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तराई की धरती पर जन्मी सात देवियों के नाम से होता है नवरात्र में कन्या भोज
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बिजुआ क्षेत्र में राजा वेन सरोवर के पास बना देवी मंदिर।
महाभारत काल के राजा बेन के घर सात कन्याओं के रूप में जन्म लिया था देवी ने
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बिजुआ के शाहपुर गांव में आज भी मौजूद राजा बेन के साम्राज्य के अवशेष
लखीमपुर खीरी। आदिशक्ति की उपासना का पर्व नवरात्रि चल रहा है। नौ रात्रियों की इस पवित्र शृंखला में भक्त शक्ति की उपासना कर, खुद में ऊर्जा का संचय करता है और आखिर में नवमी के दिन कन्याओं को भोज कर भगवती की सिद्धि प्राप्त करता है, लेकिन खीरी में नवरात्रियों में सात कन्याओं को भोज की परंपरा है।
तराई क्षेत्र प्राचीन काल से शिव और शक्ति की उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां नवरात्र में सात कन्याओं को कुमारी भोज कराने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आम तौर से नवरात्र में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा होती है, लेकिन यहां सात कन्याओं को ही भोज कराने की परंपरा है। इसके पीछे की कथा खीरी जिले से जुड़ी हुई है। इस प्राचीन परंपरा को महाभारत कालीन राजा बेन की सात कन्याओं से जोड़ा जाता है, जो देवी के रूप में तराई क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर स्थापित और पूजित हैं।
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महाभारत कालीन राजा बेन का साम्राज्य नेपाल से लेकर पीलीभीत जिले के देहुआ नदी के बाएं किनारे से गोमती नदी के बाएं किनारे के समस्त भूभाग और सीतापुर जिले तक फैला था। खीरी जिले का डिस्ट्रिक्ट गजेटियर भी इस बात की पुष्टि करता है। राजा बेन के सात पुत्रियां और एक पुत्र विराट हुए। पांडवों ने द्यूत क्रीड़ा में पराजित होने पर 12 वर्ष के वनवास के बाद एक वर्ष का अज्ञातवास राजा विराट के राज्य में बिताया था। इसके प्रमाण मोहम्मदी तहसील के बलमियां बरखर में मिलते हैं। वहां महाभारत कालीन टीले, सरोवर और मंदिर पांडवों के अज्ञातवास के साक्षी हैं। जहां टीलों और खेतों से यदा कदा प्राचीन मुद्राएं और बर्तन आदि मिल जाते हैं।
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किंवदंती है कि राजा बेन की पत्नी मां भगवती की परम भक्त थीं। उनकी भक्ति और उपासना से प्रसन्न होकर देवी ने उनके यहां सात कन्याओं के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया था। कालांतर में रानी के गर्भ से सात कन्याओं का जन्म हुआ। यह कन्याएं देवी रूप में तराई क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर स्थापित होकर देवी के रूप में पूजित हैं। लखीमपुर में संकटादेवी, शीतला देवी, वंकटा देवी, नैमिषारण्य की ललिता देवी, गोला की मंगला देवी और उत्तराखंड की मां मंसा देवी, मां पूर्णागिरि देवी राजा बेन की ही देवी स्वरूपा कन्याएं मानी जाती हैं और इन्हीं के नाम से सात कन्याओं को भोजन कराने की परंपरा प्रचलित है।
खीरी जिले के ब्लॉक बिजुआ में शाहपुर नामक गांव के पास महाभारत कालीन राजा बेन का महल और किला था। राजा बेन ने अपने महल/किले के पास ही सुंदर और विशाल सरोवर बनवाया था। सरोवर के बीच मुख्य मंदिर था, जो क्षरित हो चुका है उसके खंभे और अवशेष आज भी इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। मान्यता है कि राजा बेन ने अपनी पुत्रियों के स्नान के लिए इस सरोवर का निर्माण कराया था। जिस सरोवर में कभी असंख्य कमल खिला करते थे उसमें अब जलकुंभी फैली नजर आती है। सरोवर के बड़े हिस्से पर अवैध कब्जे हो चुके है।
तालाब किनारे एक छोटा सा देवी मंदिर है। बताते हैं कि कभी यहां भव्य मंदिर था। इसके क्षरित होने के बाद स्थानीय लोगों ने उसी जगह एक छोटा सा मंदिर बना दिया है। सरोवर के पूरब में एक ऊंचा टीला है, जो गदाईनाथ मंदिर और सरोवर के बीच पड़ता है। बताते हैं कि इसी टीले के नीचेे राजा वेन के महल के खंडहर दबे हुए हैं। सरोवर के पूरब दो पुराने मठ और चबूतरे बने हुए हैं, जिन्हें राजा वेन और उनकी रानी की समाधियां कहा जाता है। वर्ष 1998 में तालाब तक जाने के लिए बाबा भिखारी लाल राना ने एक पुल बनवाया था। तालाब में एक कुंआ भी है, जो जलकुंभी के कारण अब दिखाई नहीं देता। टीले का रूप ले चुके राजा बेन के महल और किले के खंडहर अब शारदा नदी की कटान की जद में आ चुके हैं। शारदा नदी इस टीले और सरोवर से महज चंद मीटर की दूरी पर रह गई है। यदि शारदा के कटान की यही गति रही तो आने वाले समय में महाभारत काल के राजा बेन के अवशेष शारदा में समा जाएंगे।
