{"_id":"c149ba46f1760771df971c09892e7341","slug":"panchayat-chunav-news-hindi-news-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"मोहरों के सहारे कुर्सी पर कब्जा जमाने की कोशिश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मोहरों के सहारे कुर्सी पर कब्जा जमाने की कोशिश
अमर उजाला ब्यूरो, कौशाम्बी
Updated Fri, 02 Oct 2015 11:57 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में दोआबा के नेता दूसरे वर्ग के लिए आरक्षित सीटों पर भी कब्जा जमाने का पूरा प्रयास कर रहे हैं। खासकर जिला पंचायत की ऐसी अधिकतर सीटों पर अपने करीबियों को मैदान में उतार दिया है। प्रचार की बागडोर वह खुद ही थामे हुए हैं। ऐसे में इन सीटों पर मुकाबला रोचक हो गया है।त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में जिला पंचायत सदस्य पद की सीटों के आरक्षण ने अच्छे अच्छों की गणित बिगाड़ दी है। जनपद में दिग्गज नेताओं की प्रभाव वाली कई सीटें इस बार दूसरे वर्ग के लिए आरक्षित हो गई हैं।
कुछ ऐसी सीटें भी दूसरे वर्ग के लिए आरक्षित हुई हैं जिनमें दिग्गजों का कब्जा रहा है। आरक्षण की वजह से दिग्गज खुद अथवा अपने परिजनों को चुनाव नहीं लड़ा पा रहे हैं। ऐसी सीटों पर कब्जा जमाने के लिए कद्दावरों ने मोहरे यानी अपने किसी समर्थक को मैदान में उतार दिया है। मैदान में ताल ठोंक रहे ये मोहरे सिर्फ उतना ही करते हैं जितना कहा जाता है। बाकी का काम दिग्गजों ने अपने हाथ में ही ले रखा है। हद तो यह है कि दिग्गज प्रचार-प्रसार भी साफ तौर पर यह कहकर कर रहे हैं कि चुनाव वह खुद लड़ रहे हैं। उम्मीदवार तो सिर्फ कठपुतली हैं। इस तरह की स्थिति जिले की कई सीटों पर है। कई गांवों में अभी भी ऐसे प्रधान हैं जिन्हें प्रधानी से कोई मतलब नहीं है। जिसने चुनाव लड़ाया था वही प्रधानी कर रहा है।
विज्ञापन
कुछ ऐसी सीटें भी दूसरे वर्ग के लिए आरक्षित हुई हैं जिनमें दिग्गजों का कब्जा रहा है। आरक्षण की वजह से दिग्गज खुद अथवा अपने परिजनों को चुनाव नहीं लड़ा पा रहे हैं। ऐसी सीटों पर कब्जा जमाने के लिए कद्दावरों ने मोहरे यानी अपने किसी समर्थक को मैदान में उतार दिया है। मैदान में ताल ठोंक रहे ये मोहरे सिर्फ उतना ही करते हैं जितना कहा जाता है। बाकी का काम दिग्गजों ने अपने हाथ में ही ले रखा है। हद तो यह है कि दिग्गज प्रचार-प्रसार भी साफ तौर पर यह कहकर कर रहे हैं कि चुनाव वह खुद लड़ रहे हैं। उम्मीदवार तो सिर्फ कठपुतली हैं। इस तरह की स्थिति जिले की कई सीटों पर है। कई गांवों में अभी भी ऐसे प्रधान हैं जिन्हें प्रधानी से कोई मतलब नहीं है। जिसने चुनाव लड़ाया था वही प्रधानी कर रहा है।
विज्ञापन