{"_id":"570ea9164f1c1b7b644a6c4e","slug":"sai-failed-in-qwalify","type":"story","status":"publish","title_hn":"साई नहीं करा पा रहा ‘क्वालीफाई’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
साई नहीं करा पा रहा ‘क्वालीफाई’
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 14 Apr 2016 01:46 AM IST
विज्ञापन
sai, jhansi hindi news
- फोटो : demo
झांसी। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की कर्मस्थली झांसी में खेल प्रतिभाओं को तराशने और उन्हें उच्च स्तरीय प्रतियोगिताओं में भेजने की जिम्मेदारी निभाने का दावा करने वाली स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) स्वयं वेंटीलेशन पर है। यहां न तो कोच हैं और न ही कोई ठोस योजना। पंद्रह साल बाद सिर्फ एक अधिकारी के सहारे पेपर वर्क पर संस्थान जिंदा है। दद्दा के क्षेत्र में खेलों और विशेषकर हॉकी की स्थिति दुर्दशाग्रस्त है। इसे जीवित करने के लिए केंद्र व राज्य सरकारों की संजीवनी (कृपा) की बेहद आवश्यकता है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि साई खिलाड़ियों को किसी भी खेल में क्वालीफाई नहीं करा पा रहा है।
केंद्र सरकार की खेलों को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई स्पोटर्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया को झांसी में वर्ष 2001 में स्थापित किया गया था। ध्यानचंद स्टेडियम में एक कमरे में खोला गया कार्यालय शुरूआती दिनों में बेहद सक्रिय रहा। कारण, तत्कालीन केंद्रीय खेल एवं युवा कल्याण मंत्री उमा भारती व प्रदेश सरकार के खेल मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने संयुक्त रूप से इसकी स्थापना कराई थी। झांसी में कार्यालय शुरू हुआ और हॉकी, जिम्नास्टिक के साथ-साथ प्रत्येक खेल के खिलाड़ियाें को बेहतर भविष्य की आशा बंध गई।
साई ने शुरूआत में हॉकी के लिए डे बोर्डिंग स्कीम शुरू की। लगभग 24 बच्चों का चयन किया गया और उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए कोच भी मिल गए। प्रत्येक बच्चे को स्टाइपेंड के तौर पर 600 रुपये डाइट के लिए मिलने लगे। साथ ही उन्हें पूरी स्पोटर्स किट भी साई की ओर से दी गई। इसके बावजूद महज चंद खिलाड़ी ही झांसी से ऊपर जाकर प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर खेल प्रतिभा दिखा सके। शेष यहीं शुरू हुए और यहीं उनके खेल जीवन का अंत हो गया। उनके नाम भी साई कार्यालय के निदेशक नहीं बता सके।
विज्ञापन
बॉक्स
----------
कोई कोच नहीं, प्रशिक्षण कैसे हो
झांसी। ध्यानचंद स्टेडियम के एक कमरे में संचालित हो रहे साई के कार्यालय में निदेशक के पद पर अनिल कुमार रावत कार्यरत हैं। इनके अलावा इस कार्यालय में न तो कोई अन्य कर्मचारी है और न ही किसी खेल का कोच। वर्ष 2012 में हॉकी कोच हीरालाल कुशवाहा सेवानिवृत्त हो गए तो उनके स्थान पर शासन ने नुसरत उल्ला अंसारी को भेज दिया। अंसारी भी चंद दिनों तक रुके और यहां से रुखसत हो गए। जिमनास्टिक के लिए सपना वर्मा कोच थीं, जो पिछले माह स्थानांतरित हो गईं। अब न तो कोई कोच बचा है और न ही कोई कर्मचारी। ऐसे में नए खिलाड़ी कैसे अपनी प्रतिभा निखारें और कैसे आगे बढ़ें?
