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पूरणपोली से होगा स्वागत अतिथियों का
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 05 Mar 2017 12:30 AM IST
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पूरणपोली से होगा स्वागत अतिथियों का
- फोटो : demo
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रंगोत्सव होली की तैयारियां महानगर के महाराष्ट्रीय परिवारों में शुरू हो गई है। परंपराओं को निभाते हुए इन परिवारों के सदस्य पूरणपोली के साथ अतिथियों का स्वागत करेंगे।
महाराष्ट्रीय समाज में रंगों का पर्व होली पूर्णिमा से रंग पंचमी तक मनायी जाती है, जिसका प्रारंभ कुलधर्म व कुलाचार पूजा से होता है, जो परिवार का मुखिया अपने कुल देवता का करते है। कुल परंपराओं के अनुसार दोपहर 12 बजे तक या गो धूलि बेला में होलिका दहन किया जाता है। हालांकि इस दौरान भद्रा और राहुकाल के दोष से बचा जाता है। महाराष्ट्र समिति शहर झांसी के सचिव उज्जवल देवधर के अनुसार होलिका दहन से पहले पूजा में प्रसाद पूरणपोली (मीठी रोटी) का लगता है। जो महिलाएं धुले रेशमी वस्त्र पहनकर बनाती है। पूरणपोली गुड, शक्कर व चना की दाल से बनती है।
होलिका दहन के दूसरे दिन प्रतिपदा जिसे धुली वंदन कहते है, पर समाज के सदस्य होलिका दहन की भस्म में रंग मिलाकर होली खेलते है। पर्व पर घर आने वाले अतिथियों का स्वागत पूरणपोली और बेसन की भजिया से किया जाता है। हालांकि घरों में गुजिया पपड़ी नहीं बनती है। उनके अनुसार पर्व का उत्साह रंग पंचमी तक रहता है।
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समिति के वरिष्ठ सदस्य सुरेश खैर के मुताबिक होली पर्व से जुडे़ पहले रविवार अथवा रंग पंचमी पर महाराष्ट्र समाज के गणेश मंदिर में रंगोत्सव आयोजित होता है। इसमें भगवान विठ्ठल व रुक्मिणी की आराधना में शास्त्रीय व मराठी भजन तथा लोक नृत्य कलाकारों द्वारा किया जाता है।
बाक्स
दूज पर खेलते हैं होली
समिति के सचिव उज्जवल देवधर के अनुसार झांसी में महाराष्ट्र समाज के लोग दूज पर होली खेलते हैं। मान्यता है कि नगर के राजा गंगाधर राव का निधन प्रतिपदा पर हुआ था, जिससे प्रतिपदा पर होली नहीं खेली जाती है। प्रत्येक वर्ष समाज के सदस्य गणेश मंदिर में एकत्र होते हैं और लक्ष्मीताल स्थित गंगाधर राव की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करते है।
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महाराष्ट्रीय समाज में रंगों का पर्व होली पूर्णिमा से रंग पंचमी तक मनायी जाती है, जिसका प्रारंभ कुलधर्म व कुलाचार पूजा से होता है, जो परिवार का मुखिया अपने कुल देवता का करते है। कुल परंपराओं के अनुसार दोपहर 12 बजे तक या गो धूलि बेला में होलिका दहन किया जाता है। हालांकि इस दौरान भद्रा और राहुकाल के दोष से बचा जाता है। महाराष्ट्र समिति शहर झांसी के सचिव उज्जवल देवधर के अनुसार होलिका दहन से पहले पूजा में प्रसाद पूरणपोली (मीठी रोटी) का लगता है। जो महिलाएं धुले रेशमी वस्त्र पहनकर बनाती है। पूरणपोली गुड, शक्कर व चना की दाल से बनती है।
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होलिका दहन के दूसरे दिन प्रतिपदा जिसे धुली वंदन कहते है, पर समाज के सदस्य होलिका दहन की भस्म में रंग मिलाकर होली खेलते है। पर्व पर घर आने वाले अतिथियों का स्वागत पूरणपोली और बेसन की भजिया से किया जाता है। हालांकि घरों में गुजिया पपड़ी नहीं बनती है। उनके अनुसार पर्व का उत्साह रंग पंचमी तक रहता है।
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समिति के वरिष्ठ सदस्य सुरेश खैर के मुताबिक होली पर्व से जुडे़ पहले रविवार अथवा रंग पंचमी पर महाराष्ट्र समाज के गणेश मंदिर में रंगोत्सव आयोजित होता है। इसमें भगवान विठ्ठल व रुक्मिणी की आराधना में शास्त्रीय व मराठी भजन तथा लोक नृत्य कलाकारों द्वारा किया जाता है।
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दूज पर खेलते हैं होली
समिति के सचिव उज्जवल देवधर के अनुसार झांसी में महाराष्ट्र समाज के लोग दूज पर होली खेलते हैं। मान्यता है कि नगर के राजा गंगाधर राव का निधन प्रतिपदा पर हुआ था, जिससे प्रतिपदा पर होली नहीं खेली जाती है। प्रत्येक वर्ष समाज के सदस्य गणेश मंदिर में एकत्र होते हैं और लक्ष्मीताल स्थित गंगाधर राव की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करते है।