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कानपुर: दिव्या कांड के मुख्य अभियुक्त पीयूष को भुगतनी होगी उम्रकैद, दो अन्य आरोपियों की एक-एक साल की सजा हुई माफ
Wed, 23 Jun 2021 09:58 PM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Wed, 23 Jun 2021 09:58 PM IST
सार
रावतपुर स्थित ज्ञानस्थली स्कूल में 27 सितंबर 2010 को कक्षा छह की छात्रा दिव्या पढ़ने गई थी। दोपहर में दिव्या की हालत बिगड़ने पर स्कूल कर्मचारी उसे घर छोड़ गए। गंभीर हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था।
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दिव्या हत्याकांड
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विस्तार
दिव्या कांड के मुख्य अभियुक्त स्कूल प्रबंधक के बेटे पीयूष कुमार वर्मा को उम्रकैद की सजा काटनी होगी। सेशन कोर्ट की ओर से वर्ष 2018 में सुनाई गई सजा के खिलाफ पीयूष की अपील हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। दो अन्य आरोपियों सुधीर कुमार वर्मा और संतोष मिश्रा की अपील स्वीकार कर उनकी एक-एक साल की सजा माफ कर दी है।
रावतपुर स्थित ज्ञानस्थली स्कूल में 27 सितंबर 2010 को कक्षा छह की छात्रा दिव्या पढ़ने गई थी। दोपहर में दिव्या की हालत बिगड़ने पर स्कूल कर्मचारी उसे घर छोड़ गए। गंभीर हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था।
दिव्या की मां सोनू भदौरिया ने स्कूल प्रबंधन पर आरोप लगाए थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने मामले की सीबीसीआईडी जांच के आदेश दिए थे। इसके बाद स्कूल प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा और उनके बेटे पीयूष व सुधीर के अलावा लिपिक संतोष को जेल भेजा गया था।
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पांच दिसंबर 2018 को अपर जिला जज द्वितीय ज्योति कुमार त्रिपाठी ने पीयूष को कुकर्म और हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद और 75 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी, जबकि गैर इरादतन हत्या और जानबूझकर अपराध की सूचना न देने का दोषी मानते हुए सुधीर वर्मा और संतोष मिश्रा को एक-एक साल की कैद की सजा सुनाई थी।
सबूतों के अभाव में स्कूल प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा को दोषमुक्त करार दिया गया था। तीनों ने सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी। सोनू भदौरिया की ओर से अधिवक्ता एलएम सिंह व रघुवीर शरण सिंह ने अपील का विरोध किया था।
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रावतपुर स्थित ज्ञानस्थली स्कूल में 27 सितंबर 2010 को कक्षा छह की छात्रा दिव्या पढ़ने गई थी। दोपहर में दिव्या की हालत बिगड़ने पर स्कूल कर्मचारी उसे घर छोड़ गए। गंभीर हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था।
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दिव्या की मां सोनू भदौरिया ने स्कूल प्रबंधन पर आरोप लगाए थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने मामले की सीबीसीआईडी जांच के आदेश दिए थे। इसके बाद स्कूल प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा और उनके बेटे पीयूष व सुधीर के अलावा लिपिक संतोष को जेल भेजा गया था।
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पांच दिसंबर 2018 को अपर जिला जज द्वितीय ज्योति कुमार त्रिपाठी ने पीयूष को कुकर्म और हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद और 75 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी, जबकि गैर इरादतन हत्या और जानबूझकर अपराध की सूचना न देने का दोषी मानते हुए सुधीर वर्मा और संतोष मिश्रा को एक-एक साल की कैद की सजा सुनाई थी।
सबूतों के अभाव में स्कूल प्रबंधक चंद्रपाल वर्मा को दोषमुक्त करार दिया गया था। तीनों ने सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी। सोनू भदौरिया की ओर से अधिवक्ता एलएम सिंह व रघुवीर शरण सिंह ने अपील का विरोध किया था।
सीडीआर और डीएनए रिपोर्ट बनी पीयूष के गले की फांस
सजा से बचने के लिए हाईकोर्ट में की गई अपील में पीयूष की ओर से कई तर्क रखे गए लेकिन डीएनए और सीडीआर (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) उसके गले की फांस बन गया। हाईकोर्ट ने इन दोनों ही साक्ष्यों को पर्याप्त मानते हुए पीयूष को माफी देने से इनकार कर दिया।
