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Kushinagar News: कभी खेतों की तकदीर लिखता था सेवरही, अब वजूद पर संकट

Sat, 10 Oct 2026 01:45 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sat, 10 Oct 2026 01:45 AM IST
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Sevarahi once shaped the destiny of the fields; now, its very existence is in jeopardy.
कभी थे 21 अनुभाग 40 वैज्ञानिक... अब एक वैज्ञानिक के सहारे पूर्वांचल का बैकबोन गन्ना अनुसंधान संस्थान
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53 गन्ना प्रजातियां विकसित करने वाले संस्थान की बदलने जा रही भूमिका, बीज संवर्धन की गतिविधियां लखीमपुर स्थानांतरित करने की तैयारी

कुशीनगर। कभी 21 अनुभागों और लगभग 40 वैज्ञानिकों और 250 से अधिक अधिकारियों-कर्मचारियों के सहारे पूरे यूपी और पूर्वांचल को कृषि के क्षेत्र में नई राह दिखाने वाला इन दिनों संकट से जूझ रहा है। सेवरही के बभनौली कोठी का गेंदा सिंह गन्ना प्रजनन एवं अनुसंधान संस्थान 1988 आज महज एक संयुक्त निदेशक और एक वरिष्ठ वैज्ञानिक के भरोसे ही संचालित हो रहा है।
पांच दशक पहले 1975 में गन्ना बीज संवर्धन केंद्र के रूप में शुरू हुआ सेवरही के बभनौली कोठी का गेंदा सिंह गन्ना प्रजनन एवं अनुसंधान संस्थान 1988 में पूर्ण गन्ना प्रजनन अनुसंधान संस्थान बना। पूर्वांचल की गन्ना खेती को नई पहचान देने में इसकी अहम भूमिका रही। यहीं विकसित कोसे शृंखला की प्रजाति के गन्ना बीज पूरे पूर्वांचल में काफी लोकप्रिय हुए।
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अब संस्थान की भूमिका में बदलाव की तैयारी है। परिसर को कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय अंतर्गत बहुविषयक कृषि अनुसंधान केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना के बीच गन्ना बीज संवर्धन की प्रमुख गतिविधियों को लखीमपुर स्थानांतरित करने का प्रस्ताव भी चर्चा में है। कैबिनेट का मुहर तो फिलहाल नहीं लगा है लेकिन संस्थान ने संसाधन अपने दूसरे केंद्र लखीमपुर शिफ्ट करने की तैयारी शुरू कर दी है हालांकि अभी शासन स्तर से निर्णय नहीं मिला है।
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53 प्रजातियों के उन्नत बीज किया है विकसित

वर्ष 1975 में गन्ना बीज संवर्धन केंद्र के रूप में शुरू हुआ यह संस्थान 1988 में पूर्ण गन्ना प्रजनन एवं अनुसंधान संस्थान बना। अब तक यहां गन्ने की 53 प्रजातियां विकसित की जा चुकी हैं। कोसे 92423 जैसी प्रजाति लंबे समय तक किसानों के बीच लोकप्रिय रही। संस्थान से तैयार उन्नत बीज पूर्वांचल के विभिन्न जिलों तक पहुंचता रहा है। ऐसे में इसकी भूमिका केवल पुरानी उपलब्धियों तक सीमित नहीं बल्कि मौजूदा गन्ना खेती की जरूरतों से भी जुड़ी है। गेंदा सिंह गन्ना प्रजनन एवं अनुसंधान संस्थान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यहां शोध कार्य पूरी तरह रुका नहीं है। संस्थान उपेक्षित जरूर होता गया वैज्ञानिक शाहजहांपुर संबद्ध जरूर होते चले गए लेकिन संस्थान अब तक 53 गन्ना प्रजातियां विकसित कर चुका है और बीज उत्पादन का कार्य भी नियमित रूप से जारी है।
संस्थान को प्रस्तावित महात्मा बुद्ध कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से जोड़ने और बहुविषयक अनुसंधान केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है। इसके तहत गन्ने के साथ दलहन, तिलहन, सब्जियों और अन्य फसलों पर शोध की संभावनाएं हैं। वहीं, गन्ना बीज संवर्धन की प्रमुख गतिविधियों को लखीमपुर स्थानांतरित करने की तैयारी ने संस्थान की भविष्य की भूमिका को महत्वपूर्ण बना दिया है। हालांकि गन्ने पर शोध जारी रहेगा।

लाइब्रेरी में बंद है पांच दशक का वैज्ञानिक इतिहास

संस्थान की लाइब्रेरी में करीब 25 हजार पुस्तकें, शोध पत्र, जर्नल और तकनीकी दस्तावेज सुरक्षित हैं। अमेरिका और विदेशी ऑथर्स के बुक है लेकिन बड़ी पुस्तकालय में छत पर लगी फाल सीलिंग गिर गई है। भवन की जर्जर स्थिति और सीमित संसाधनों के कारण यह संग्रह शोधार्थियों के लिए उपयोगी होने के बजाय धीरे-धीरे उपेक्षा का शिकार होता जा रहा है।

कोट

अभी शासन स्तर से अंतिम निर्णय नहीं आया है। चर्चा है कि इस संस्थान को कृषि विश्वविद्यालय अंतर्गत शोध का केंद्र बनाया जाए और हमें जमीन मिलने के बाद शाहजहांपुर शिफ्ट किया जाएगा। हालांकि शोध कार्य चलेंगे और कुशीनगर का लक्ष्मीपुर केंद्र यथावत संचालित रहेगा।
-सुभाष चंद्र सिंह, संयुक्त निदेशक गन्ना अनुसंधान संस्थान
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