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लॉकडाउन में सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल रहे दिहाड़ी मजदूर, कोई भूखे पेट तो कोई बिस्कुट खा बढ़ा रहा कदम

Wed, 29 Apr 2020 12:05 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: प्रभापुंज मिश्रा Updated Wed, 29 Apr 2020 12:05 AM IST
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lockdown in kanpur : Daily laborers walking hundreds of kilometers in lockdown
लॉकडाउन में सैकड़ों किमी की यात्रा कर कानपुर पहुंचे दिहाड़ी मजदूर - फोटो : amar ujala
लॉकडाउन के दौरान दिहाड़ी मजदूरों और प्रवासियों की कहानी अमर उजाला आपको शुरुआत से पढ़ाता आ रहा है। पैदल चलकर आने वाले प्रवासियों की दर्द भरी कहानी चेन्नई, गुजरात से आने और बिहार जाने वालों की जुबानी।
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चेन्नई से आए 21 मजदूर जाजमऊ नई चुंगी में दो दिन से रुके हैं। उनका कहना है कि चेन्नई बार्डर से पुलिस ने ट्रकों से भेज दिया। रास्ते में कुछ दूर पैदल तो कुछ दूर साधन से 11 दिन में कानपुर पहुंचे हैं। बस्ती जाना है, लेकिन उन्नाव पुलिस जाने नहीं दे रही है।
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इलाहाबाद होकर जाने का प्रयास किया तो महाराज थाने की पुलिस ने भगा दिया। इस पर वापस आकर जाजमऊ चुंगी के पास रुके हैं। कुछ लोग सुबह-शाम खाना और पानी दे रहे हैं। बृजेश, रमेश, अशफाक, कमल, सुधीर, रणधीर, राजेश, अशोक ने प्रशासन से घर भिजवाने की मांग की है।
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lockdown in kanpur : Daily laborers walking hundreds of kilometers in lockdown
बिहार के रहने वाले मजदूर - फोटो : amar ujala
लॉकडाउन में इटावा से पैदल बिहार को निकले सात मजदूर मंगलवार को शहर पहुंचे। रास्ते में खाना न मिलने पर मजबूरन वे बिस्कुट खा रहे हैं। ये सातों मजदूर इटावा में फैक्ट्री, होटल आदि में काम करते थे। लॉकडाउन लागू होने के बाद जमा पूंजी खाने-पीने पर खर्च हो गई।

जब पैसे नहीं बचे तो होटल मालिक से कुछ पैसे उधार लेकर पैदल ही बिहार को चल दिए। मजदूरों ने बताया कि रास्ते में उन्होंने कई वाहन सवारों से लिफ्ट मांगी लेकिन किसी ने गाड़ी में बैठाया नहीं। पुलिस ने कई जगह पूछताछ की। कई जगह पर राहगीरों के माध्यम से बिस्किट, पानी और फल मिले।

नरवल के पाली गांव निवासी धीरेंद्र सिंह गुजरात की एक कपड़ा मिल में काम करता है। लॉकडाउन में वह गुजरात में ही फंस गए। जब हालात मुश्किल हुए तो 16 अप्रैल को पैदल ही घर को निकल पड़े। मंगलवार को वह कानपुर पहुंचे। उनके दोनों पैरों में सूजन आ गई है। उन्होंने कहा कि रास्ते में बहुत कम लोगों ने ही गाड़ी पर बैठाया। इस वक्त तो कोई गाड़ी पर भी नहीं बैठा रहा है। कहीं पर समाजसेवी संस्थाएं खाना दे देतीं थी तो कहीं पर भूखे ही रहना पड़ता था।
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