झांसी व टीकमगढ़ के सफर में बीत रही नौकरी
झांसी। युवावस्था में जिमनास्टिक के अच्छे खिलाड़ी रहे झांसी स्थित साई कार्यालय के निदेशक अनिल कुमार रावत पर झांसी के अलावा टीकमगढ़ कार्यालय की भी जिम्मेदारी है। यहां के कागजात पूरे करने के बाद उन्हें टीकमगढ़ की यात्रा भी सप्ताह में लगभग दो बार करनी ही पड़ती है। वहां का एकाउंट व अन्य पेपर वर्क पूरा करना उनकी ही जिम्मेदारी है। जो वक्त बचता है, वह भी दिल्ली और अन्य स्थानों पर लगने वाली ड्यूटी को पूरा करने में निकल जाता है। हां, झांसी में जब भी उन्हें समय मिलता है, तो वह एलवीएम जाकर वहां बच्चों को जिमनास्टिक सिखाने में जुट जाते हैं।
छात्रावास ही नहीं, तो बच्चे कहां रुकेंगे
झांसी। अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी सुबोध खंडकर बताते हैं कि झांसी में हॉकी की स्थिति बेहद शर्मनाक है। न तो कोई अच्छा कोच मिल सका और न ही यहां के खिलाड़ियों की प्रतिभा का पोषण हो सका। झांसी में प्रतिभाओं और संभावनाओं की कमी नहीं है, बस उन्हें तराशने वाला चाहिए। साई की स्थापना उद्देश्यहीन साबित हो रही है। न तो केंद्र सरकार इस ओर ध्यान दे रही है और न ही राज्य सरकार। यदि राज्य सरकार छात्रावास उपलब्ध करा दे तो निश्चित ही कोई बढ़िया कोच यहां नियुक्त कर दिया जाएगा। बच्चों को रुकने के लिए स्थान नहीं है। उन्होंने छात्रावास की वकालत करते हुए साई के उद्देश्यों को सख्ती के साथ लागू करने की वकालत की।
डे बोर्डिंग स्कीम भी औंधे मुंह धड़ाम
झांसी। राष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी मोहम्मद वहीद बताते हैं कि साई ने छात्रावास के अभाव शुरुआत में डे बोर्डिंग योजना लागू की थी। इसमें बच्चे सुबह-शाम यहां खेलने आते थे और वापस घर चले जाते थे। उन्हें डाइट के लिए पैसे भी मिलते थे और स्पोर्ट्स किट भी। लेकिन कोचिंग का अभाव था। झांसी को कोच मिले भी तो बच्चे नहीं मिले, और जब बच्चे मिले तो कोच चले गए। ऐसे में प्रतिभाओं को निखारा नहीं बल्कि उनका दोहन हुआ और खेल प्रतिभाएं अन्य जनपदों में जाकर प्रशिक्षण लेने के लिए बाध्य हो गईं।
लखनऊ के साई छात्रावास में प्रशिक्षण ले रहा सुवर्ण
झांसी। ओलंपियन व भारतीय हॉकी टीम के कोच तुषार खंडकर का भतीजा सुवर्ण झांसी के साई कार्यालय में हॉस्टल व अच्छे कोच के अभाव में ट्रेनिंग लेने के लिए लखनऊ पहुंच गया। वहां वह साई के छात्रावास में रहकर हॉकी के गुर सीख रहा है। परिवार में विनोद खंडकर, सुबोध खंडकर, तुषार खंडकर जैसे बड़े हॉकी खिलाड़ी होने के बाद यह तीसरी पीढ़ी सुवर्ण के रूप में सफलता के झंडे गाढ़ने एवं देश का नाम दुनिया के पटल पर लिखने को बेताब है। सोलह वर्षीय सुवर्ण का कहना है कि झांसी में न तो कोच हैं और न ही सुविधाएं। इसलिए मजबूरी वश लखनऊ जाना पड़ा।
