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मानसून : अब देर न कर झूम के आ जा
अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी
Updated Mon, 26 Jun 2017 12:01 AM IST
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कौशाम्बी
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मानसून आने की मियाद पूरी हो चुकी है। ऊमड़-घूमड़ के बादल तो आ रहे हैं, लेकिन बिन बरसे चले जा रहे हैं। इससे अन्नदाताओं की चिंता बढ़ गई है। धान की खेती का माकूल वक्त भी धीरे-धीरे बीतने लगा है। इससे किसानों की परेशानी बढ़ गई है। 15-20 फीसदी किसानों ने निजी संसाधनों की बदौलत धान की नर्सरी कर ली है, लेकिन भीषण गर्मी में वह नर्सरी को झुलसने से नहीं बचा पा रहे हैं। इससे बचने के लिए अब उन्हें इंद्र देव के प्रसन्न होने का ही इंतजार है। यदि झूम के बदरा नहीं बरसे तो किसानों को नर्सरी में नुकसान हो सकता है।
पांच दिन पहले से ही बारिश हो जानी चाहिए थी, लेकिन बादल अभी लुकाछिपी का खेल किसानों से खेल रहे हैं। बारिश न होने से धान की नर्सरी लेट हो गई है। भीषण गर्मी पड़ने के कारण धान की नर्सरी झुलसने लगी है। नर्सरी में पीलापन व सफेदपन आने लगा है। इसको लेकर चिंतित हो गया है। बारिश न होने पर जनपद के 15 से 20 फीसदी किसानों ने निजी संसाधनों के भरोसे नर्सरी तैयार करने का खतरा लिया है। जमीन धधक रही है। इससे खेतों में पानी ज्यादा लग रहा है। यह पानी शाम का लगाया जाता है और दोपहर होने से पहले बाहर निकाल दिया जाता है। यदि पानी एक दिन भी खेत में रोक लिया जाए तो नर्सरी को बचाना मुश्किल हो जाएगा। बारिश न होने से किसान अब आसमान की ओर टकटकी लगाकर बैठ गया है।
अधिकांश किसान बारिश होने का इंतजार कर रहे हैं ताकि वह नर्सरी कर सकें। वैज्ञानिक डॉ. सुनील श्रीवास्तव का कहना है कि बारिश लेट हो चुकी है, लेकिन अभी बहुत चिंता करने की बात नहीं है। वह किसान सतर्क रहें, जिन्होंने नर्सरी कर रखी है। यदि वह पानी लगाते हैं तो दोपहर होने से पहले उसको जरूर निकाल दें। इससे नर्सरी सुरक्षित रहेगी। दोपहर को पानी इतना गरम हो जाता है कि उसका प्रभाव नर्सरी पर पड़ता है। इससे पीला पन आ जाता है। आयरन की कमी से धान में सफेद पन आ रहा है। गोबर की खाद का इस्तेमाल न करने से ऐसा हो रहा है।
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पांच दिन पहले से ही बारिश हो जानी चाहिए थी, लेकिन बादल अभी लुकाछिपी का खेल किसानों से खेल रहे हैं। बारिश न होने से धान की नर्सरी लेट हो गई है। भीषण गर्मी पड़ने के कारण धान की नर्सरी झुलसने लगी है। नर्सरी में पीलापन व सफेदपन आने लगा है। इसको लेकर चिंतित हो गया है। बारिश न होने पर जनपद के 15 से 20 फीसदी किसानों ने निजी संसाधनों के भरोसे नर्सरी तैयार करने का खतरा लिया है। जमीन धधक रही है। इससे खेतों में पानी ज्यादा लग रहा है। यह पानी शाम का लगाया जाता है और दोपहर होने से पहले बाहर निकाल दिया जाता है। यदि पानी एक दिन भी खेत में रोक लिया जाए तो नर्सरी को बचाना मुश्किल हो जाएगा। बारिश न होने से किसान अब आसमान की ओर टकटकी लगाकर बैठ गया है।
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अधिकांश किसान बारिश होने का इंतजार कर रहे हैं ताकि वह नर्सरी कर सकें। वैज्ञानिक डॉ. सुनील श्रीवास्तव का कहना है कि बारिश लेट हो चुकी है, लेकिन अभी बहुत चिंता करने की बात नहीं है। वह किसान सतर्क रहें, जिन्होंने नर्सरी कर रखी है। यदि वह पानी लगाते हैं तो दोपहर होने से पहले उसको जरूर निकाल दें। इससे नर्सरी सुरक्षित रहेगी। दोपहर को पानी इतना गरम हो जाता है कि उसका प्रभाव नर्सरी पर पड़ता है। इससे पीला पन आ जाता है। आयरन की कमी से धान में सफेद पन आ रहा है। गोबर की खाद का इस्तेमाल न करने से ऐसा हो रहा है।
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