{"_id":"57f5500f4f1c1b893227152c","slug":"gma-goddess-are-all-fulfilled","type":"story","status":"publish","title_hn":"हर मुराद पूरी करती हैं गमा देवी माता","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हर मुराद पूरी करती हैं गमा देवी माता
ब्यूरो, अमर उजाला,कन्नौज
Updated Thu, 06 Oct 2016 12:40 AM IST
विज्ञापन
मंदिर गमां देवी
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
क्षेत्र के गांव ताहपुर में बने गमा देवी मंदिर को गांव वाले रखवाली मां के नाम भी जानते हैं। मान्यता है कि देवी मंदिर में माथा टेकने वाले भक्त की हर मुश्किल दूर हो जाती है। पूजा पाठ करने और मन्नत मांगने पर भक्तों की हर मुराद दरबार में पूरी होती है।
मंदिर के सेवादार प्रदीप मिश्रा बताते हैं कि देवी मंदिर में युवा शादी के लिए, बारात रवाना होने से पहले माथा टेकते हैं। शादी के बाद शांति, खुशहाली के लिए नव दंपति मां के चरणों में पहुंचकर आशीर्वाद लेते हैं। मौत के बाद शव यात्रा ले जाते समय माता के मंदिर में शव को विश्राम देने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है। शव यात्रा शुरू करने से पहले देवी दरबार में शव रखने से मृतक की आत्मा को शांति मिलती है। कई दशकों से ऐसी परंपरा चली आ रही है। उनके मुताबिक चैत्र, शारदीय नवरात्र में शाम आठ बजे से लेकर भजन-कीर्तन, पूजन होता है। गांव के लोग मिल जुल कर कभी जागरण, कभी भागवत कथा का आयोजन कराते हैं। होली पर्व के बाद होली मिलन मेला भी मंदिर परिसर में आयोजित होता है। वहीं बबलू का कहना है कि मां गमा देवी के दरबार में आने वाले व्यक्ति की बाधाएं और गम दूर होते हैं।
इनसेट
नवरात्र में पूजन का है विशेष महत्व
सेवादार देवश शुक्ला बताते हैं कि नवरात्र में मंदिर में पूजन करने का विशेष महत्व है। नौ दिन तक तमाम धार्मिक कार्यक्रम होते रहते हैं। गांव के वीरेंद्र बताते हैं कि गांव के समीप सैकड़ों साल पहले चबूतरा बना था। जिस पर गमा देवी की मूर्ति रखी थी। कई दशक पहले गांव के प्रथम प्रधान बने राम प्रसाद ने यहां पर मंदिर निर्माण कराया था। पुजारी के रूप में राम प्रकाश पाल ने लंबे समय तक पूजा, अर्चना की।
विज्ञापन
सामाजिक आध्यात्मिक स्वयं सेवी संस्था सन्मार्ग का नवदुर्गा पांडाल मंगलवार को आई तेज आंधी से गिर गया। हालांकि मां की शक्ति का नजारा ऐसा रहा है कि अखंड ज्योति व जवारों पर कोई असर नहीं हुआ। संस्था ने कानपुर से कारीगरों को बुलाकर दोबारा मूर्तियों का रंग-रोगन शुरू कराया है।
नवदुर्गा पांडाल का तेज तूफान व बारिश ने नजारा ही बदल दिया। भक्तों के बैठने के लिए डाली गई मेट, सीलिंग सहित अन्य सामान चारों ओर बिखर गए। लोगों ने माता की मूर्ति को अंत तक बचाने का प्रयास किया। संस्था ने मूर्तियों को दोबारा रंग-रोगन शुरू करा दिया है। बुधवार को स्कूली बच्चों की पेंटिंग प्रतियोगिता व सुबह की पूजा में कुछ व्यवधान आया, लेकिन बाद में सब कुछ ठीक हो गया। उधर चित्रकला प्रतियोगिता में स्वामी विवेकानंद इंटर कालेज की सुनैना पाल, सरस्वती बालिका हायर सेकेंड्री की कीर्ति त्रिवेदी, श्रद्धा वैश्य, श्रेया दुबे, सरस्वती शिशु मंदिर कानूनगोयान की हर्षिता पांडेय, कन्नौज पब्लिक स्कूल के आयूष कटियार, गोमती देवी इंटर कालेज की स्मिता कश्यप, एसवीएस इंटर कालेज के आशीष राठौर, माया देवी इंटर कालेज के गौरव तिवारी, वैष्णवी, वैशाली वर्मा, करिश्मा सैनी, पल्लवी कुशवाहा, गोमती देवी इंटर कालेज के रचिता कुशवाहा ने चित्रकला प्रतियोगिता में प्रतिभाग किया।
मोक्ष दिलाएंगी स्कंदमाता
नवरात्र के पांचवें दिन देवासुर संग्राम के सेनापति भगवान स्कंद अर्थात कार्तिकेयजी की माता देवी स्कंदमाता के रूप की पूजा होती है। कमल पुष्प के आसन पर विराजमान होने से इन्हें स्कंदमाता भी कहा जाता है। आचार्य पंडित पवन शुक्ला ने बताया माता सिंह पर विराजमान रहती है। माता के चार हाथों में दो में कमल पुष्प और एक हाथ में वर मुद्रा, एक में स्कंद को संभाले हुए है।
कैसे करें इनकी पूजा
