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Kanpur News: गिद्ध प्रकृति के स्वच्छता प्रहरी, संरक्षण को जनभागीदारी जरूरी
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5 सितंबर को कानपुर जू में अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस पर होगा विशेष कार्यक्रम
माई सिटी रिपोर्टर
कानपुर। गिद्ध केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि प्रकृति के स्वच्छता प्रहरी हैं। मृत पशुओं के शवों को तेजी से साफ कर ये संक्रमण और बीमारियों के प्रसार को रोकने में अहम भूमिका निभाते हैं। गिद्ध संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए 5 सितंबर को कानपुर प्राणी उद्यान में अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।
गुरुवार को कानपुर जू में आयोजित प्रेस वार्ता में निदेशक डॉ. कन्हैया पटेल और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) की वरिष्ठ वैज्ञानिक अलका दुबे ने गिद्ध संरक्षण की जरूरत और कार्यक्रम की जानकारी दी।
पशु विशेषज्ञ अलका दुबे ने बताया कि गिद्धों की संख्या में गिरावट के प्रमुख कारणों में पशु चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली कुछ दर्द निवारक दवाएं भी शामिल हैं। डाइक्लोफेनाक, एसीक्लोफेनाक, केटोप्रोफेन और निमेसुलाइड जैसी दवाएं गिद्धों के लिए घातक साबित हो सकती हैं। उन्होंने पशु चिकित्सकों, पशुपालकों, पैरावेट्स और दवा विक्रेताओं से वैज्ञानिक सलाह व सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप दवाओं के इस्तेमाल की अपील की। डॉ. कन्हैया पटेल ने कहा कि गिद्ध संरक्षण केवल वन विभाग या संरक्षण संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें पशु चिकित्सकों, पशुपालकों, विद्यार्थियों, युवाओं और आम नागरिकों की भागीदारी जरूरी है। 5 सितंबर के कार्यक्रम में गिद्धों के पारिस्थितिक महत्व, सुरक्षित पशु चिकित्सा दवाओं, वल्चर सेफ जोन और संरक्षण में नागरिकों की भूमिका को लेकर जागरूकता गतिविधियां होंगी।
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माई सिटी रिपोर्टर
कानपुर। गिद्ध केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि प्रकृति के स्वच्छता प्रहरी हैं। मृत पशुओं के शवों को तेजी से साफ कर ये संक्रमण और बीमारियों के प्रसार को रोकने में अहम भूमिका निभाते हैं। गिद्ध संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए 5 सितंबर को कानपुर प्राणी उद्यान में अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।
गुरुवार को कानपुर जू में आयोजित प्रेस वार्ता में निदेशक डॉ. कन्हैया पटेल और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) की वरिष्ठ वैज्ञानिक अलका दुबे ने गिद्ध संरक्षण की जरूरत और कार्यक्रम की जानकारी दी।
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पशु विशेषज्ञ अलका दुबे ने बताया कि गिद्धों की संख्या में गिरावट के प्रमुख कारणों में पशु चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली कुछ दर्द निवारक दवाएं भी शामिल हैं। डाइक्लोफेनाक, एसीक्लोफेनाक, केटोप्रोफेन और निमेसुलाइड जैसी दवाएं गिद्धों के लिए घातक साबित हो सकती हैं। उन्होंने पशु चिकित्सकों, पशुपालकों, पैरावेट्स और दवा विक्रेताओं से वैज्ञानिक सलाह व सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप दवाओं के इस्तेमाल की अपील की। डॉ. कन्हैया पटेल ने कहा कि गिद्ध संरक्षण केवल वन विभाग या संरक्षण संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें पशु चिकित्सकों, पशुपालकों, विद्यार्थियों, युवाओं और आम नागरिकों की भागीदारी जरूरी है। 5 सितंबर के कार्यक्रम में गिद्धों के पारिस्थितिक महत्व, सुरक्षित पशु चिकित्सा दवाओं, वल्चर सेफ जोन और संरक्षण में नागरिकों की भूमिका को लेकर जागरूकता गतिविधियां होंगी।
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