{"_id":"6029be998ebc3ee941516c8e","slug":"kanpur-news-people-of-behmai-still-remember-phoolan-s-cruelty","type":"story","status":"publish","title_hn":"बेहमई और बेरहमी के 40 बरसः नरसंहार की टीस...नफरत अब भी बरकरार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बेहमई और बेरहमी के 40 बरसः नरसंहार की टीस...नफरत अब भी बरकरार
Mon, 15 Feb 2021 05:51 AM IST
दुष्यंत शर्मा
शैलेश अवस्थी, कानपुर
शैलेश अवस्थी, कानपुर
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Mon, 15 Feb 2021 05:51 AM IST
विज्ञापन
बेहमई गांव...
- फोटो : amar ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चालीस साल पहले जिस बेहमई गांव में फूलन देवी ने नरसंहार कर नफरत की आग लगाई थी, वह अभी पूरी तरह बुझी नहीं है। पीपे का पुल और सड़कें बनने के बाद बेहमई से गुढ़ा का पुरवा (फूलन का गांव) की दूरी भले कम हो गई हो, पर दिलों के फासले नहीं पटे हैं। न कोई उस गांव जाता है और न वहां का कोई इधर झांकता है। फूलन के जिंदा रहते उसके गुढ़ा का पुरवा गांव का कोई बेहमई के करीब से गुजरता था तो उसकी शामत आ जाती थी। गांव जागरूक हुए हैं, लेकिन ऊंची और नीची जाति की भावना अभी पूरी तरह मिटी नहीं है।
विज्ञापन
फूलन और उसके गांव का जिक्र आते ही बेहमई गांव के 65 साल के सुरेश सिंह की आंखें लाल हो जाती हैं, नसें तन जाती हैं और आक्रोश झलक पड़ता है। गांव के बीचोबीच बने कुएं की तरफ इशारा कर बताते हैं कि इसी जगह फूलन गैंग ने निहत्थे लोगों को इकट्ठा किया और कुछ दूर ले जाकर मार डाला। उसे सजा देना तो दूर सांसद बना दिया। पीढ़ी गुजर गई और न्याय कानूनी दांवपेच में उलझा है। विधवाओं को देख कलेजा बैठ जाता है। पूर्व प्रधान जयवीर सिंह बताते हैं कि फूलन ने बहुत कोशिश की बेहमई आकर माफी मांगने की, लेकिन उसे घुसने नहीं दिया।
विज्ञापन
क्या विधवाओं का सुहाग वह वापस कर सकती थी? वह तो सांसद बनकर दिल्ली तक पहुंच गई, लेकिन बेहमई की बेवाएं तो अभी भी गांव की दहलीज पर सुबक रही हैं। फिल्म में बेहमई में फूलन पर अत्याचार की जो कहानी दिखाई गई, वह झूठ है। जिस सपा ने फूलन को सांसद बनाया, उसका इस गांव में बहिष्कार है। सवा सौ परिवार वाले इस गांव की आबादी लगभग आठ सौ है।
विज्ञापन
बुजुर्ग लाजवती ने बताया कि उन्होंने फूलन का क्रूर चेहरा देखा है। वह मार दी गई पर यह बात सालती है कि अभी तक उसके गैंग के डकैत जेल से बाहर हैं। रामलखन बताते हैं कि मुलायम सिंह ने कहा था कि फूलन को माफ कर दो, बेहमई को सैफई बना देंगे, लेकिन गांव वालों ने उन्हें और उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
उधर, फूलन के गांव (गुढ़ा का पुरवा) के लोग भी बेहमई से बचते हैं। वे कहते हैं नई पीढ़ी को कोई खास फर्क नहीं पड़ता, लेकिन बुजुर्गों के मन में नाराजगी खत्म नहीं हुई है। वे खुलकर बात करने में संकोच करते हैं। गांव के सिद्धनाथ कहते हैं कि पांच साल पहले बेहमई के बगल के गांव में यहां से बरात गई थी। उन्होंने बेटी की शादी बेहमई मजरा के खोजा गांव में की है।
एक वक्त दबंगों के अत्याचार ने आक्रोश पैदा कर दिया था। इससे तंग फूलन देवी ने बंदूक उठाई। इसका यह मतलब नहीं कि पूरा गांव गुनहगार हो। फूलन की मां मूलादेवी की देखरेख उनका नाती मोहन करता है। वह किसी बाहरी को देख भड़क जाती हैं। फूलन के जिक्र पर बुदबुदाती हैं... माई मोड़ी को दबंगन ने दुक्ख (दुख) दई, इते कोई मदद नईं करी... तबइ वह बीहड़न में गई।
गुस्सा तो है
हम क्यों जाएं फूलन के गांव। वहां हमारा क्या काम। वहां से कोई इधर आता तो विधवाओं का गुस्सा फट पड़ता है। हमने तो नरसंहार का वह खौफनाक मंजर देखा है तो चैन नहीं पड़ता। अब तो न्याय की उम्मीद भी कम ही है। - रामलखन, बेहमई
आक्रोश कम हुआ है
फूलन ने अपने पर हुए अत्याचार का बदला लिया था। वह उसका आक्रोश था। इसमें उसके पूरे गांव का क्या कसूर। बेहमई कांड के बाद इस गांव पर पुलिस और दबंग कहर ढा रहे थे। तब भी फूलन ने रक्षा की थी। अब आक्रोश कम हुआ है। - रामसेवक, गुढ़ापुरवा