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बन गई बात, अखिलेश की साइकिल पर 21 को सवार होंगे इंद्रजीत
Updated Wed, 06 Sep 2017 01:05 AM IST
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इंद्रजीत तैयार, 21 को होंगे साइकिल पर सवार
(फाइल फोटो...)
-चालीस समर्थकों के साथ पूर्व सीएम अखिलेश के साथ मंगलवार को हुई बैठक
-इंद्रजीत के समर्थकों का बढ़ा उत्साह, बदलने लगी जिले की सियासी तस्वीर
अमर उजाला ब्यूरो
मंझनपुर ।
बसपा से निकाले गए इंद्रजीत सरोज 21 सितंबर को साइकिल की सवारी करेंगे। मंगलवार को लखनऊ में सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से हुई एक घंटे की बैठक में उन्होंने यह फैसला लिया। इंद्रजीत सरोज के साथ प्रदेश भर से पहुंचे 40 बसपा नेता रहे। पार्टी में शामिल होने की घोषणा होते ही समर्थकों का उत्साह बढ़ गया है। इंद्रजीत सरोज के सपा में जाने से जिले की सियासी तस्वीर बदलने लगी है।
बसपा के कद्दावर नेताओं में गिने जाने वाले इंद्रजीत सरोज ने अपना सियासी ठौर तलाश लिया है। 21 सितंबर को लखनऊ में समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण करेंगे। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मौजूदगी में वह साइकिल पर सवार होकर प्रदेश की राजनीति को नया रुख देने की कोशिश करेंगे। मंगलवार को इंद्रजीत सरोज की पूर्व सीएम अखिलेश यादव के साथ लखनऊ में करीब एक घंटे बैठक हुई। इस बैठक में इंद्रजीत सरोज के साथ बसपा के कई पूर्व मंत्री, पूर्व विधायक व प्रत्याशी भी रहे। लगभग 40 लोगों के साथ वह बैठक में शामिल हुए थे। सभी लोग 21 को सपा की सदस्यता ग्रहण करेंगे। बैठक के बाद तारीख की घोषणा हुई तो उनके समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई। पूर्व मंत्री के इस फैसले से बसपा के साथ भाजपा की राजनीति कौशाम्बी में गड़बड़ाने लगी है। जिले की तीनों सीटों पर भाजपा का कब्जा है, लेकिन इंद्रजीत के आने से एक बड़ा वोट बैंक इधर से उधर होने की संभावना दिखने लगी है। यही कारण है कि बसपा के साथ भाजपा खेमे में भी चिंतन और मंथन शुरू हो गया है। इंद्रजीत की राजनीतिक ताकत से लोग वाकिफ हैं। दलितों के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इंद्रजीत के जरिए यह पैंतरा खेला है। इसको लेकर फिलहाल बसपा ज्यादा चौकन्नी दिख रही है। पूर्व मंत्री ने कहा कि अखिलेश यादव के साथ हुई बैठक में कई बिंदुओं पर चर्चा हुई है। 21 सितंबर को वह सपा में अपने समर्थकों के साथ शामिल होंगे।
राजनीतिक जीवन के 21 साल बाद छूटेगा हाथी का साथ
कांशीराम की जगह अब डॉ. राममनोहर लोहिया का करेंगे गुणगान, लगाएंगे अखिलेश जिंदाबाद के नारे
अमर उजाला ब्यूरो
मंझनपुर।
बसपा के मंच से सपा के खिलाफ दहाड़ने वाले पूर्व मंत्री इंद्रजीत सरोज का मिजाज बदलने वाला है। राजनीतिक भाषा के साथ ही मंच से उनकी जुबान भी बदल जाएगी। सपा के मंच पर अब उन्हें डा. राम मनोहर लोहिया की प्रतिमा को नमन करना होगा। यहां उन्हें शायद ही अंबेडकर व कांशीराम की तस्वीरें दिखें। वहीं अब तक मायावती का जयकारा लगाने वाले इंद्रजीत सरोज मंच से समर्थकों के साथ जय अखिलेश कहेंगे। 21 साल के राजनीतिक सफर के बाद वह पार्टी बदलेंगे। इसे लेकर जिले के भी लोगों की निगाह उन पर लगी है।