चंद खिलाड़ी ही बढ़े आगे
झांसी। स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया अर्थात साई कार्यालय झांसी चंद खिलाड़ियों को ही आगे बढ़ा सका है। या फिर इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि अभाव ग्रस्त कार्यप्रणाली में स्वयं प्रतिभा को उभार कर ये खिलाड़ी आगे बढ़े हैं। इनमें विनोद यादव, शिवम कुशवाहा व दीपेंद्र कुशवाहा हॉकी में राष्ट्रीय स्तर तक खेले। शिवम फिलहाल लखनऊ के छात्रावास में हॉकी के गुर सीख रहा है। वहीं, दीपेंद्र हॉकी के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियाें को संभाल रहा है। इनके अलावा लोकेश कोष्टा ने जिमनास्टिक में अपने जौहर राष्ट्रीय स्तर के खेलों में दिखाए हैं।
विज्ञापन
केंद्र सरकार की खेलों को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई स्पोटर्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया को झांसी में वर्ष 2001 में स्थापित किया गया था। ध्यानचंद स्टेडियम में एक कमरे में खोला गया कार्यालय शुरूआती दिनों में बेहद सक्रिय रहा। कारण, तत्कालीन केंद्रीय खेल एवं युवा कल्याण मंत्री उमा भारती व प्रदेश सरकार के खेल मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने संयुक्त रूप से इसकी स्थापना कराई थी। झांसी में कार्यालय शुरू हुआ और हॉकी, जिम्नास्टिक के साथ-साथ प्रत्येक खेल के खिलाड़ियाें को बेहतर भविष्य की आशा बंध गई।
विज्ञापन
साई ने शुरूआत में हॉकी के लिए डे बोर्डिंग स्कीम शुरू की। लगभग 24 बच्चों का चयन किया गया और उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए कोच भी मिल गए। प्रत्येक बच्चे को स्टाइपेंड के तौर पर 600 रुपये डाइट के लिए मिलने लगे। साथ ही उन्हें पूरी स्पोटर्स किट भी साई की ओर से दी गई। इसके बावजूद महज चंद खिलाड़ी ही झांसी से ऊपर जाकर प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर खेल प्रतिभा दिखा सके। शेष यहीं शुरू हुए और यहीं उनके खेल जीवन का अंत हो गया। उनके नाम भी साई कार्यालय के निदेशक नहीं बता सके।
विज्ञापन
बॉक्स
----------
कोई कोच नहीं, प्रशिक्षण कैसे हो
झांसी। ध्यानचंद स्टेडियम के एक कमरे में संचालित हो रहे साई के कार्यालय में निदेशक के पद पर अनिल कुमार रावत कार्यरत हैं। इनके अलावा इस कार्यालय में न तो कोई अन्य कर्मचारी है और न ही किसी खेल का कोच। वर्ष 2012 में हॉकी कोच हीरालाल कुशवाहा सेवानिवृत्त हो गए तो उनके स्थान पर शासन ने नुसरत उल्ला अंसारी को भेज दिया। अंसारी भी चंद दिनों तक रुके और यहां से रुखसत हो गए। जिमनास्टिक के लिए सपना वर्मा कोच थीं, जो पिछले माह स्थानांतरित हो गईं। अब न तो कोई कोच बचा है और न ही कोई कर्मचारी। ऐसे में नए खिलाड़ी कैसे अपनी प्रतिभा निखारें और कैसे आगे बढ़ें?
