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हर कदम पर चूकी पुलिस
अमर उजाला ब्यूरो/कानपुर
Updated Thu, 16 Jun 2016 12:51 AM IST
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यूपी पुलिस
- फोटो : ANI
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कानपुर साउथ। नौबस्ता से बैंक मैनेजर धर्मपाल सिंह के 11 वर्षीय इकलौते बेटे आशुतोष के अपहरण में एक हफ्ते बाद भी पुलिस के हाथ खाली है। अभी तक पुलिस को ऐसा कोई पुख्ता सुराग हाथ नहीं लगा है, जिससे अपहर्ताओं तक पहुंचा जा सके। अपहरण के तुरंत बाद पुलिस के बला टालू रवैये से बच्चा हाथ से फिसल गया। हफ्ता बीतने के बाद अमर उजाला ने इस मामले की पूरी पड़ताल की और पुलिस के कमजोर बिंदु तलाशे। वहीं आशुतोष की तलाश में जुटी पुलिस ने अब रिश्तेदारों पर घेराबंदी शुरू की है। पुलिस ने कई रिश्तेदारों को उठाकर पूछताछ की है।
तुरंत नहीं दिखाई सक्रियता
आमतौर पर किसी के लापता होने पर पुलिस पहले तो परिजनों को टरकाने का प्रयास करती है, लेकिन जब परिजन दबाव बनाते हैं तो दिखावे के लिए गुमशुदगी दर्ज करती है। ऐसा ही आशुतोष के मामले में देखने को मिला। परिजनों के सूचना देने के बाद पुलिस ने उन्हें अपने स्तर से पता लगाने को कहा। करीब पौन घंटे बाद जब फिरौती के लिए पहला फोन आया तो पुलिस जागी। पौन घंटे में बच्चा काफी दूर जा चुका था।
न वाहन चेकिंग, न घेराबंदी
फिरौती का फोन आने के बाद भी पुलिस लापरवाही बरतती रही। न हाइवे की घेराबंदी की, न सीमा सील कराकर चेकिंग कराई। रात करीब 11 बजे सीमा सील की गई। पुलिस केवल आशुतोष और उसके टीचर के घर के बीच ही टहलती रही। ऐसा कोई शख्स नहीं तलाशा जिसकी नजर आशुतोष को ले जाते समय किसी पर पड़ी हो। सिर्फ मोहल्ले के सीसीटीवी कैमरों मेें अपहर्ता तक पहुंचने का जरिया तलाशती रही।
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सर्विलांस में भी देरी
अपराधी तक पहुंचने के लिए पुलिस अधिकतर सर्विलांस पर निर्भर रहती है। आशुतोष के मामले में पुलिस ने सर्विलांस की मदद ली, लेकिन देरी से। फिरौती का फोन आने के बाद मोबाइल सर्विलांस पर लगाया पर अपहर्ता ने इससे पहले ही मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया।
टॉवर डाटा फिल्टरेशन में हुई देरी
अपहर्ता लगातार लोकेशन बदलते रहे और पुलिस इधर-उधर भागती रही। जैसे ही पुलिस पहली लोकेशन पर एक्शन करती, अपहर्ता की लोकेशन बदल चुकी होती थी। इसके बावजूद पुलिस ने उन लोकेशनों के बीच मोबाइल टॉवर डाटा फिल्टेरेशन नहीं कराया। संभव है कि अपहरणकर्ताओं ने फिरौती के फोन के कुछ समय भागते समय आगे-पीछे दूसरे मोबाइल का प्रयोग किया हो। अगर समय रहते डाटा फिल्टरेशन एक्टिव होता तो निश्चित ही मोबाइल से लोकेशन पकड़ में आ जाती।
गहराई से हो डॉटा फिल्टरेशन
सर्विलांस और डॉटा फिल्टरेशन के जरिए अपहरण और लूट की कई वारदात का खुलासा करने में माहिर रहे एक सीनियर अफसर का कहना है कि आशुतोष अपहरणकांड में पुलिस से बड़ी चूक हुई। घटना के बाद पुलिस को फौरन परिजनों के मोबाइल को सर्विलांस के साथ ही लिसनिंग (फोन सुनने) में ले लेना चाहिए था। इससे जैसे ही फिरौती का फोन आता, तुरंत लोकेशन क्लियर हो जाती। अपहर्ताओं के बोलने के तरीके और भाषा की जानकारी हो जाती। रिकार्डिंग को आशुतोष के घरवालों को सुनाया जाता। हो सकता है कि बोली और भाषा सुनने के बाद परिवार के लोग अपहर्ताओं के बारे में शायद कोई क्लू दे पाते। ऐसा नहीं है कि अपहर्ता एक ही मोबाइल ही प्रयोग कर रहे होंगे। वारदात में शामिल लोगों के पास कोई न कोई दूसरा मोबाइल जरूर होगा। जिस जगह से फोन आया है, तुरंत वहां के विभिन्न कंपनियों के मोबाइल टॉवरों के डॉटा जुटाकर फिल्टरेशन होता तो रिजल्ट मिल जाता। जिस वक्त अपहर्ता का पहला फोन आया, उसके दो घंटे पहले और दो घंटे बाद तक के नंबरों को फिल्टर किया जाए।
आशुतोष अपहरण मामले में गृह सचिव से मिले महाना
