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देवर्षि की तपस्या से हिल उठा देवराज का सिंहासन
kaushambi
Updated Fri, 26 Oct 2018 12:37 AM IST
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करारी। नगर की ऐतिहासिक रामलीला में बुधवार रात पहले दिन नारदमोह की लीला का मंचन किया गया। उत्तर भारत के कोने-कोने से आए चुनिंदा कलाकारों ने भावपूर्ण प्रस्तुति देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। जय श्री राम के गगनभेदी जयघोष से नगर का माहौल भक्तिमय हो गया। कथा प्रसंग के मुताबिक हिमालय की मनोरम वादियां देवर्षि नारद को भा जाती हैं और वह वहीं तपस्या करने लगते हैं। उनके तपोबल से देवराज इंद्र का सिंहासन हिलने लगता है। इससे भयभीत इंद्र अपने प्रिय मित्र कामदेव को उर्वशी, रंभा, मेनका आदि अफसराओं के साथ देवर्षि की तपस्या भंग करने के लिए भेजते हैं। तप भंग नहीं कर पाने पर कामदेव नारद के समक्ष शरणागत हो जाते हैं। ऐसे में नारद जी को कामदेव पर विजय पा लेने का घमंड हो जाता है।
तमाम देवताओं के मना करने के बाद भी वो यह बात जाकर भगवान विष्णु को बताते हैं। इसपर नारद का अहंकार चूर करने के लिए विष्णु भगवान माया की नगरी का निर्माण करते हैं। इनमें विश्वमोहिनी के स्वयंवर का आयोजन होता है। नारद जी विश्वमोहिनी से विवाह करने को भगवान विष्णु के पास सुंदर स्वरूप मांगने जाते हैं। विष्णु जी उन्हें वानर का रूप दे देते हैं। जिससे भारी स्वयंवर सभा में उनका उपहास होता है और अहंकार भी दूर हो जाता है। बाद में विष्णु जी स्वयंवर में पहुंचकर विश्वमोहिनी से अपने गले मे वरमाला डलवा लेते हैं। इसी से नाराज नारद विष्णु जी को श्राप देते हैं कि विपत्ति की घड़ी में वानर-भालू ही उनकी मदद करेंगे। इसी श्राप के चलते त्रेता में विष्णु जब भगवान राम के रूप में अवतरित होते हैं तो सीता हरण के वक्त रावण वध करने में वानर सेना उनकी मदद करती है।
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तमाम देवताओं के मना करने के बाद भी वो यह बात जाकर भगवान विष्णु को बताते हैं। इसपर नारद का अहंकार चूर करने के लिए विष्णु भगवान माया की नगरी का निर्माण करते हैं। इनमें विश्वमोहिनी के स्वयंवर का आयोजन होता है। नारद जी विश्वमोहिनी से विवाह करने को भगवान विष्णु के पास सुंदर स्वरूप मांगने जाते हैं। विष्णु जी उन्हें वानर का रूप दे देते हैं। जिससे भारी स्वयंवर सभा में उनका उपहास होता है और अहंकार भी दूर हो जाता है। बाद में विष्णु जी स्वयंवर में पहुंचकर विश्वमोहिनी से अपने गले मे वरमाला डलवा लेते हैं। इसी से नाराज नारद विष्णु जी को श्राप देते हैं कि विपत्ति की घड़ी में वानर-भालू ही उनकी मदद करेंगे। इसी श्राप के चलते त्रेता में विष्णु जब भगवान राम के रूप में अवतरित होते हैं तो सीता हरण के वक्त रावण वध करने में वानर सेना उनकी मदद करती है।
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