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राम का क्रोध भी एक लीला थी : मोरारी बापू
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राम का क्रोध भी एक लीला थी : मोरारी बापू
रत्नावली को समर्पित मानस रत्नावली कथा के आखिरी दिन उमड़ श्रद्धालु
अमर उजाला ब्यूरो
मंझनपुर। संत मोरारी बापू ने कहा कि रामकथा अनंत है और कथा का विस्तार भी अनंत है। निर्मल विचार सुनो और सुनने के बाद चुनों। समस्त प्रकट व अप्रकट चेतनाओं को प्रणाम करते हुए बापू ने व्यासपीठ से अरण्य कांड, किष्किन्धा कांड, सुंदरकांड, लंका कांड और उत्तरकांड के प्रसंगों को दर्शाया। बापू ने कहा कि राजापुर में तीन बार कथाएं हुईं। कथाएं होती रहती हैं और श्रोता आते रहते हैं। मुझे खुशी है कि अब रत्नावली घाट पर भी लोग जुटने लगे हैं। जो भी सद्कर्म करेंगे वे इस व्यासपीठ को प्रसन्न करेंगे।
संत कृपा सनातन संस्थान की ओर से गोस्वामी तुलसीदास की पत्नी रत्नावली के मायके महेवाघाट में छह अप्रैल से चल रही नौ दिवसीय रामकथा के आखिरी दिन रविवार को बापू ने मानस रत्नावली की महाकथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि धर्म केवल शाश्वत है। बालकांड का सार सुख प्राप्ति, अयोध्या कांड का सार प्रेम, अरण्य कांड का सार सत्संग और लंका कांड का सार विजय, विवेक तथा विभूति है। प्रलय के बाद पूर्ण और शून्य ही बचेगा। आकाश और हरिनाम पूर्ण भी है और शून्य भी है। जो अपने आश्रित को चैतन्य करे वही महापुरुष है। भजन करने वाला साधू आक्षेप नहीं करता है। बापू ने बताया कि असुरों से लड़ते हुए राम को तीन बार क्रोध आया। राम का यह क्रोध भी एक लीला थी। बापू ने कहा कि रामचरित मानस में एक-एक शब्द परम विशेषता रखता है। यह कलियुग है और राम को सुनो तथा राम को गाओ। राम एक ही है। वह सभी भूत में छाया हुआ गूढ़ और सर्वव्यापी है। राम सभी भूतों की अंतरात्मा हैं। राम हमारे कर्मों के अध्यक्ष, सबके दृष्टा एवं साक्षी हैं। ऐसे प्रभु का रामनवमी के दिन राज्याभिषेक हुआ। कहा कि जहां धर्म है वहां जय और जहां प्रेम वहां पराजय होती है। हमेशा सत्यमेव जयते ही बोला जाता है। कभी भी प्रेममेव जयते नहीं बोलते है। इस दौरान रविवार को मुख्य आयोजनकर्ता मदन पालीवाल, रविंद्र जोशी, रूपेश व्यास, विकास पुरोहित, मंत्रराज पालीवाल, प्रकाश पुरोहित आदि लोगों ने व्यासपीठ पर पुष्प अर्पित कर कथा श्रवण का लाभ लिया।
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रत्नावली को समर्पित मानस रत्नावली कथा के आखिरी दिन उमड़ श्रद्धालु
अमर उजाला ब्यूरो
मंझनपुर। संत मोरारी बापू ने कहा कि रामकथा अनंत है और कथा का विस्तार भी अनंत है। निर्मल विचार सुनो और सुनने के बाद चुनों। समस्त प्रकट व अप्रकट चेतनाओं को प्रणाम करते हुए बापू ने व्यासपीठ से अरण्य कांड, किष्किन्धा कांड, सुंदरकांड, लंका कांड और उत्तरकांड के प्रसंगों को दर्शाया। बापू ने कहा कि राजापुर में तीन बार कथाएं हुईं। कथाएं होती रहती हैं और श्रोता आते रहते हैं। मुझे खुशी है कि अब रत्नावली घाट पर भी लोग जुटने लगे हैं। जो भी सद्कर्म करेंगे वे इस व्यासपीठ को प्रसन्न करेंगे।
संत कृपा सनातन संस्थान की ओर से गोस्वामी तुलसीदास की पत्नी रत्नावली के मायके महेवाघाट में छह अप्रैल से चल रही नौ दिवसीय रामकथा के आखिरी दिन रविवार को बापू ने मानस रत्नावली की महाकथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि धर्म केवल शाश्वत है। बालकांड का सार सुख प्राप्ति, अयोध्या कांड का सार प्रेम, अरण्य कांड का सार सत्संग और लंका कांड का सार विजय, विवेक तथा विभूति है। प्रलय के बाद पूर्ण और शून्य ही बचेगा। आकाश और हरिनाम पूर्ण भी है और शून्य भी है। जो अपने आश्रित को चैतन्य करे वही महापुरुष है। भजन करने वाला साधू आक्षेप नहीं करता है। बापू ने बताया कि असुरों से लड़ते हुए राम को तीन बार क्रोध आया। राम का यह क्रोध भी एक लीला थी। बापू ने कहा कि रामचरित मानस में एक-एक शब्द परम विशेषता रखता है। यह कलियुग है और राम को सुनो तथा राम को गाओ। राम एक ही है। वह सभी भूत में छाया हुआ गूढ़ और सर्वव्यापी है। राम सभी भूतों की अंतरात्मा हैं। राम हमारे कर्मों के अध्यक्ष, सबके दृष्टा एवं साक्षी हैं। ऐसे प्रभु का रामनवमी के दिन राज्याभिषेक हुआ। कहा कि जहां धर्म है वहां जय और जहां प्रेम वहां पराजय होती है। हमेशा सत्यमेव जयते ही बोला जाता है। कभी भी प्रेममेव जयते नहीं बोलते है। इस दौरान रविवार को मुख्य आयोजनकर्ता मदन पालीवाल, रविंद्र जोशी, रूपेश व्यास, विकास पुरोहित, मंत्रराज पालीवाल, प्रकाश पुरोहित आदि लोगों ने व्यासपीठ पर पुष्प अर्पित कर कथा श्रवण का लाभ लिया।
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