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इंद्रजीत सरोज ने अपना राजनीतिक सफर बसपा से शुरू किया था। वर्ष 1996 में वह मंझनपुर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। इसके बाद उन्होंने पलटकर नहीं देखा। चार बार वह विधायक रहे। हर जीत के साथ उनका कद बढ़ता गया था। बसपा में दूसरी पंक्ति के नेता थे और मायावती के बेहद करीबियों में शुमार थे। मगर 21 साल बाद अब वह बसपा में नहीं हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। पहले माना जा रहा था कि वह भाजपा में जाएंगे लेकिन उन्होंने सपा में जाने का फैसला लिया। सपा मुखिया से बातचीत करने के बाद तारीख की घोषणा हो चुकी है। 21 को वह बाकायदा लखनऊ पार्टी कार्यालय में सदस्यता लेंगे। माना जा रहा है कि उसी दिन से इंद्रजीत की भाषा भी बदल जाएगी। अब तक वह जय भीम कहकर लोगों का अभिवादन करते थे और स्वीकार करते थे। अब शायद ही यह देखने को मिले। बसपा के मंच से हमेशा उन्होंने सपा के खिलाफ जहर उगला। सपा को वह हमेशा गुंडों की पार्टी बताते थे। यहां तक कि सपा सरकार को हत्यारी कहकर ही संबोधित करते थे। जब तक सपा सरकार रही, वह कोसते रहे। परिवारवाद का तोहमत भी खूब लगाते थे। अभी इस साल की शुरूआत और चुनाव तक में वह यह कहने से नहीं चूकते थे कि चाचा-भतीजे ने प्रदेश का बंटाधार कर रखा है। मगर अब उसी भतीजे का गुणगान करेंगे और बसपा सुप्रीमो के खिलाफ भड़ास निकालेंगे।
शागिर्दों को उस्ताद बनने का नहीं दिया कभी मौका
-इंद्रजीत सरोज को रास नहीं आए उड़ान भरने वाले नेता
अमर उजाला ब्यूरो
मंझनपुर। बसपा में इंद्रजीत सरोज ने जिले की राजनीति में अपने कद से कभी समझौता नहीं किया। शागिर्दों को शागिर्द ही बनाकर रखा जिसने भी उस्ताद बनने की कोशिश की, उसका पर कतरने में देरी नहीं लगाई। इंद्रजीत सरोज की इसी पहचान में बसपा में भीतर ही भीतर खूब द्वंद्व चला, लेकिन खुलकर सामने कोई नहीं आया था। इसी का परिणाम रहा कि कई बड़े नेता हाशिए पर भी चले गए थे।
पूर्व मंत्री इंद्रजीत सरोज ने जिले की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ अपने सिपहसालारों व कट्टर समर्थकों की वजह से बनाकर रखी थी। तीनों सीटों पर इंद्रजीत सरोज का ही प्रभुत्व रहा है। विधानसभा चुनाव रहा हो या जिला पंचायत का। उनके इशारे के बगैर किसी की दाल नहीं गली। यही कारण था कि बसपा नेताओं से उनका राजनीतिक मनमुटाव कई बार खुलकर सामने आया। जिसने बगावत करने की कोशिश की उसे पार्टी से निकालने में देरी नहीं हुई। अपने सिपहसालारों पर भी वह पूरी नजर रखते थे। जिसने भी अपनी चाल बदली उसको पटरी से उतार दिया। पूर्व सांसद सुरेश पासी, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष राजेश कुशवाहा, पूर्व बसपा नेता महेंद्र गौतम समेत तमाम ऐसे नेता रहे, जिन्होंने इंद्रजीत सरोज के बराबर खड़े होने की हिमाकत की उसे नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि इसका असर चुनावों पर भी पड़ा, लेकिन उन्होंने परवाह नहीं की। वर्ष 2017 के चुनाव में इसका भरपूर असर देखने को मिला। झंडाबरदारों ने झंडा उखड़वाने में अपनी भूमिका निभाई और इंद्रजीत सरोज को भी शिकस्त झेलनी पड़ी, लेकिन अब वह नए तेवर में आ रहे हैं। वह सपा नेताओं के साथ कितनी जल्दी सामंजस्य बैठा लेंगे यह देखना होगा। हालांकि जिले के कई सपा नेता उनके संपर्क में हमेशा रहे।
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अपनों पर सितम गैरों पर करम का भी लगा आरोप
