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कभी दानदाता, अब दूध की मक्खी...
ब्यूरो, अमर उजाला कानपुर
Updated Wed, 24 Dec 2014 02:25 AM IST
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उपेक्षित वृद्धों को आश्रय देने के लिए कथित रूप से बनाए गए स्वराज वृद्धाश्रम ने उस वृद्ध व्यक्ति छेदीलाल को कहीं का नहीं छोड़ा, जिसने वृद्धाश्रम बनाने के लिए कभी मंजू भाटिया को जमीन दी थी।
यह बात अलग है कि उस जमीन पर छेदीलाल का स्वामित्व कितना जायज है। संचालिका भाटिया ने खुद स्वीकारा है कि वृद्धाश्रम बनाने के लिए जमीन छेदीलाल ने दी थी।
आश्रम से जुड़े पुराने कागजात में छेदीलाल का नाम शहर के स्वनाम धन्य दानदाताओं के साथ है। जमीन दान देने के लिए छेदीलाल को सम्मानित भी किया गया था।
छेदीलाल ने सोमवार को अमर उजाला कार्यालय पहुंचकर अपनी पूरी कहानी बताई थी और बातों के समर्थन में तमाम कागजात मुहैया करवाए। कागजात उनकी बातों का पुष्टि भी करते हैं। छेदीलाल ने बताया, मंजू भाटिया के परिवार से मेरा करीब चालीस साल पुराना मेलजोल है।
भाटिया के पति एमआर थे, उनसे मेरी बहुत पटती थी। मैने पांडु नगर (नीरक्षीर चौराहे के पास) से घर बेचने के बाद वर्ष 1992 में बुआ के गांव पनकी स्थित बारा सिरोही में कुछ जमीन ली। आज इसी जमीन पर स्वराज वृद्धाश्रम है।
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जमीन मेरी होने के बावजूद मेरी पूरी जिंदगी यहां स्थित दो कमरों तक सिमट गई है। आज मैं जिस हालत में हूं, उस बुरे दिन की शुरुआत उस वक्त हुई जब मैं इसी जमीन पर प्राथमिक विद्यालय बनवा रहा था। भवन लगभग तैयार भी हो गया था।
एक दिन मंजू भाटिया गरीबों को कपड़े दान करने के लिए गांव आईं। उन्होंने जमीन देखकर कहा कि बेटे वृद्धों की सेवा के लिए वृद्धाश्रम खोलना चाहती हूं। उन्होंने मुझसे मेरी जमीन से दो कमरे की जगह देने का आग्रह किया। मैं उस समय उनकी बात काट नही सका और भला काम समझकर हामी भर दी।
उन्होंने विद्यालय बनवाने का भी वचन दिया था। जीवनयापन के लिए मुझे आश्रम में मैनेजर बनाकर दो हजार रुपये प्रतिमाह वेतन देने का वादा किया। वर्ष 2007 में वृद्धाश्रम का उद्घाटन हुआ।
मुझे मैनेजर भी बनाया और उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथियों से सम्मानित भी कराया। लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ...? जिस महिला को अपनी मां की तरह पूजता रहा और उसके लिए अपने भाइयों से दुश्मनी ली...उसी मां ने मुझे दूध से मक्खी की तरह निकालकर बाहर फेंक दिया। मुझे शांति भंग में हवालात की हवा खिलवाई।
चालीस साल पुराने रिश्तों को भुलाकर मेरी बदनामी करवाई। 58 साल की उम्र में मेरे ऊपर भद्दे आरोेप लगाए। जिसे आश्रम बनाने के लिए जमीन दी, उसने ही मुझे यहां से भगाने के लिए हर संभव प्रयास किया।
जमीन के स्वामित्व के संबंध में छेदीलाल ने दावा किया है कि वह कानपुर नगर महापालिका को इस जमीन का टैक्स देता था। उसने इसकी 31 मार्च 1992 की एक रसीद भी दिखाई।
रसीद छेदीलाल पुत्र राम प्रसाद निवासी 22 ए, बारा सिरोही, गड़रियन का पुरवा के नाम से ही कटी है। स्वराज आश्रम इसी पते पर स्थित है। जमीन छेदीलाल ने दी, यह मंजू भाटिया सोमवार को अमर उजाला से स्वीकार चुकी हैं।
