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Kargil Vijay Diwas: जांबाजों की बहादुरी से कारगिल की जंग में कांप उठे थे दुश्मन, राष्ट्रपति ने थपथपाई थी पीठ

Thu, 25 Jul 2024 08:14 PM IST
शिखा पांडेय तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज
तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज Published by: शिखा पांडेय Updated Thu, 25 Jul 2024 08:14 PM IST
सार

Kargil Vijay Diwas: कारगिल की जंग में इत्रनगरी की बहादुरी की खुशबू भी महकी है। 20 साल पहले हुई जंग की यादें जवानों के जहन में अब भी ताजा हैं।

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Kargil Vijay Diwas: enemies trembled in the Kargil war due to the bravery of the brave soldiers
Kargil Vijay Diwas - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

खुशबू के शहर की फिजाओं में देशभक्ति की भावना भी बहती है। यह बात यहां के जांबाजों की बहादुरी साबित भी करती है। इत्रनगरी में एक नहीं ऐसे अनेक योद्धा हैं जिन्होंने समय-समय पर देश के लिए जीवन को दांव पर लगाया है। दुश्मनों से लोहा लेते हुए कई शहीद हो गए तो कइयों ने दुश्मनों को गोलियों से छलनी करते हुए मौत के घाट उतार दिया। अब से 20 साल पहले कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों में पाकिस्तानी फौज को शिकस्त देने वालों में कन्नौज के भी लाल शामिल थे। 24 साल पहले 1999 में तीन मई से 26 जुलाई तक चले कारगिल युद्ध में इत्रनगरी के जांबाजों ने अपनी जांबाजी से दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे।
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रामनरेश की टोली में शहीद हुए थे तीन सैनिक
मूल रूप से मूलरूप से ब्लॉक गुगरापुर ब्लॉक के हनुमंत खेड़ा निवासी सेना हवलदार पद से रिटायर स्व. रामनरेश यादव भी कारगिल की जंग में दुश्मनों के दांत खट्टे कर चुके थे। उन्होंने पांच गोलियां खाकर भी मौत को मात दे दी। हालांकि टोली के तीन साथी शहीद भी हुए, लेकिन दो आतंकी भी मार गिराए गए। दो साल पहले उनका निधन हो गया है। परिवार ने उनकी यादों को सहेज कर रखा है। रामनरेश यादव के इकलौते पुत्र प्रवीण यादव इस समय सरायमीरा के देविनटोला में रहते हैं। वह बताते हैं कि पिता राष्ट्रीय रायफल मानसवर्ग में तैनात थे। 13 जुलाई 1999 को दुश्मनों ने उनपर फायर किया। तीन जवान शहीद हो गए। दो साथी घायल हुए, इसमें उनके पिता रामनरेश यादव भी थे।
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कैप्टर रविंद्र ने पाकिस्तान के पांच सैनिकों को किया ढेर
कारगिल की जंग में मां भारती की रक्षा करते हुए अपनी जान की बाजी लगाने वालों में कैप्टर रवींद्र कुमार का भी नाम शामिल है। छिबरामऊ क्षेत्र के बिराहिमपुर में 14 दिसम्बर 1962 को जन्मे रविंद्र कुमार कारगिल युद्ध में हवलदार थे। 23 जुलाई 1999 को उन्होंने जमीन से 17 हजार 500 फुट की ऊंचाई पर गला देने वाली ठंड में पांच पाकिस्तानी जवानों को मौत की नींद सुला दिया था। खुद कैप्टन रवींद्र कुमार बताते हैं कि उनकी तैनाती कारगिल से 200 किलोमीटर दूर सियाचीन ग्लेशियर में थी। इस दौरान कारगिल में पाकिस्तानी फौज ने घुसपैठ कर दिया तो उनकी टीम को भी कारगिल भेज दिया गया। 10 मई से 23 जुलाई के बीच ऑपरेशन चला। 23 जुलाई की रात अपने साथियों के साथ किसी तरह ऊंचाई को पारकर पाकिस्तान के बंकर तक पहुंचे। वहां मौजूद पांच पाकिस्तानी फौजियों को ढेर कर दिया।

 

राष्ट्रपति ने थपथपाई पीठ
जंग के दौरान जख्मी हालत में जान गंवा चुके अपने साथियों के पार्थिव शरीर के साथ वह तीन दिनों तक पहाड़ियों में बर्फ पर पड़े रहे। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें गैलेंट्री अवार्ड से सम्मानित किया था।
 
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