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स्टेरॉयड के अंधाधुंध इस्तेमाल से झांसी, ललितपुर में 2500 को हुआ ग्लूकोमा
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झांसी। स्ट्रेरॉयड युक्त आई ड्रॉप के अंधाधुंध इस्तेमाल की वजह से इस साल झांसी और ललितपुर में ढाई हजार लोग ग्लूकोमा यानी काला पानी का शिकार हो गए हैं। ये मरीज बिना किसी नेत्र रोग विशेषज्ञ की सलाह के केमिस्ट से दवा लेकर आंखों में डालते रहे। तात्कालिक आराम तो मिला मगर लंबे समय तक इसका इस्तेमाल करने से इनकी आंखों की रोशनी चली गई।
आंखों में खुजली, दर्द, पानी आना, जलन, लाल होना आम बात है। लेकिन इन छोटी सी दिक्कतों का इलाज कराने में लापरवाही बरतना भारी पड़ सकता है। बताया गया कि बिना चिकित्सीय परामर्श के सीधे मेडिकल स्टोर से दवा लेना घातक हो सकता है। किसी भी प्रकार की दिक्कत बताने पर केमिस्ट एंटीबायोटिक और स्टेरायड का मिश्रण वाली आई ड्रॉप दे देते हैं। इससे तुरंत तो आराम मिल जाता है। नेत्र रोग विशेषज्ञ के मुताबिक स्टेरायड किसी भी बीमारी की शुरूआत में तो आराम देता है। मगर लंबे समय तक इसका इस्तेमाल करने से आंख में बनने वाले द्रव्य का दबाव बढ़ जाता है।
जब आंख के अंदर प्रेशर ज्यादा होता है तो इसकी नसों को ब्लड सप्लाई नहीं मिल पाती है। नस सूख जाती है। फिर दिखना बंद हो जाता है। एक बार नस सूख गई तो फिर कोई इलाज नहीं है। रोशनी कभी वापस नहीं आती है। चूंकि, झांसी में लगभग दस बड़े नेत्र चिकित्सक हैं। इनके पास ललितपुर के भी मरीज इलाज कराने के लिए आते हैं। नेत्र रोग विशेषज्ञों ने बताया कि हर महीने करीब 50 मरीज ग्लूकोमा के आते हैं। इसमें 25 नए रोगी होती हैं। इस हिसाब से पिछले एक साल में झांसी और ललितपुर के लगभग 2500 लोग ग्लूकोमा की चपेट में आ चुके हैं।
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40 की उम्र के बाद सालाना कराएं जांच
ग्लूकोमा सामान्यता 40 की उम्र के बाद होता है। जिन्हें आनुवंशिक तौर पर ये बीमारी मिलती है, उनमें भी इसके लक्षण इस उम्र के बार दिखने लगते हैं। ऐेसे में 40 की आयु के बाद साल में एक बार ग्लूकोमा की जांच करा लेनी चाहिए।
बच्चा तकिया से सिर छुपाए तो ठीक नहीं
डॉक्टरों ने बताया कि कई बच्चे पेट से ही ये बीमारी लेकर आते हैं। यदि किसी बच्चे को रोशनी में देखने में परेशानी होती है तो वो तकिया आदि से अपना सिर छुपाने लगता है। यदि आपका बच्चा ऐसा करता हो तो तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ से मिलें।
ये हैं लक्षण
- धुंधला दिखना
- आंख में असहनीय दर्द होना
- इंद्रधनुष की तरह रंगीन घेरे दिखना
- चश्मे का नंबर बार-बार बदलना
- सामने देखने पर अलग-बगल का कुछ नहीं दिखना
ये भी हैं ग्लूकोमा के कारण
- डायबिटीज
- आनुवंशिक
- जन्मजात
- आंख में बॉल आदि से चोट लगना
- चश्मे का नंबर ज्यादा होना (मायोपिया)