बाकी आरोपों के संबंध में उनसे उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, मगर संपर्क नहीं हो सका। जब भी वे इस बाबत कुछ कहना चाहेंगी, प्रकाशित किया जाएगा।
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यह बात अलग है कि उस जमीन पर छेदीलाल का स्वामित्व कितना जायज है। संचालिका भाटिया ने खुद स्वीकारा है कि वृद्धाश्रम बनाने के लिए जमीन छेदीलाल ने दी थी।
आश्रम से जुड़े पुराने कागजात में छेदीलाल का नाम शहर के स्वनाम धन्य दानदाताओं के साथ है। जमीन दान देने के लिए छेदीलाल को सम्मानित भी किया गया था।
छेदीलाल ने सोमवार को अमर उजाला कार्यालय पहुंचकर अपनी पूरी कहानी बताई थी और बातों के समर्थन में तमाम कागजात मुहैया करवाए। कागजात उनकी बातों का पुष्टि भी करते हैं। छेदीलाल ने बताया, मंजू भाटिया के परिवार से मेरा करीब चालीस साल पुराना मेलजोल है।
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भाटिया के पति एमआर थे, उनसे मेरी बहुत पटती थी। मैने पांडु नगर (नीरक्षीर चौराहे के पास) से घर बेचने के बाद वर्ष 1992 में बुआ के गांव पनकी स्थित बारा सिरोही में कुछ जमीन ली। आज इसी जमीन पर स्वराज वृद्धाश्रम है।
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जमीन मेरी होने के बावजूद मेरी पूरी जिंदगी यहां स्थित दो कमरों तक सिमट गई है। आज मैं जिस हालत में हूं, उस बुरे दिन की शुरुआत उस वक्त हुई जब मैं इसी जमीन पर प्राथमिक विद्यालय बनवा रहा था। भवन लगभग तैयार भी हो गया था।
एक दिन मंजू भाटिया गरीबों को कपड़े दान करने के लिए गांव आईं। उन्होंने जमीन देखकर कहा कि बेटे वृद्धों की सेवा के लिए वृद्धाश्रम खोलना चाहती हूं। उन्होंने मुझसे मेरी जमीन से दो कमरे की जगह देने का आग्रह किया। मैं उस समय उनकी बात काट नही सका और भला काम समझकर हामी भर दी।
उन्होंने विद्यालय बनवाने का भी वचन दिया था। जीवनयापन के लिए मुझे आश्रम में मैनेजर बनाकर दो हजार रुपये प्रतिमाह वेतन देने का वादा किया। वर्ष 2007 में वृद्धाश्रम का उद्घाटन हुआ।
मुझे मैनेजर भी बनाया और उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथियों से सम्मानित भी कराया। लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ...? जिस महिला को अपनी मां की तरह पूजता रहा और उसके लिए अपने भाइयों से दुश्मनी ली...उसी मां ने मुझे दूध से मक्खी की तरह निकालकर बाहर फेंक दिया। मुझे शांति भंग में हवालात की हवा खिलवाई।
चालीस साल पुराने रिश्तों को भुलाकर मेरी बदनामी करवाई। 58 साल की उम्र में मेरे ऊपर भद्दे आरोेप लगाए। जिसे आश्रम बनाने के लिए जमीन दी, उसने ही मुझे यहां से भगाने के लिए हर संभव प्रयास किया।
जमीन के स्वामित्व के संबंध में छेदीलाल ने दावा किया है कि वह कानपुर नगर महापालिका को इस जमीन का टैक्स देता था। उसने इसकी 31 मार्च 1992 की एक रसीद भी दिखाई।
रसीद छेदीलाल पुत्र राम प्रसाद निवासी 22 ए, बारा सिरोही, गड़रियन का पुरवा के नाम से ही कटी है। स्वराज आश्रम इसी पते पर स्थित है। जमीन छेदीलाल ने दी, यह मंजू भाटिया सोमवार को अमर उजाला से स्वीकार चुकी हैं।
बाकी आरोपों के संबंध में उनसे उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, मगर संपर्क नहीं हो सका। जब भी वे इस बाबत कुछ कहना चाहेंगी, प्रकाशित किया जाएगा।