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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Kanpur News ›   On those days The defectors did not get tickets immediately, they had to laid carpet for five years

यूपी चनाव 2022: दल-बदलुओं को तुरंत नहीं मिलता था टिकट, पांच साल बिछवाई जाती थी दरी

Thu, 13 Jan 2022 05:27 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: प्रभापुंज मिश्रा Updated Thu, 13 Jan 2022 05:27 PM IST
सार

दादा मियां की खानकाह के सज्जादानशीं ने कहा, नए दल की नीतियां समझने के बाद माना जाता था नेता,  कहा, एसएम बनर्जी के संसदीय चुनाव में 300 रुपये में हो गई थी पूरे चमनगंज और बेकनगंज की वॉल पेंटिंग। 

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On those days The defectors did not get tickets immediately, they had to laid carpet for five years
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यूपी विधानसभा चुनाव की घोषणा होते ही प्रदेश में शुरू हुई जोड़तोड़ की राजनीति ने उस दौर की याद दिला दी, जब दल-बदलू नेताओं को तवज्जो नहीं दी जाती थी। हजरत दादा मियां की खानकाह के सज्जादानशीं सैयद अबुल बरकात नजमी ने पुराने दौर को याद करते हुए बताया कि पहले दल-बदलुओं को तुरंत टिकट नहीं मिलता था। कम से कम पांच साल दरी बिछवाई जाती थी और संगठन के झंडे-बैनर ढुलवाए जाते थे। नए दल की नीतियां समझनी पड़ती थीं, उसके बाद उसे दल में नेता स्वीकार किया जाता था। 
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वर्ष 1962 का एक वाकया उन्होंने सुनाया। कहा, उस दौरान लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ में हुआ करते थे। एसएम बनर्जी का संसदीय चुनाव रहा है। कहीं न कोई झंडा बैनर और न हो-हल्ला। प्रख्यात अधिवक्ता सुल्तान नियाजी ने बुलाया और कहा कि जाओ चुनावी वॉल पेंटिंग तो करा दो। 300 रुपये दिए और बोले गेरू ले आओ और दीवारों पर नारे वगैरह लिखवा दो। उस वक्त तीन सौ रुपये में पूरे चमनगंज और बेकनगंज की वॉल पेंटिंग हो गई। खानकाह के सज्जादानशीं सैयद अबुल बरकात नजमी ऑल इंडिया कौमी मुशावरत कमेटी के चेयरमैन हैं। 
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तब बड़े नेता नहीं घूमते थे गलियों में 
नजमी के पहले एआईएमआईएम के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के पिता सुल्तान सलाहुद्दीन कमेटी के अध्यक्ष रहे हैं। अमर उजाला से बातचीत के दौरान नजमी ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, पीवी नरसिम्हा राव की नीतियों के संबंध में स्मृतियां साझा कीं। बोले कि पहले चुनाव के दौरान बड़े नेता गलियों में नहीं घूमते थे। प्रत्याशी और क्षेत्र के नेता ही आकर अपने काम बतातेे।
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बड़े नेता आते जरूर थे लेकिन फूलबाग में बात कहकर चले जाते। उन्होंने हलीम कॉलेज ग्राउंड में वर्ष 1960 में डॉ. राममनोहर लोहिया की सभा के बारे में बताया। बोले कि पूरे समय डॉ. लोहिया सर्व समाज के उत्थान की बात करते रहे। डॉ. लोहिया ने अपनी तकरीर में किसी दल और नेता पर आक्षेप नहीं लगाया था। बोले कि चाहे सतनाम सिंह यूसुफ का विधानसभा चुनाव रहा हो या एसएम बनर्जी का लोकसभा चुनाव मुख्य वक्ता सुल्तान नियाजी होते। 


विधानसभा का टिकट मांगा, लोकसभा का मिल गया
मुख्यमंत्री सीबी गुप्ता के जमाने के बारे में बताया कि वे गणेशदत्त वाजपेयी के  विधानसभा चुनाव के टिकट के लिए मुख्यमंत्री के पास गए। गुप्ता ने  विधानसभा के बजाए लोकसभा का टिकट दे दिया। प्रत्याशी के पास पैसा नहीं था। कहा गया तो 10 हजार रुपये चुनावी खर्च मिला। उस बार वाजपेयी चुनाव हार गए लेकिन बाद में वाजपेयी प्रदेश के श्रम मंत्री बने।
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