सोनू के अधिवक्ता एलएम सिंह ने बताया कि 15 लोगों के डीएनए सैंपल लिए गए थे। सिर्फ पीयूष के परिवार के लोगों का सैंपल ही दिव्या के सैंपल से मिला था। बुजुर्ग होने के कारण चंद्रपाल संदेह से बाहर था। अब पीयूष और सुधीर पर आरोप साबित होना बाकी था।
तीनों की मोबाइल लोकेशन के आधार पर सीडीआर की पड़ताल हुई तो मामला साफ हो गया। पीयूष के मोबाइल की लोकेशन ही स्कूल के पास मिली, जबकि सुधीर की घटनास्थल से लगभग 70 किमी दूर उन्नाव में थी। पीयूष ने अपील में तर्क रखा था कि उसके खिलाफ नामजद एफआईआर नहीं थी।
जांच में उसका नाम बाद में जोड़ा गया। जिस स्कूल में घटना बताई जा रही है, उसकी देखरेख पिता चंद्रपाल करते थे। स्कूल से उसका कोई लेनादेना नहीं था। सोनू की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता अजय सिंह भदौरिया ने बताया कि पीयूष की अपील वर्ष 2018 से हाईकोर्ट में लंबित थी।
सजा से बचने के लिए हाईकोर्ट में की गई अपील में पीयूष की ओर से कई तर्क रखे गए लेकिन डीएनए और सीडीआर (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) उसके गले की फांस बन गया। हाईकोर्ट ने इन दोनों ही साक्ष्यों को पर्याप्त मानते हुए पीयूष को माफी देने से इनकार कर दिया।
सोनू के अधिवक्ता एलएम सिंह ने बताया कि 15 लोगों के डीएनए सैंपल लिए गए थे। सिर्फ पीयूष के परिवार के लोगों का सैंपल ही दिव्या के सैंपल से मिला था। बुजुर्ग होने के कारण चंद्रपाल संदेह से बाहर था। अब पीयूष और सुधीर पर आरोप साबित होना बाकी था।
तीनों की मोबाइल लोकेशन के आधार पर सीडीआर की पड़ताल हुई तो मामला साफ हो गया। पीयूष के मोबाइल की लोकेशन ही स्कूल के पास मिली, जबकि सुधीर की घटनास्थल से लगभग 70 किमी दूर उन्नाव में थी। पीयूष ने अपील में तर्क रखा था कि उसके खिलाफ नामजद एफआईआर नहीं थी।
जांच में उसका नाम बाद में जोड़ा गया। जिस स्कूल में घटना बताई जा रही है, उसकी देखरेख पिता चंद्रपाल करते थे। स्कूल से उसका कोई लेनादेना नहीं था। सोनू की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता अजय सिंह भदौरिया ने बताया कि पीयूष की अपील वर्ष 2018 से हाईकोर्ट में लंबित थी।
पीयूष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जहां से उसे अपील के जल्द निस्तारण का आदेश मिल गया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने मामले को निस्तारित कर दिया और उसकी रिहाई की आस भी टूट गई। उन्होंने कहा आदेश के खिलाफ अगर पीयूष सुप्रीम कोर्ट में अपील करता है तो वहां भी आपत्ति लगाई जाएगी।
दिव्या को इंसाफ के लिए देशभर में हुए थे प्रदर्शन
आठ साल की बच्ची के साथ स्कूल में हुई दरिंदगी की घटना ने शहर ही नहीं पूरे देश को हिला दिया था। पहले तो पुलिस ने स्कूल प्रबंधन से मिलकर दिव्या के पड़ोसी मुन्ना लोध को ही आरोपी बनाकर जेल भेज दिया था और दिव्या की मां सोनू भदौरिया की आवाज को दबाने की कोशिश की थी लेकिन जगह-जगह हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के मद्देनजर सरकार को सीबीसीआईडी जांच के आदेश देने पड़े थे।
इसमें मामला खुला और 15 अक्टूबर 2010 को पीयूष को जेल जाना पड़ा। काफी मशक्कत के बावजूद उसे जमानत नहीं मिल सकी। आठ साल चली लंबी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान कुल 39 गवाह कोर्ट में पेश किए गए थे। सीबीसीआईडी की ओर से नागेश दीक्षित और सोनू की ओर से अजय सिंह भदौरिया ने कोर्ट में पक्ष रखा था। इसके बाद 5 दिसंबर 2018 को कोर्ट ने 125 पेज के आदेश में पीयूष को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
दिव्या को इंसाफ के लिए देशभर में हुए थे प्रदर्शन
आठ साल की बच्ची के साथ स्कूल में हुई दरिंदगी की घटना ने शहर ही नहीं पूरे देश को हिला दिया था। पहले तो पुलिस ने स्कूल प्रबंधन से मिलकर दिव्या के पड़ोसी मुन्ना लोध को ही आरोपी बनाकर जेल भेज दिया था और दिव्या की मां सोनू भदौरिया की आवाज को दबाने की कोशिश की थी लेकिन जगह-जगह हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के मद्देनजर सरकार को सीबीसीआईडी जांच के आदेश देने पड़े थे।
इसमें मामला खुला और 15 अक्टूबर 2010 को पीयूष को जेल जाना पड़ा। काफी मशक्कत के बावजूद उसे जमानत नहीं मिल सकी। आठ साल चली लंबी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान कुल 39 गवाह कोर्ट में पेश किए गए थे। सीबीसीआईडी की ओर से नागेश दीक्षित और सोनू की ओर से अजय सिंह भदौरिया ने कोर्ट में पक्ष रखा था। इसके बाद 5 दिसंबर 2018 को कोर्ट ने 125 पेज के आदेश में पीयूष को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।