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Lakhimpur Kheri News: कुएं में गिट्टी, जुबां पर हू-हू... यही है भूतनाथ मेले की पहचान
Sat, 22 Aug 2026 12:58 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Sat, 22 Aug 2026 12:58 AM IST
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गोला के भूतनाथ मंदिर परिसर में प्राचीन कुआं। संवाद
गोला गोकर्णनाथ। भगवान शिव की नगरी में कई दर्शनीय शिवालय और सिद्ध स्थल हैं। इनमें भूतनाथ नाम से प्रसिद्ध अनोखा दो शिखरों वाला मंदिर और प्राचीन कुआं है। यहां सावन में नाग पंचमी के बाद पड़ने वाले सोमवार को मेला लगता आया है। आस्था और लोक संस्कृति के इस संगम में श्रद्धालु शिव के दर्शन करने के साथ अनूठी परंपराएं निभाते हैं।
श्रद्धालु भूतनाथ मंदिर में मनौती की गांठ बांधते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर उसे खोलते हैं। मंदिर और कुएं में गिट्टी डालकर हू-हू की आवाजें बोलते हैं। दूरदराज से आए ग्रामीण श्रद्धालु ढोलक, मंजीरा, चिपटा और झांझ बजाते हुए लोक नृत्य करते हैं और सावन गीत व भजन गाते हैं।
नगर निवासी और गोला गोकर्णनाथ पर शोध लिख रहे साहित्यकार लोकेश कुमार गुप्त ने बताया कि सरस्वती तट पर शैव संप्रदाय के संत बाबा भूतनाथ का आश्रम था। बाबा सर्प विद्या के अद्भुत जानकार थे। उनके आश्रम में विभिन्न प्रजातियों के नाग व सर्प विचरण करते थे।
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महाभारत काल में महाराजा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय द्वारा देवकली तीर्थ पर करवाए गए नाग यज्ञ में बाबा ने अपनी सर्प विद्या के प्रभाव का प्रदर्शन किया था।
बाबा के आश्रम में नाग पंचमी को मेला लगता था, जिसमें हजारों की भीड़ जुटती थी। बाबा के पंचतत्व में विलीन होने के बाद मेला नाग पंचमी के बाद के सोमवार को शुरू हो गया, जो अब विशाल रूप ले चुका है। शिव के अनन्य भक्त बाबा भूतनाथ की कुटिया में स्थापित शिवलिंग उन्हीं के नाम से पूजा जाता है। शिव का जुड़वां मंदिर देश में कहीं भी देखने को नहीं मिलता है। समीप ही बाबा का कुआं स्थापित है।
एक किंवदंती यह भी है कि लंकापति राजा रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी रावण की कांवड़ में बैठकर लंका के लिए चल पड़े। जाने से पहले शिवजी ने शर्त रखी कि यदि उन्हें कहीं रख दिया गया तो वहीं स्थापित हो जाएंगे। इस स्थान पर शिवजी की माया से रावण को लघुशंका महसूस हुई। उसने एक चरवाहे को कांवड़ पकड़ा दी और नित्यकर्म के लिए चला गया।
शिवजी अपना भार बढ़ाकर यहीं स्थापित हो गए। लौटकर शिवजी को स्थापित देखकर रावण ने चरवाहे का पीछा किया तो वह भय से यहां कुएं में कूद गया और यह स्थान भूतनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
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प्रकृति के बीच लगता है भव्य मेला
भगवान शिव के मंदिर से करीब दो किलोमीटर दूर रेलवे लाइन किनारे वन क्षेत्र से सटे प्राकृतिक वातावरण में बाबा भूतनाथ का मंदिर है। यहां भव्य मेला लगता है, जो आस्था और लोक संस्कृति का परिचायक है।
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मेले में दिखती हैं विलुप्त होती वस्तुएं