आंख से जुड़ी किसी भी समस्या होने पर चिकित्सीय परामर्श लें। सीधे केमिस्ट से दवा न लें। वरना ग्लूकोमा हो सकता है। साल भर में 500 ग्लूकोमा के मरीज आए हैं। इसमें 250 नए मामले हैं। बिना चिकित्सीय परामर्श के स्टेरॉयड युक्त आई ड्राप के इस्तेमाल से ग्लूकोमा के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। - डॉ. शमी, नेत्र रोग विशेषज्ञ।
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आंखों में खुजली, दर्द, पानी आना, जलन, लाल होना आम बात है। लेकिन इन छोटी सी दिक्कतों का इलाज कराने में लापरवाही बरतना भारी पड़ सकता है। बताया गया कि बिना चिकित्सीय परामर्श के सीधे मेडिकल स्टोर से दवा लेना घातक हो सकता है। किसी भी प्रकार की दिक्कत बताने पर केमिस्ट एंटीबायोटिक और स्टेरायड का मिश्रण वाली आई ड्रॉप दे देते हैं। इससे तुरंत तो आराम मिल जाता है। नेत्र रोग विशेषज्ञ के मुताबिक स्टेरायड किसी भी बीमारी की शुरूआत में तो आराम देता है। मगर लंबे समय तक इसका इस्तेमाल करने से आंख में बनने वाले द्रव्य का दबाव बढ़ जाता है।
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जब आंख के अंदर प्रेशर ज्यादा होता है तो इसकी नसों को ब्लड सप्लाई नहीं मिल पाती है। नस सूख जाती है। फिर दिखना बंद हो जाता है। एक बार नस सूख गई तो फिर कोई इलाज नहीं है। रोशनी कभी वापस नहीं आती है। चूंकि, झांसी में लगभग दस बड़े नेत्र चिकित्सक हैं। इनके पास ललितपुर के भी मरीज इलाज कराने के लिए आते हैं। नेत्र रोग विशेषज्ञों ने बताया कि हर महीने करीब 50 मरीज ग्लूकोमा के आते हैं। इसमें 25 नए रोगी होती हैं। इस हिसाब से पिछले एक साल में झांसी और ललितपुर के लगभग 2500 लोग ग्लूकोमा की चपेट में आ चुके हैं।
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40 की उम्र के बाद सालाना कराएं जांच
ग्लूकोमा सामान्यता 40 की उम्र के बाद होता है। जिन्हें आनुवंशिक तौर पर ये बीमारी मिलती है, उनमें भी इसके लक्षण इस उम्र के बार दिखने लगते हैं। ऐेसे में 40 की आयु के बाद साल में एक बार ग्लूकोमा की जांच करा लेनी चाहिए।
बच्चा तकिया से सिर छुपाए तो ठीक नहीं
डॉक्टरों ने बताया कि कई बच्चे पेट से ही ये बीमारी लेकर आते हैं। यदि किसी बच्चे को रोशनी में देखने में परेशानी होती है तो वो तकिया आदि से अपना सिर छुपाने लगता है। यदि आपका बच्चा ऐसा करता हो तो तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ से मिलें।
ये हैं लक्षण
- धुंधला दिखना
- आंख में असहनीय दर्द होना
- इंद्रधनुष की तरह रंगीन घेरे दिखना
- चश्मे का नंबर बार-बार बदलना
- सामने देखने पर अलग-बगल का कुछ नहीं दिखना
ये भी हैं ग्लूकोमा के कारण
- डायबिटीज
- आनुवंशिक
- जन्मजात
- आंख में बॉल आदि से चोट लगना
- चश्मे का नंबर ज्यादा होना (मायोपिया)
आंख से जुड़ी किसी भी समस्या होने पर चिकित्सीय परामर्श लें। सीधे केमिस्ट से दवा न लें। वरना ग्लूकोमा हो सकता है। साल भर में 500 ग्लूकोमा के मरीज आए हैं। इसमें 250 नए मामले हैं। बिना चिकित्सीय परामर्श के स्टेरॉयड युक्त आई ड्राप के इस्तेमाल से ग्लूकोमा के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। - डॉ. शमी, नेत्र रोग विशेषज्ञ।