आचार्य पंडित पवन शुक्ला बताते हैं स्कंदमाता की पूजा के लिए लकड़ी की एक चौकी पर पीले रंग का नया वस्त्र बिछाकर कुमकुम से ऊं का तिलक लगाते है। उसी चौकी पर माता के चित्र या मूर्ति को स्थापित करते है। उन्हाेंने बताया इनके पूजन में पीले रंग के पुष्प, वस्त्र और पीले रंग का ही भोग अर्पित किया जाता है। माता को इस दौरान चुनरी चढ़ाना भी लाभकारी माना जाता है।
मंदिर के सेवादार प्रदीप मिश्रा बताते हैं कि देवी मंदिर में युवा शादी के लिए, बारात रवाना होने से पहले माथा टेकते हैं। शादी के बाद शांति, खुशहाली के लिए नव दंपति मां के चरणों में पहुंचकर आशीर्वाद लेते हैं। मौत के बाद शव यात्रा ले जाते समय माता के मंदिर में शव को विश्राम देने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है। शव यात्रा शुरू करने से पहले देवी दरबार में शव रखने से मृतक की आत्मा को शांति मिलती है। कई दशकों से ऐसी परंपरा चली आ रही है। उनके मुताबिक चैत्र, शारदीय नवरात्र में शाम आठ बजे से लेकर भजन-कीर्तन, पूजन होता है। गांव के लोग मिल जुल कर कभी जागरण, कभी भागवत कथा का आयोजन कराते हैं। होली पर्व के बाद होली मिलन मेला भी मंदिर परिसर में आयोजित होता है। वहीं बबलू का कहना है कि मां गमा देवी के दरबार में आने वाले व्यक्ति की बाधाएं और गम दूर होते हैं।
विज्ञापन
इनसेट
नवरात्र में पूजन का है विशेष महत्व
सेवादार देवश शुक्ला बताते हैं कि नवरात्र में मंदिर में पूजन करने का विशेष महत्व है। नौ दिन तक तमाम धार्मिक कार्यक्रम होते रहते हैं। गांव के वीरेंद्र बताते हैं कि गांव के समीप सैकड़ों साल पहले चबूतरा बना था। जिस पर गमा देवी की मूर्ति रखी थी। कई दशक पहले गांव के प्रथम प्रधान बने राम प्रसाद ने यहां पर मंदिर निर्माण कराया था। पुजारी के रूप में राम प्रकाश पाल ने लंबे समय तक पूजा, अर्चना की।
विज्ञापन
सामाजिक आध्यात्मिक स्वयं सेवी संस्था सन्मार्ग का नवदुर्गा पांडाल मंगलवार को आई तेज आंधी से गिर गया। हालांकि मां की शक्ति का नजारा ऐसा रहा है कि अखंड ज्योति व जवारों पर कोई असर नहीं हुआ। संस्था ने कानपुर से कारीगरों को बुलाकर दोबारा मूर्तियों का रंग-रोगन शुरू कराया है।
नवदुर्गा पांडाल का तेज तूफान व बारिश ने नजारा ही बदल दिया। भक्तों के बैठने के लिए डाली गई मेट, सीलिंग सहित अन्य सामान चारों ओर बिखर गए। लोगों ने माता की मूर्ति को अंत तक बचाने का प्रयास किया। संस्था ने मूर्तियों को दोबारा रंग-रोगन शुरू करा दिया है। बुधवार को स्कूली बच्चों की पेंटिंग प्रतियोगिता व सुबह की पूजा में कुछ व्यवधान आया, लेकिन बाद में सब कुछ ठीक हो गया। उधर चित्रकला प्रतियोगिता में स्वामी विवेकानंद इंटर कालेज की सुनैना पाल, सरस्वती बालिका हायर सेकेंड्री की कीर्ति त्रिवेदी, श्रद्धा वैश्य, श्रेया दुबे, सरस्वती शिशु मंदिर कानूनगोयान की हर्षिता पांडेय, कन्नौज पब्लिक स्कूल के आयूष कटियार, गोमती देवी इंटर कालेज की स्मिता कश्यप, एसवीएस इंटर कालेज के आशीष राठौर, माया देवी इंटर कालेज के गौरव तिवारी, वैष्णवी, वैशाली वर्मा, करिश्मा सैनी, पल्लवी कुशवाहा, गोमती देवी इंटर कालेज के रचिता कुशवाहा ने चित्रकला प्रतियोगिता में प्रतिभाग किया।
मोक्ष दिलाएंगी स्कंदमाता
नवरात्र के पांचवें दिन देवासुर संग्राम के सेनापति भगवान स्कंद अर्थात कार्तिकेयजी की माता देवी स्कंदमाता के रूप की पूजा होती है। कमल पुष्प के आसन पर विराजमान होने से इन्हें स्कंदमाता भी कहा जाता है। आचार्य पंडित पवन शुक्ला ने बताया माता सिंह पर विराजमान रहती है। माता के चार हाथों में दो में कमल पुष्प और एक हाथ में वर मुद्रा, एक में स्कंद को संभाले हुए है।
कैसे करें इनकी पूजा
आचार्य पंडित पवन शुक्ला बताते हैं स्कंदमाता की पूजा के लिए लकड़ी की एक चौकी पर पीले रंग का नया वस्त्र बिछाकर कुमकुम से ऊं का तिलक लगाते है। उसी चौकी पर माता के चित्र या मूर्ति को स्थापित करते है। उन्हाेंने बताया इनके पूजन में पीले रंग के पुष्प, वस्त्र और पीले रंग का ही भोग अर्पित किया जाता है। माता को इस दौरान चुनरी चढ़ाना भी लाभकारी माना जाता है।