावण पुत्र मेघनाद ने जब इंद्र पर आक्रमण कर उन्हें परास्त किया तो रावण अमरावती से वह श्रंग लंका ले जाने के लिए कांवड़ में लेकर चला किंतु परिस्थितियों बस वह श्रंग दक्षिण गोकर्ण में स्थापित हो गया। यह प्रसंग एवं शिव का वर्णन शिव पुराण, वामन पुराण, कूर्म पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है।
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नीलकंठ मैदान में 151 पार्थिव शिवलिंग का होगा रुद्रामहाभिषेक
इस बार भी शिव भक्तों ने उत्साह के साथ महाशिवरात्रि की तैयारियां शुरू कर दी हैं। जहां महाशिवरात्रि पर जहां एक और शिव मंदिर में भगवान भोलेनाथ का रात्रि के चारों पहर पूजन और शृंगार होगा। भक्त रात जागरण करेंगे। वहीं नीलकंठ मैदान में भव्य पंडाल के अंदर 151 पार्थिव शिवलिंग से सजी वेदियों पर दूरदराज से आए अजमान भगवान शिव का रात के चारों पर प्रहर रुद्राभिषेक करेंगे। आयोजक एवं आचार्य पंडित राम देव मिश्र शास्त्री शिव भक्तों के साथ पार्थिव शिवलिंग तैयार करने में जुटे हैं। चित्रकार अनिरुद्ध कुमार वर्मा और सौरभ कुमार की टीम गोकर्ण तीर्थ के आरती चबूतरे पर महाशिवरात्रि की शाम 5:00 बजे आकर्षक रंगोली सजाएंगे। जबकि, आयोजक दीपक सक्सेना ने बताया कि विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी गोकर्ण तीर्थ तट पर 12वां दीप यज्ञ शाम 5:00 बजे से हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा।
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शिवालयों की नगरी है छोटी काशी
पौराणिक शिव मंदिर के साथ छोटी काशी गोला गोकर्णनाथ की पहचान मंदिरों और शिवालयों के रूप में है। अलीगंज रोड पर 1920 में निर्मित बाबा गोकर्ण मंदिर, मोहम्मदी रोड पर प्राचीन कंजा देवस्थान पर स्थापित द्वादश ज्योतिर्लिंग, खुटार रोड पर मंगला देवी सिद्ध पीठ, फुल बाबा मंदिर देवालय, तंत्र साधना पर आधारित बाबा त्रिलोकी नाथ मंदिर, नगर से खुटार रोड पर 5 किलोमीटर की दूरी पर बाबा क्लेश हरण धाम आस्था का केंद्र है यह देवालय सुदूर क्षेत्रों तक अपनी महत्ता के लिए विख्यात है।