कानपुर (ब्यूरो)। नौबस्ता से अपह्यत छात्र आशुतोष के मामले में बुधवार को आश्वासन समिति के चेयरमैन सतीश महाना ने एडीजी लॉ एंड आर्डर दलजीत चौधरी और गृह सचिव मणि प्रसाद मिश्रा से मुलाकात कर मामले का जल्द खुलासा करने को कहा। महाना ने कहा कि बच्चे से जुड़ा मामला है, इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लखनऊ में अधिकारियों के साथ बैठक के दौरान उन्हें बताया गया कि बैंक अधिकारी के बेटे के अपहरण के संबंध में शासन को जानकारी है, इस मामले में लगातार स्थानीय पुलिस से संपर्क बना हुआ है। जल्द ही बच्चे का पता लगा लिया जाएगा।
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तुरंत नहीं दिखाई सक्रियता
आमतौर पर किसी के लापता होने पर पुलिस पहले तो परिजनों को टरकाने का प्रयास करती है, लेकिन जब परिजन दबाव बनाते हैं तो दिखावे के लिए गुमशुदगी दर्ज करती है। ऐसा ही आशुतोष के मामले में देखने को मिला। परिजनों के सूचना देने के बाद पुलिस ने उन्हें अपने स्तर से पता लगाने को कहा। करीब पौन घंटे बाद जब फिरौती के लिए पहला फोन आया तो पुलिस जागी। पौन घंटे में बच्चा काफी दूर जा चुका था।
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न वाहन चेकिंग, न घेराबंदी
फिरौती का फोन आने के बाद भी पुलिस लापरवाही बरतती रही। न हाइवे की घेराबंदी की, न सीमा सील कराकर चेकिंग कराई। रात करीब 11 बजे सीमा सील की गई। पुलिस केवल आशुतोष और उसके टीचर के घर के बीच ही टहलती रही। ऐसा कोई शख्स नहीं तलाशा जिसकी नजर आशुतोष को ले जाते समय किसी पर पड़ी हो। सिर्फ मोहल्ले के सीसीटीवी कैमरों मेें अपहर्ता तक पहुंचने का जरिया तलाशती रही।
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सर्विलांस में भी देरी
अपराधी तक पहुंचने के लिए पुलिस अधिकतर सर्विलांस पर निर्भर रहती है। आशुतोष के मामले में पुलिस ने सर्विलांस की मदद ली, लेकिन देरी से। फिरौती का फोन आने के बाद मोबाइल सर्विलांस पर लगाया पर अपहर्ता ने इससे पहले ही मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया।
टॉवर डाटा फिल्टरेशन में हुई देरी
अपहर्ता लगातार लोकेशन बदलते रहे और पुलिस इधर-उधर भागती रही। जैसे ही पुलिस पहली लोकेशन पर एक्शन करती, अपहर्ता की लोकेशन बदल चुकी होती थी। इसके बावजूद पुलिस ने उन लोकेशनों के बीच मोबाइल टॉवर डाटा फिल्टेरेशन नहीं कराया। संभव है कि अपहरणकर्ताओं ने फिरौती के फोन के कुछ समय भागते समय आगे-पीछे दूसरे मोबाइल का प्रयोग किया हो। अगर समय रहते डाटा फिल्टरेशन एक्टिव होता तो निश्चित ही मोबाइल से लोकेशन पकड़ में आ जाती।
गहराई से हो डॉटा फिल्टरेशन
सर्विलांस और डॉटा फिल्टरेशन के जरिए अपहरण और लूट की कई वारदात का खुलासा करने में माहिर रहे एक सीनियर अफसर का कहना है कि आशुतोष अपहरणकांड में पुलिस से बड़ी चूक हुई। घटना के बाद पुलिस को फौरन परिजनों के मोबाइल को सर्विलांस के साथ ही लिसनिंग (फोन सुनने) में ले लेना चाहिए था। इससे जैसे ही फिरौती का फोन आता, तुरंत लोकेशन क्लियर हो जाती। अपहर्ताओं के बोलने के तरीके और भाषा की जानकारी हो जाती। रिकार्डिंग को आशुतोष के घरवालों को सुनाया जाता। हो सकता है कि बोली और भाषा सुनने के बाद परिवार के लोग अपहर्ताओं के बारे में शायद कोई क्लू दे पाते। ऐसा नहीं है कि अपहर्ता एक ही मोबाइल ही प्रयोग कर रहे होंगे। वारदात में शामिल लोगों के पास कोई न कोई दूसरा मोबाइल जरूर होगा। जिस जगह से फोन आया है, तुरंत वहां के विभिन्न कंपनियों के मोबाइल टॉवरों के डॉटा जुटाकर फिल्टरेशन होता तो रिजल्ट मिल जाता। जिस वक्त अपहर्ता का पहला फोन आया, उसके दो घंटे पहले और दो घंटे बाद तक के नंबरों को फिल्टर किया जाए।
आशुतोष अपहरण मामले में गृह सचिव से मिले महाना
कानपुर (ब्यूरो)। नौबस्ता से अपह्यत छात्र आशुतोष के मामले में बुधवार को आश्वासन समिति के चेयरमैन सतीश महाना ने एडीजी लॉ एंड आर्डर दलजीत चौधरी और गृह सचिव मणि प्रसाद मिश्रा से मुलाकात कर मामले का जल्द खुलासा करने को कहा। महाना ने कहा कि बच्चे से जुड़ा मामला है, इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लखनऊ में अधिकारियों के साथ बैठक के दौरान उन्हें बताया गया कि बैंक अधिकारी के बेटे के अपहरण के संबंध में शासन को जानकारी है, इस मामले में लगातार स्थानीय पुलिस से संपर्क बना हुआ है। जल्द ही बच्चे का पता लगा लिया जाएगा।