इंद्रजीत सरोज का राजनीतिक जीवन रहस्यमयी रहा है। वह सोची समझी रणनीति के तहत ही अपनी चाल चलते थे। अपना राजनीतिक जीवन सुरक्षित करने के लिए वह मजबूत चक्रव्यूह बनाते थे। इसके लिए उन्होंने अपनों पर सितम और गैरों पर करम करने में भी कोताही नहीं बरती। यह आरोप खुलेआम उनके करीबियों ने ही कई बार लगाया। मंझनपुर ब्लाक प्रमुख की कमान उनके अपने चहेते को मिल सकती थी लेकिन आरोप है कि उन्होंने ऐसा नहीं होने दिया। बेहद करीबी सुरेश जायसवाल को भी अपनेपन की घुट्टी पिलाकर शांत कराया था। यही खेल उन्होंने सरसवां ब्लाक समेत जिला पंचायत के चुनाव तक में खेला था। इसकी टीस कार्यकर्ताओं में अभी भी है। शायद यही कारण है कि बीते चुनाव में इन्हें मात मिली।
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कांशीराम के साथ मांगा था एक वोट, एक नोट
इंद्रजीत सरोज ने बसपा संस्थापक कांशीराम के साथ चुनाव प्रचार किया था। तब वह किसी पद पर नहीं थे। चुनाव प्रचार के दौरान कांशीराम के साथ इंद्रजीत सरोज ने बसपा के लिए एक वोट और एक नोट की मांग की थी। कभी बुलट तो कभी महिंद्रा जीप से वह गांव-गांव जाकर बैठक करते थे और पार्टी का प्रचार किया करते थे। जमीन से जुड़े नेता हैं। हर व्यक्ति से सीधे रूबरू भी होते हैं। कैबिनेट मंत्री बनने के बाद भी उन्होंने अपने पद की हनक नहीं दिखाई। कौशाम्बी आते थे तो एक-एक व्यक्ति से मिलते थे और उनके परिजनों का हाल-चाल लेना नहीं भूलते थे। इसी खासियत ने उन्हें फर्श से अर्श पर पहुंचाया।
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चार भाईयों में हैं सबसे छोटे
इंद्रजीत सरोज चार भाईयों में सबसे छोटे हैं। उनके बड़े भाई रम्पत, रामदुलारे और रामप्यारे हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई करने के बाद वह सीधे राजनीति में कूद गए। पहले वह पूर्व कैबिनेट मंत्री आरके चौधरी के साथ थे। उनके पीआरओ भी रहे। इसके बाद आरके चौधरी ने मंझनपुर सीट छोड़ी तो उन्होंने कब्जा जमाया और चार बार विधायक रहे।
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इंद्रजीत सरोज
पिता- स्व. माईदीन
गांव-नगरेहा खुर्द (सरसवां)
पत्नी-पुष्पा सरोज
शिक्षा-इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक
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इंद्रजीत की इंट्री से पहले सपा में घमासान
-पर्यवेक्षक के सामने भिड़े सपाई, दरवाजा तोड़ने का प्रयास
मंझनपुर (ब्यूरो)। इंद्रजीत सरोज की इंट्री से पहले सपा में घमासान शुरू हो गया है। इसकी शुरूआत सोमवार शाम से हुई तो मंगलवार दोपहर तक जारी रही। सोमवार शाम को सपा पर्यवेक्षक की बैठक में घुसने को लेकर धक्का-मुक्की के बाद दरवाजा तोड़ने का प्रयास किया गया तो मंगलवार को सपा के एक वरिष्ठ नेता के साथ अभद्रता हो गई। इससे सपा नेता खासा गुस्सा में दिखे।
सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष ने जिले का मिजाज भांपने के लिए राकेश पाल को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा है। राकेश पाल लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। राकेश पाल सोमवार शाम समाजसेवी हारुन के घर में रुके और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर रहे थे। इसी दौरान वहां भरवारी के एक पूर्व पदाधिकारी पहुंच गए। वह अंदर जाने का प्रयास कर रहे थे तो उनको रोक दिया गया। इससे वह नाराज हो गए। कहासुनी हुई, नौबत मारपीट की बन आई। इसके बाद दरवाजा तोड़ने तक का प्रयास किया गया। किसी तरह मामला शांत हुआ तो मंगलवार को फिर बखेड़ा हो गया। कड़ा इलाके से आए एक नेता की सपा के वरिष्ठ नेता से कहासुनी हो गई। सपा के शीर्ष नेताओं के करीबी वरिष्ठ नेता ने अपने साथ हुई अभद्रता को लेकर नाराजगी जताई। बात इस कदर बिगड़ गई कि क्षेत्र में देखने की बात तक आ गई। वरिष्ठ नेता भी आपे से बाहर हो गए। उन्होंने भी कहा कि वह उन्हीं के क्षेत्र में अब मीटिंग लगाएंगे और देखते हैं वह क्या करेंगे। इस पर नेताओं ने किसी तरह बीचबचाव कर मामला शांत कराया।
