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महिला दिवस: वीरांगना नगरी की बेटियां चला रहीं मालगाड़ी और एक्सप्रेस ट्रेनें, निभा रहीं दोहरी जिम्मेदारी
Sun, 08 Mar 2026 08:36 AM IST
दीपक महाजन
संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी
संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी
Published by: दीपक महाजन
Updated Sun, 08 Mar 2026 08:36 AM IST
सार
बदलते दौर में महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। कभी घर की चौखट तक सीमित मानी जाने वाली महिलाएं रेल के इंजन तक पहुंच चुकी हैं।
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
बदलते दौर में महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। कभी घर की चौखट तक सीमित मानी जाने वाली महिलाएं रेल के इंजन तक पहुंच चुकी हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर वीरांगना नगरी झांसी की बेटियां भी मिसाल बनकर उभरी हैं। माता-पिता के सहयोग और अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने रेलवे में सहायक लोको पायलट बनकर मालगाड़ियों से लेकर मेल ट्रेनों तक की कमान संभाल ली है।
महिला सहायक लोको पायलटों का कहना है कि इंजन के केबिन में शौचालय की सुविधा न होने के कारण कई बार असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है, लेकिन इसके बावजूद वे पूरी जिम्मेदारी और समर्पण के साथ अपनी ड्यूटी निभा रही हैं। परिवार का सहयोग उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता है।
किसान परिवार की बेटी क्रांति बनीं प्रेरणा
बराठा गांव के किसान परिवार की छोटी बेटी क्रांति देवी ने माता-पिता के सहयोग से पढ़ाई की। आईटीआई से डिप्लोमा करने के बाद उन्होंने सहायक लोको पायलट की परीक्षा पास की और वर्ष 2017 में रेलवे में नियुक्ति पाई। वर्तमान में वह मालगाड़ी चला रही हैं। क्रांति बताती हैं कि उनके पति मध्य प्रदेश पुलिस में सहायक उपनिरीक्षक हैं और परिवार के सहयोग से उन्हें नौकरी में किसी तरह की परेशानी नहीं होती।
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पहले प्रयास में मिली सफलता
सीपरी बाजार की रहने वाली रोशनी सिंह ने पॉलीटेक्निक करने के बाद पहले ही प्रयास में सहायक लोको पायलट की परीक्षा पास कर ली। वह मेल ट्रेन चला रही हैं। रोशनी की शादी उत्तर प्रदेश पुलिस में उपनिरीक्षक से हुई है। दुकान चलाने वाले उनके पिता अपनी सबसे छोटी बेटी की इस उपलब्धि पर बेहद गर्व महसूस करते हैं।
चुनौतियों के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ी
अयोध्यापुरी कॉलोनी की शिल्पा शाक्या के पिता मैकेनिक हैं। पढ़ाई के प्रति रुचि और नौकरी पाने की लगन ने उन्हें सहायक लोको पायलट बना दिया। शिल्पा बताती हैं कि उन्होंने कभी दोपहिया वाहन भी नहीं चलाया था, लेकिन आज वह गुड्स ट्रेन चला रही हैं। हाल ही में उनकी शादी हुई है और अब वे परिवार और नौकरी दोनों जिम्मेदारियां निभा रही हैं। उनका कहना है कि जिम्मेदारियां बढ़ने के साथ चुनौतियां भी बढ़ गई हैं।
शताब्दी और वंदे भारत चलाने का सपना
झांसी की रहने वाली काजल शाक्या इस समय भुसावल में सहायक लोको पायलट का प्रशिक्षण ले रही हैं। काजल बताती हैं कि बड़ी बहन के प्रोत्साहन से वह इस मुकाम तक पहुंची हैं। उनका सपना शताब्दी और वंदे भारत जैसी ट्रेनों को चलाने का है। उनका कहना है कि हजारों यात्रियों को उनके गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचाना उनके लिए गर्व और देश सेवा का अवसर है।
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महिला सहायक लोको पायलटों का कहना है कि इंजन के केबिन में शौचालय की सुविधा न होने के कारण कई बार असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है, लेकिन इसके बावजूद वे पूरी जिम्मेदारी और समर्पण के साथ अपनी ड्यूटी निभा रही हैं। परिवार का सहयोग उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता है।
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किसान परिवार की बेटी क्रांति बनीं प्रेरणा
बराठा गांव के किसान परिवार की छोटी बेटी क्रांति देवी ने माता-पिता के सहयोग से पढ़ाई की। आईटीआई से डिप्लोमा करने के बाद उन्होंने सहायक लोको पायलट की परीक्षा पास की और वर्ष 2017 में रेलवे में नियुक्ति पाई। वर्तमान में वह मालगाड़ी चला रही हैं। क्रांति बताती हैं कि उनके पति मध्य प्रदेश पुलिस में सहायक उपनिरीक्षक हैं और परिवार के सहयोग से उन्हें नौकरी में किसी तरह की परेशानी नहीं होती।
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पहले प्रयास में मिली सफलता
सीपरी बाजार की रहने वाली रोशनी सिंह ने पॉलीटेक्निक करने के बाद पहले ही प्रयास में सहायक लोको पायलट की परीक्षा पास कर ली। वह मेल ट्रेन चला रही हैं। रोशनी की शादी उत्तर प्रदेश पुलिस में उपनिरीक्षक से हुई है। दुकान चलाने वाले उनके पिता अपनी सबसे छोटी बेटी की इस उपलब्धि पर बेहद गर्व महसूस करते हैं।
चुनौतियों के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ी
अयोध्यापुरी कॉलोनी की शिल्पा शाक्या के पिता मैकेनिक हैं। पढ़ाई के प्रति रुचि और नौकरी पाने की लगन ने उन्हें सहायक लोको पायलट बना दिया। शिल्पा बताती हैं कि उन्होंने कभी दोपहिया वाहन भी नहीं चलाया था, लेकिन आज वह गुड्स ट्रेन चला रही हैं। हाल ही में उनकी शादी हुई है और अब वे परिवार और नौकरी दोनों जिम्मेदारियां निभा रही हैं। उनका कहना है कि जिम्मेदारियां बढ़ने के साथ चुनौतियां भी बढ़ गई हैं।
शताब्दी और वंदे भारत चलाने का सपना
झांसी की रहने वाली काजल शाक्या इस समय भुसावल में सहायक लोको पायलट का प्रशिक्षण ले रही हैं। काजल बताती हैं कि बड़ी बहन के प्रोत्साहन से वह इस मुकाम तक पहुंची हैं। उनका सपना शताब्दी और वंदे भारत जैसी ट्रेनों को चलाने का है। उनका कहना है कि हजारों यात्रियों को उनके गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचाना उनके लिए गर्व और देश सेवा का अवसर है।