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बिजुआ के शाहपुर गांव में आज भी मौजूद राजा बेन के साम्राज्य के अवशेष लखीमपुर खीरी। आदिशक्ति की उपासना का पर्व नवरात्रि चल रहा है। नौ रात्रियों की इस पवित्र शृंखला में भक्त शक्ति की उपासना कर, खुद में ऊर्जा का संचय करता है और आखिर में नवमी के दिन कन्याओं को भोज कर भगवती की सिद्धि प्राप्त करता है, लेकिन खीरी में नवरात्रियों में सात कन्याओं को भोज की परंपरा है।
तराई क्षेत्र प्राचीन काल से शिव और शक्ति की उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां नवरात्र में सात कन्याओं को कुमारी भोज कराने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आम तौर से नवरात्र में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा होती है, लेकिन यहां सात कन्याओं को ही भोज कराने की परंपरा है। इसके पीछे की कथा खीरी जिले से जुड़ी हुई है। इस प्राचीन परंपरा को महाभारत कालीन राजा बेन की सात कन्याओं से जोड़ा जाता है, जो देवी के रूप में तराई क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर स्थापित और पूजित हैं।
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महाभारत कालीन राजा बेन का साम्राज्य नेपाल से लेकर पीलीभीत जिले के देहुआ नदी के बाएं किनारे से गोमती नदी के बाएं किनारे के समस्त भूभाग और सीतापुर जिले तक फैला था। खीरी जिले का डिस्ट्रिक्ट गजेटियर भी इस बात की पुष्टि करता है। राजा बेन के सात पुत्रियां और एक पुत्र विराट हुए। पांडवों ने द्यूत क्रीड़ा में पराजित होने पर 12 वर्ष के वनवास के बाद एक वर्ष का अज्ञातवास राजा विराट के राज्य में बिताया था। इसके प्रमाण मोहम्मदी तहसील के बलमियां बरखर में मिलते हैं। वहां महाभारत कालीन टीले, सरोवर और मंदिर पांडवों के अज्ञातवास के साक्षी हैं। जहां टीलों और खेतों से यदा कदा प्राचीन मुद्राएं और बर्तन आदि मिल जाते हैं।
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किंवदंती है कि राजा बेन की पत्नी मां भगवती की परम भक्त थीं। उनकी भक्ति और उपासना से प्रसन्न होकर देवी ने उनके यहां सात कन्याओं के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया था। कालांतर में रानी के गर्भ से सात कन्याओं का जन्म हुआ। यह कन्याएं देवी रूप में तराई क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर स्थापित होकर देवी के रूप में पूजित हैं। लखीमपुर में संकटादेवी, शीतला देवी, वंकटा देवी, नैमिषारण्य की ललिता देवी, गोला की मंगला देवी और उत्तराखंड की मां मंसा देवी, मां पूर्णागिरि देवी राजा बेन की ही देवी स्वरूपा कन्याएं मानी जाती हैं और इन्हीं के नाम से सात कन्याओं को भोजन कराने की परंपरा प्रचलित है।
खीरी जिले के ब्लॉक बिजुआ में शाहपुर नामक गांव के पास महाभारत कालीन राजा बेन का महल और किला था। राजा बेन ने अपने महल/किले के पास ही सुंदर और विशाल सरोवर बनवाया था। सरोवर के बीच मुख्य मंदिर था, जो क्षरित हो चुका है उसके खंभे और अवशेष आज भी इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। मान्यता है कि राजा बेन ने अपनी पुत्रियों के स्नान के लिए इस सरोवर का निर्माण कराया था। जिस सरोवर में कभी असंख्य कमल खिला करते थे उसमें अब जलकुंभी फैली नजर आती है। सरोवर के बड़े हिस्से पर अवैध कब्जे हो चुके है।
तालाब किनारे एक छोटा सा देवी मंदिर है। बताते हैं कि कभी यहां भव्य मंदिर था। इसके क्षरित होने के बाद स्थानीय लोगों ने उसी जगह एक छोटा सा मंदिर बना दिया है। सरोवर के पूरब में एक ऊंचा टीला है, जो गदाईनाथ मंदिर और सरोवर के बीच पड़ता है। बताते हैं कि इसी टीले के नीचेे राजा वेन के महल के खंडहर दबे हुए हैं। सरोवर के पूरब दो पुराने मठ और चबूतरे बने हुए हैं, जिन्हें राजा वेन और उनकी रानी की समाधियां कहा जाता है। वर्ष 1998 में तालाब तक जाने के लिए बाबा भिखारी लाल राना ने एक पुल बनवाया था। तालाब में एक कुंआ भी है, जो जलकुंभी के कारण अब दिखाई नहीं देता। टीले का रूप ले चुके राजा बेन के महल और किले के खंडहर अब शारदा नदी की कटान की जद में आ चुके हैं। शारदा नदी इस टीले और सरोवर से महज चंद मीटर की दूरी पर रह गई है। यदि शारदा के कटान की यही गति रही तो आने वाले समय में महाभारत काल के राजा बेन के अवशेष शारदा में समा जाएंगे।