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फिर कलकल करती बहेगी हिरण्यावती नदी

Wed, 19 Feb 2020 11:36 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Wed, 19 Feb 2020 11:36 PM IST
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hirnyawati river willbe revived
कसया में एनएच के किनारे बहती हिरण्यावती नदी। - फोटो : KUSHINAGAR
फिर कलकल करती बहेगी हिरण्यावती नदी
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पडरौना। बौद्ध धर्म के लोगों के लिए गंगा के समान पवित्र नदी हिरण्यावती का उद्गम मिल गया है। पानी की कमी व अतिक्रमण के चलते वजूद खो चुकी इस नदी की नए सिरे से तलाश शुरू की गई है। अतिक्रमण हटाने के साथ ही मनरेगा के बजट से नदी की खुदाई कराई जाएगी। सीडीओ की पहल पर राजस्व, सिंचाई, बाढ़ खंड व कसाडा ने मिलकर इस नदी को पुनर्जीवित करने का प्रयास शुरू कर दिया है। अगर सब कुछ ठीक रहा तो अगले बरसात तक कलकल करती यह नदी बहने लगेगी।
बौद्धकालीन मल्ल गणराज्य की राजधानी कुशीनारा (कुशीनगर का प्राचीन नाम) हिरण्यावती नदी के तट पर स्थित था। बुद्ध चरित के अनुसार, हिरण्यावती नदी का जल पीकर ही तथागत बुद्ध ने बौद्ध भिक्षुओं को अंतिम उपदेश दिया था। इसी नदी के किनारे तथागत बुद्ध को महापरिनिर्वाण प्राप्त हुआ था। बौद्ध धर्म के लोगों के लिए यह नदी गंगा के समान पवित्र है। परंतु पानी की कमी और अतिक्रमण के चलते यह नदी मृतप्राय हो चुकी है।
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सीडीओ आनंद कुमार ने व्यक्तिगत रुचि लेकर पहले इसके उद्गम की तलाश शुरू कराई। इसके लिए बाढ़ खंड व सिंचाई विभाग के अलावा कसाडा की भी मदद ली गई। नदी के किनारे बसे गांवों के लोगों से जानकारी जुटाने के लिए पंचायतीराज विभाग की मदद ली गई। इसके बाद राजस्व और विकास विभाग ने मिलकर प्रयास शुरू किया। राजस्व अभिलेख में दर्ज बरसाती नालों व जमीनों की पुरानी नवैयत के आधार पर इस नदी का उद्गम रामकोला ब्लॉक के सपहां गांव के ताल को माना गया है। नदी के पुराने रास्ते पर जगह-जगह अतिक्रमण है। कई जगह यह बरसाती नाले के रूप में है तो कुछ जगहों पर अस्तित्व ही खत्म हो चुका है। बाढ़ खंड के अधिशासी अभियंता भरत राम ने बताया कि इस नदी की लंबाई अभिलेखों के अनुसार 49.370 किमी है। बाढ़ खंड नदी की सफाई में तकनीकी सहयोग दे रहा है।
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कप्तानगंज के एसडीएम अरविंद कुमार का कहना है कि इस नदी के पुनरोद्धार के लिए राजस्व कर्मियों की टीम लगाकर जमीन का सीमांकन करा लिया गया है। अवैध कब्जा हटाने के लिए शीघ्र ही नोटिस जारी किया जाएगा। इसके बाद अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू की जाएगी।
परवरपार होते हुए कुशीनगर की तरफ है नदी का बहाव
लक्ष्मीगंज। हिरण्यावती नदी का उद्गम स्थल सपहा गांव का ताल है। यहां से सिधावें, बसडीला, मोतीपाकड़, कठघरही, परवरपार, अहिरौली कुसुम्ही से होते नदी कुशीनगर तक पहुंचती है। कुशीनगर से आगे बढ़ने पर कुड़वा दिलीपनगर गांव में घाघी नदी से मिलती है। घाघी नदी आगे छोटी गंडक में जाकर मिलती है। तथागत बुद्ध का परिनिर्वाण हिरण्यावती नदी के तट पर हुआ था, जहां अब रामाभार स्तूप है।
अब तक केवल कुशीनगर में होती थी सफाई
प्रशासन ने सितंबर 2012 में पहली बार इस नदी को पुनर्जिवित करने के लिए प्रयास किया था। तत्कालीन डीएम रिग्जियान सैंफिल ने हिरण्यावती नदी की खोज के लिए राजस्व कर्मियों की ड्यूटी लगाई थी। लेकिन काम पूरा नहीं हुआ। बाद में डीएम रहे लोकेश एम व शंभू कुमार ने भी इसमें रुचि दिखाई लेकिन उद्गम स्थल की तलाश की बजाय कुशीनगर के पास ही नदी के बचे हुए हिस्से की साफ सफाई कराकर काम बंद करा दिया गया। डीएम रहे आंद्रा वामसी ने भी इस नदी को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की योजना बनाई लेकिन उन्होंने भी कुशीनगर में ही इस नदी की सफाई व घाटों को पक्का कराने का कार्य कराया।

समन्वित प्रयास से बदलेगी सूरत
सीडीओ आनंद कुमार ने बताया कि ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हिरण्यावती नदी का उद्गम स्थल खोज लिया गया है। नदी के रास्ते पर अतिक्रमण को भी चिह्नित कर लिया गया है। अतिक्रमण हटने के बाद ग्राम पंचायतें मनरेगा के बजट से इसकी सफाई कराएंगी। बाढ़ खंड इसमें तकनीकी सहयोग करेगा। कुशीनगर नगर पालिका इस नदी में गिरने वाले गंदे नाले को बंद कराएगा। इसके अलावा कसाडा के बजट से घाटों को पक्का बनाने व सुंदरीकरण का कार्य कराया जाएगा। नदी को वर्ष भर प्रवाहित रखने के लिए जलस्रोत जरूरी है। इसके लिए सिंचाई विभाग से कार्ययोजना बनाने को कहा गया है। प्रयास है कि मार्च में इस नदी को पुनर्जीवित करने का कार्य शुरू करा दिया जाए।
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