आधुनिकता के दौर में विलुप्त होती जा रही वस्तुओं के भी दर्शन भूतनाथ मेले में होते हैं। लोग इन्हें खरीदने दूर-दूर से आते हैं। मेले में हसिया, खुरपी, बैलों के गले में बांधने वाले घंटे, पसाई के चावल, चिलम, नारियल के खोल से बने हुक्के, लकड़ी का फर्नीचर और कंदमूल फल सहित तमाम ऐसी वस्तुएं मिलती हैं।
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श्रद्धालु भूतनाथ मंदिर में मनौती की गांठ बांधते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर उसे खोलते हैं। मंदिर और कुएं में गिट्टी डालकर हू-हू की आवाजें बोलते हैं। दूरदराज से आए ग्रामीण श्रद्धालु ढोलक, मंजीरा, चिपटा और झांझ बजाते हुए लोक नृत्य करते हैं और सावन गीत व भजन गाते हैं।
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नगर निवासी और गोला गोकर्णनाथ पर शोध लिख रहे साहित्यकार लोकेश कुमार गुप्त ने बताया कि सरस्वती तट पर शैव संप्रदाय के संत बाबा भूतनाथ का आश्रम था। बाबा सर्प विद्या के अद्भुत जानकार थे। उनके आश्रम में विभिन्न प्रजातियों के नाग व सर्प विचरण करते थे।
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महाभारत काल में महाराजा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय द्वारा देवकली तीर्थ पर करवाए गए नाग यज्ञ में बाबा ने अपनी सर्प विद्या के प्रभाव का प्रदर्शन किया था।
बाबा के आश्रम में नाग पंचमी को मेला लगता था, जिसमें हजारों की भीड़ जुटती थी। बाबा के पंचतत्व में विलीन होने के बाद मेला नाग पंचमी के बाद के सोमवार को शुरू हो गया, जो अब विशाल रूप ले चुका है। शिव के अनन्य भक्त बाबा भूतनाथ की कुटिया में स्थापित शिवलिंग उन्हीं के नाम से पूजा जाता है। शिव का जुड़वां मंदिर देश में कहीं भी देखने को नहीं मिलता है। समीप ही बाबा का कुआं स्थापित है।
एक किंवदंती यह भी है कि लंकापति राजा रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी रावण की कांवड़ में बैठकर लंका के लिए चल पड़े। जाने से पहले शिवजी ने शर्त रखी कि यदि उन्हें कहीं रख दिया गया तो वहीं स्थापित हो जाएंगे। इस स्थान पर शिवजी की माया से रावण को लघुशंका महसूस हुई। उसने एक चरवाहे को कांवड़ पकड़ा दी और नित्यकर्म के लिए चला गया।
शिवजी अपना भार बढ़ाकर यहीं स्थापित हो गए। लौटकर शिवजी को स्थापित देखकर रावण ने चरवाहे का पीछा किया तो वह भय से यहां कुएं में कूद गया और यह स्थान भूतनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
प्रकृति के बीच लगता है भव्य मेला
भगवान शिव के मंदिर से करीब दो किलोमीटर दूर रेलवे लाइन किनारे वन क्षेत्र से सटे प्राकृतिक वातावरण में बाबा भूतनाथ का मंदिर है। यहां भव्य मेला लगता है, जो आस्था और लोक संस्कृति का परिचायक है।
मेले में दिखती हैं विलुप्त होती वस्तुएं
आधुनिकता के दौर में विलुप्त होती जा रही वस्तुओं के भी दर्शन भूतनाथ मेले में होते हैं। लोग इन्हें खरीदने दूर-दूर से आते हैं। मेले में हसिया, खुरपी, बैलों के गले में बांधने वाले घंटे, पसाई के चावल, चिलम, नारियल के खोल से बने हुक्के, लकड़ी का फर्नीचर और कंदमूल फल सहित तमाम ऐसी वस्तुएं मिलती हैं।

गोला के भूतनाथ मंदिर परिसर में प्राचीन कुआं। संवाद