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-चालीस समर्थकों के साथ पूर्व सीएम अखिलेश के साथ मंगलवार को हुई बैठक
-इंद्रजीत के समर्थकों का बढ़ा उत्साह, बदलने लगी जिले की सियासी तस्वीर
अमर उजाला ब्यूरो
मंझनपुर ।
बसपा से निकाले गए इंद्रजीत सरोज 21 सितंबर को साइकिल की सवारी करेंगे। मंगलवार को लखनऊ में सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से हुई एक घंटे की बैठक में उन्होंने यह फैसला लिया। इंद्रजीत सरोज के साथ प्रदेश भर से पहुंचे 40 बसपा नेता रहे। पार्टी में शामिल होने की घोषणा होते ही समर्थकों का उत्साह बढ़ गया है। इंद्रजीत सरोज के सपा में जाने से जिले की सियासी तस्वीर बदलने लगी है।
बसपा के कद्दावर नेताओं में गिने जाने वाले इंद्रजीत सरोज ने अपना सियासी ठौर तलाश लिया है। 21 सितंबर को लखनऊ में समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण करेंगे। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मौजूदगी में वह साइकिल पर सवार होकर प्रदेश की राजनीति को नया रुख देने की कोशिश करेंगे। मंगलवार को इंद्रजीत सरोज की पूर्व सीएम अखिलेश यादव के साथ लखनऊ में करीब एक घंटे बैठक हुई। इस बैठक में इंद्रजीत सरोज के साथ बसपा के कई पूर्व मंत्री, पूर्व विधायक व प्रत्याशी भी रहे। लगभग 40 लोगों के साथ वह बैठक में शामिल हुए थे। सभी लोग 21 को सपा की सदस्यता ग्रहण करेंगे। बैठक के बाद तारीख की घोषणा हुई तो उनके समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई। पूर्व मंत्री के इस फैसले से बसपा के साथ भाजपा की राजनीति कौशाम्बी में गड़बड़ाने लगी है। जिले की तीनों सीटों पर भाजपा का कब्जा है, लेकिन इंद्रजीत के आने से एक बड़ा वोट बैंक इधर से उधर होने की संभावना दिखने लगी है। यही कारण है कि बसपा के साथ भाजपा खेमे में भी चिंतन और मंथन शुरू हो गया है। इंद्रजीत की राजनीतिक ताकत से लोग वाकिफ हैं। दलितों के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इंद्रजीत के जरिए यह पैंतरा खेला है। इसको लेकर फिलहाल बसपा ज्यादा चौकन्नी दिख रही है। पूर्व मंत्री ने कहा कि अखिलेश यादव के साथ हुई बैठक में कई बिंदुओं पर चर्चा हुई है। 21 सितंबर को वह सपा में अपने समर्थकों के साथ शामिल होंगे।
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राजनीतिक जीवन के 21 साल बाद छूटेगा हाथी का साथ
कांशीराम की जगह अब डॉ. राममनोहर लोहिया का करेंगे गुणगान, लगाएंगे अखिलेश जिंदाबाद के नारे
अमर उजाला ब्यूरो
मंझनपुर।
बसपा के मंच से सपा के खिलाफ दहाड़ने वाले पूर्व मंत्री इंद्रजीत सरोज का मिजाज बदलने वाला है। राजनीतिक भाषा के साथ ही मंच से उनकी जुबान भी बदल जाएगी। सपा के मंच पर अब उन्हें डा. राम मनोहर लोहिया की प्रतिमा को नमन करना होगा। यहां उन्हें शायद ही अंबेडकर व कांशीराम की तस्वीरें दिखें। वहीं अब तक मायावती का जयकारा लगाने वाले इंद्रजीत सरोज मंच से समर्थकों के साथ जय अखिलेश कहेंगे। 21 साल के राजनीतिक सफर के बाद वह पार्टी बदलेंगे। इसे लेकर जिले के भी लोगों की निगाह उन पर लगी है।