झांसी व टीकमगढ़ के सफर में बीत रही नौकरी
झांसी। युवावस्था में जिमनास्टिक के अच्छे खिलाड़ी रहे झांसी स्थित साई कार्यालय के निदेशक अनिल कुमार रावत पर झांसी के अलावा टीकमगढ़ कार्यालय की भी जिम्मेदारी है। यहां के कागजात पूरे करने के बाद उन्हें टीकमगढ़ की यात्रा भी सप्ताह में लगभग दो बार करनी ही पड़ती है। वहां का एकाउंट व अन्य पेपर वर्क पूरा करना उनकी ही जिम्मेदारी है। जो वक्त बचता है, वह भी दिल्ली और अन्य स्थानों पर लगने वाली ड्यूटी को पूरा करने में निकल जाता है। हां, झांसी में जब भी उन्हें समय मिलता है, तो वह एलवीएम जाकर वहां बच्चों को जिमनास्टिक सिखाने में जुट जाते हैं।
छात्रावास ही नहीं, तो बच्चे कहां रुकेंगे
झांसी। अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी सुबोध खंडकर बताते हैं कि झांसी में हॉकी की स्थिति बेहद शर्मनाक है। न तो कोई अच्छा कोच मिल सका और न ही यहां के खिलाड़ियों की प्रतिभा का पोषण हो सका। झांसी में प्रतिभाओं और संभावनाओं की कमी नहीं है, बस उन्हें तराशने वाला चाहिए। साई की स्थापना उद्देश्यहीन साबित हो रही है। न तो केंद्र सरकार इस ओर ध्यान दे रही है और न ही राज्य सरकार। यदि राज्य सरकार छात्रावास उपलब्ध करा दे तो निश्चित ही कोई बढ़िया कोच यहां नियुक्त कर दिया जाएगा। बच्चों को रुकने के लिए स्थान नहीं है। उन्होंने छात्रावास की वकालत करते हुए साई के उद्देश्यों को सख्ती के साथ लागू करने की वकालत की।
डे बोर्डिंग स्कीम भी औंधे मुंह धड़ाम
झांसी। राष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी मोहम्मद वहीद बताते हैं कि साई ने छात्रावास के अभाव शुरुआत में डे बोर्डिंग योजना लागू की थी। इसमें बच्चे सुबह-शाम यहां खेलने आते थे और वापस घर चले जाते थे। उन्हें डाइट के लिए पैसे भी मिलते थे और स्पोर्ट्स किट भी। लेकिन कोचिंग का अभाव था। झांसी को कोच मिले भी तो बच्चे नहीं मिले, और जब बच्चे मिले तो कोच चले गए। ऐसे में प्रतिभाओं को निखारा नहीं बल्कि उनका दोहन हुआ और खेल प्रतिभाएं अन्य जनपदों में जाकर प्रशिक्षण लेने के लिए बाध्य हो गईं।
लखनऊ के साई छात्रावास में प्रशिक्षण ले रहा सुवर्ण
झांसी। ओलंपियन व भारतीय हॉकी टीम के कोच तुषार खंडकर का भतीजा सुवर्ण झांसी के साई कार्यालय में हॉस्टल व अच्छे कोच के अभाव में ट्रेनिंग लेने के लिए लखनऊ पहुंच गया। वहां वह साई के छात्रावास में रहकर हॉकी के गुर सीख रहा है। परिवार में विनोद खंडकर, सुबोध खंडकर, तुषार खंडकर जैसे बड़े हॉकी खिलाड़ी होने के बाद यह तीसरी पीढ़ी सुवर्ण के रूप में सफलता के झंडे गाढ़ने एवं देश का नाम दुनिया के पटल पर लिखने को बेताब है। सोलह वर्षीय सुवर्ण का कहना है कि झांसी में न तो कोच हैं और न ही सुविधाएं। इसलिए मजबूरी वश लखनऊ जाना पड़ा।
चंद खिलाड़ी ही बढ़े आगे
झांसी। स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया अर्थात साई कार्यालय झांसी चंद खिलाड़ियों को ही आगे बढ़ा सका है। या फिर इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि अभाव ग्रस्त कार्यप्रणाली में स्वयं प्रतिभा को उभार कर ये खिलाड़ी आगे बढ़े हैं। इनमें विनोद यादव, शिवम कुशवाहा व दीपेंद्र कुशवाहा हॉकी में राष्ट्रीय स्तर तक खेले। शिवम फिलहाल लखनऊ के छात्रावास में हॉकी के गुर सीख रहा है। वहीं, दीपेंद्र हॉकी के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियाें को संभाल रहा है। इनके अलावा लोकेश कोष्टा ने जिमनास्टिक में अपने जौहर राष्ट्रीय स्तर के खेलों में दिखाए हैं।