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इंद्रजीत सरोज ने अपना राजनीतिक सफर बसपा से शुरू किया था। वर्ष 1996 में वह मंझनपुर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। इसके बाद उन्होंने पलटकर नहीं देखा। चार बार वह विधायक रहे। हर जीत के साथ उनका कद बढ़ता गया था। बसपा में दूसरी पंक्ति के नेता थे और मायावती के बेहद करीबियों में शुमार थे। मगर 21 साल बाद अब वह बसपा में नहीं हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। पहले माना जा रहा था कि वह भाजपा में जाएंगे लेकिन उन्होंने सपा में जाने का फैसला लिया। सपा मुखिया से बातचीत करने के बाद तारीख की घोषणा हो चुकी है। 21 को वह बाकायदा लखनऊ पार्टी कार्यालय में सदस्यता लेंगे। माना जा रहा है कि उसी दिन से इंद्रजीत की भाषा भी बदल जाएगी। अब तक वह जय भीम कहकर लोगों का अभिवादन करते थे और स्वीकार करते थे। अब शायद ही यह देखने को मिले। बसपा के मंच से हमेशा उन्होंने सपा के खिलाफ जहर उगला। सपा को वह हमेशा गुंडों की पार्टी बताते थे। यहां तक कि सपा सरकार को हत्यारी कहकर ही संबोधित करते थे। जब तक सपा सरकार रही, वह कोसते रहे। परिवारवाद का तोहमत भी खूब लगाते थे। अभी इस साल की शुरूआत और चुनाव तक में वह यह कहने से नहीं चूकते थे कि चाचा-भतीजे ने प्रदेश का बंटाधार कर रखा है। मगर अब उसी भतीजे का गुणगान करेंगे और बसपा सुप्रीमो के खिलाफ भड़ास निकालेंगे।
शागिर्दों को उस्ताद बनने का नहीं दिया कभी मौका
-इंद्रजीत सरोज को रास नहीं आए उड़ान भरने वाले नेता
अमर उजाला ब्यूरो
मंझनपुर। बसपा में इंद्रजीत सरोज ने जिले की राजनीति में अपने कद से कभी समझौता नहीं किया। शागिर्दों को शागिर्द ही बनाकर रखा जिसने भी उस्ताद बनने की कोशिश की, उसका पर कतरने में देरी नहीं लगाई। इंद्रजीत सरोज की इसी पहचान में बसपा में भीतर ही भीतर खूब द्वंद्व चला, लेकिन खुलकर सामने कोई नहीं आया था। इसी का परिणाम रहा कि कई बड़े नेता हाशिए पर भी चले गए थे।
पूर्व मंत्री इंद्रजीत सरोज ने जिले की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ अपने सिपहसालारों व कट्टर समर्थकों की वजह से बनाकर रखी थी। तीनों सीटों पर इंद्रजीत सरोज का ही प्रभुत्व रहा है। विधानसभा चुनाव रहा हो या जिला पंचायत का। उनके इशारे के बगैर किसी की दाल नहीं गली। यही कारण था कि बसपा नेताओं से उनका राजनीतिक मनमुटाव कई बार खुलकर सामने आया। जिसने बगावत करने की कोशिश की उसे पार्टी से निकालने में देरी नहीं हुई। अपने सिपहसालारों पर भी वह पूरी नजर रखते थे। जिसने भी अपनी चाल बदली उसको पटरी से उतार दिया। पूर्व सांसद सुरेश पासी, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष राजेश कुशवाहा, पूर्व बसपा नेता महेंद्र गौतम समेत तमाम ऐसे नेता रहे, जिन्होंने इंद्रजीत सरोज के बराबर खड़े होने की हिमाकत की उसे नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि इसका असर चुनावों पर भी पड़ा, लेकिन उन्होंने परवाह नहीं की। वर्ष 2017 के चुनाव में इसका भरपूर असर देखने को मिला। झंडाबरदारों ने झंडा उखड़वाने में अपनी भूमिका निभाई और इंद्रजीत सरोज को भी शिकस्त झेलनी पड़ी, लेकिन अब वह नए तेवर में आ रहे हैं। वह सपा नेताओं के साथ कितनी जल्दी सामंजस्य बैठा लेंगे यह देखना होगा। हालांकि जिले के कई सपा नेता उनके संपर्क में हमेशा रहे।
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अपनों पर सितम गैरों पर करम का भी लगा आरोप
इंद्रजीत सरोज का राजनीतिक जीवन रहस्यमयी रहा है। वह सोची समझी रणनीति के तहत ही अपनी चाल चलते थे। अपना राजनीतिक जीवन सुरक्षित करने के लिए वह मजबूत चक्रव्यूह बनाते थे। इसके लिए उन्होंने अपनों पर सितम और गैरों पर करम करने में भी कोताही नहीं बरती। यह आरोप खुलेआम उनके करीबियों ने ही कई बार लगाया। मंझनपुर ब्लाक प्रमुख की कमान उनके अपने चहेते को मिल सकती थी लेकिन आरोप है कि उन्होंने ऐसा नहीं होने दिया। बेहद करीबी सुरेश जायसवाल को भी अपनेपन की घुट्टी पिलाकर शांत कराया था। यही खेल उन्होंने सरसवां ब्लाक समेत जिला पंचायत के चुनाव तक में खेला था। इसकी टीस कार्यकर्ताओं में अभी भी है। शायद यही कारण है कि बीते चुनाव में इन्हें मात मिली।
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कांशीराम के साथ मांगा था एक वोट, एक नोट
इंद्रजीत सरोज ने बसपा संस्थापक कांशीराम के साथ चुनाव प्रचार किया था। तब वह किसी पद पर नहीं थे। चुनाव प्रचार के दौरान कांशीराम के साथ इंद्रजीत सरोज ने बसपा के लिए एक वोट और एक नोट की मांग की थी। कभी बुलट तो कभी महिंद्रा जीप से वह गांव-गांव जाकर बैठक करते थे और पार्टी का प्रचार किया करते थे। जमीन से जुड़े नेता हैं। हर व्यक्ति से सीधे रूबरू भी होते हैं। कैबिनेट मंत्री बनने के बाद भी उन्होंने अपने पद की हनक नहीं दिखाई। कौशाम्बी आते थे तो एक-एक व्यक्ति से मिलते थे और उनके परिजनों का हाल-चाल लेना नहीं भूलते थे। इसी खासियत ने उन्हें फर्श से अर्श पर पहुंचाया।
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चार भाईयों में हैं सबसे छोटे
इंद्रजीत सरोज चार भाईयों में सबसे छोटे हैं। उनके बड़े भाई रम्पत, रामदुलारे और रामप्यारे हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई करने के बाद वह सीधे राजनीति में कूद गए। पहले वह पूर्व कैबिनेट मंत्री आरके चौधरी के साथ थे। उनके पीआरओ भी रहे। इसके बाद आरके चौधरी ने मंझनपुर सीट छोड़ी तो उन्होंने कब्जा जमाया और चार बार विधायक रहे।
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इंद्रजीत सरोज
पिता- स्व. माईदीन
गांव-नगरेहा खुर्द (सरसवां)
पत्नी-पुष्पा सरोज
शिक्षा-इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक
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इंद्रजीत की इंट्री से पहले सपा में घमासान
-पर्यवेक्षक के सामने भिड़े सपाई, दरवाजा तोड़ने का प्रयास
मंझनपुर (ब्यूरो)। इंद्रजीत सरोज की इंट्री से पहले सपा में घमासान शुरू हो गया है। इसकी शुरूआत सोमवार शाम से हुई तो मंगलवार दोपहर तक जारी रही। सोमवार शाम को सपा पर्यवेक्षक की बैठक में घुसने को लेकर धक्का-मुक्की के बाद दरवाजा तोड़ने का प्रयास किया गया तो मंगलवार को सपा के एक वरिष्ठ नेता के साथ अभद्रता हो गई। इससे सपा नेता खासा गुस्सा में दिखे।
सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष ने जिले का मिजाज भांपने के लिए राकेश पाल को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा है। राकेश पाल लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। राकेश पाल सोमवार शाम समाजसेवी हारुन के घर में रुके और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर रहे थे। इसी दौरान वहां भरवारी के एक पूर्व पदाधिकारी पहुंच गए। वह अंदर जाने का प्रयास कर रहे थे तो उनको रोक दिया गया। इससे वह नाराज हो गए। कहासुनी हुई, नौबत मारपीट की बन आई। इसके बाद दरवाजा तोड़ने तक का प्रयास किया गया। किसी तरह मामला शांत हुआ तो मंगलवार को फिर बखेड़ा हो गया। कड़ा इलाके से आए एक नेता की सपा के वरिष्ठ नेता से कहासुनी हो गई। सपा के शीर्ष नेताओं के करीबी वरिष्ठ नेता ने अपने साथ हुई अभद्रता को लेकर नाराजगी जताई। बात इस कदर बिगड़ गई कि क्षेत्र में देखने की बात तक आ गई। वरिष्ठ नेता भी आपे से बाहर हो गए। उन्होंने भी कहा कि वह उन्हीं के क्षेत्र में अब मीटिंग लगाएंगे और देखते हैं वह क्या करेंगे। इस पर नेताओं ने किसी तरह बीचबचाव कर मामला शांत कराया।