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गरिमा व सौरभ से मिल परिजनों की खुशी से छलक उठी आंखे
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खेतासराय में यूक्रेन से लौटी छात्रा गरिमा पांडेय परिजनों के साथ। संवाद
- फोटो : JAUNPUR
जलालपुर/खेतासराय। यूक्रेन में फंसी मेडिकल की छात्रा गरिमा पांडेय व छात्रा सौरभ शनिवार की रात अपने घर पहुंचे, जिस देख दोनों के परिजनों की खुुुशी से आंखें छलक उठीं। वहीं, दोनों अपने परिजनों से मिलकर बहुत खुश दिखे। परिजनों ने उनका माला पहना कर स्वागत किया। साथ ही उनको सुरक्षित घर पहुंचने के लिए उनके माता और पिता ने भारत सरकार के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया है।
खेतासराय क्षेत्र के शाहापुर गांव निवासी छात्रा गरिमा पांडेय के पिता डाक्टर गजेंद्र पांडेय और माता माता रंजना पांडेय है। वह रूस के हमले के बाद यूक्रेन की हालत बताते हुए कही कि वह यूक्रेन के डेनिपरो में एमबीबीएस चतुर्थ वर्ष की छात्रा है। यूक्रेन में युद्घ से हालात खराब होने पर 4 मार्च की फ्लाइट भी बुक कर ली थी, लेकिन रूस की ओर से बमबारी शुरू होने के कारण सभी फ्लाइट बंद हो गई। फिर एंबेसी ने छात्रों को अपने साधन से बार्डर पहुंचने की एडवाजरी जारी की, जिसके बाद हमलोग डेनिपरों से रोमानिया बार्डर तक अपने खर्चे से बस से पहुंचे। वहां शेल्टर होम में रखा गया। शुक्रवार की रात दिल्ली पहुचे। वहां से बाबतपुर होते हुए घर पहुँचे । रोमानिया बार्डर से घर तक सारे खर्चे भारतीय दूतावास ने उठाए । छात्रा ने बताया कि घर पहुंचने के बाद परिजनों से मिलकर बहुत खुश हैं, लेकिन भविष्य को लेकर चिंता भी है। दो वर्ष कोर्स पूरा होने में बचा है। बाकी का कोर्स कहां पूरा होगा ।युद्ध कब समाप्त होगा। यह सब अनिश्चितता बनी हुई है। जलालपुर चौराहा निवासी यूक्रेन में फंसे सौरभ यादव शनिवार को घर पहुंचे, जिसके बाद परिजन काफी खुश हुए और आसपास के लोगों में मिठाई बाटी। सौरभ ने यूक्रेन की हालत बताते हुआ कहा कि वहां की सड़कों पर सायरन व बमबारी की आवाज अभी भी उसके कानों में गूंज रही है।हम अगस्त 2021 में यूक्रेन के यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस की पढ़ाई करने गए थे, जहां बिनिसा के मेडिकल यूनिवर्सिटी में दाखिला लेकर सेकंड ईयर की पढ़ाई कर रहा था, जब 24 फरवरी को रूस ने पहला बंब यूक्रेन में गिराया गया तो हम लोग काफी भयभीत हो गए। बम गिरते ही हॉस्टल की कॉलिंग बेल बजी। हम लोगों को फर्स्ट फ्लोर से बुलाकर तुरंत ग्राउंड फ्लोर पर चले जाने का निर्देश दिया गया। हम लोग दो दिन भय में व्यतीत करने के बाद जिनके माध्यम से हम यूनिवर्सिटी में दाखिला लिए थे। वे बस की व्यवस्था कर यूनिवर्सिटी के सभी बच्चों को रोमानिया बॉर्डर भेज दिया। बस बॉर्डर से 8 किमी पहले ही भीड़ की वजह से उतार दिया। दो घंटे पैदल चलकर हम लोग बॉर्डर पहुंचे। वहां हम लोगों को कोई सुनने वाला नहीं था । दो दिन तक हम लोग बड़े ही मुश्किल से बिस्कुट और पानी पीकर समय गुजारा। माइनस 5 डिग्री तापमान में खुले आसमान के नीचे रहना पड़ा। ठंड अधिक होने की वजह से हम लोगों के साथ रह रहे 7 से 8 बच्चे बीमार होकर बेहोश हो जाते थे, जिन्हें एंबुलेंस आती थी और नजदीकी अस्पताल में ले जाकर उपचार कराकर पुन: बॉर्डर पर छोड़ जाती थी। 28 फरवरी को हम लोग रोमानिया में प्रवेश किए, जहां एमबीसी की ओर से सारी व्यवस्थाएं दी गई। शेल्टर होम में रहने से लेकर खाने-पीने की सुविधाएं अच्छी मिलने लगी। 4 दिन बाद हम लोगों को फ्लाइट का टिकट देकर दिल्ली भेजा गया। शनिवार को रात हम लोग दिल्ली पहुंचे हैं। वहां से हमारे बुआ और फूफा पहुंचकर हमें रिसीव कर 3 घंटे बाद बाबतपुर की फ्लाइट पर बैठा दिया, जिसके बाद हम घर पहुंच पाए।
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खेतासराय क्षेत्र के शाहापुर गांव निवासी छात्रा गरिमा पांडेय के पिता डाक्टर गजेंद्र पांडेय और माता माता रंजना पांडेय है। वह रूस के हमले के बाद यूक्रेन की हालत बताते हुए कही कि वह यूक्रेन के डेनिपरो में एमबीबीएस चतुर्थ वर्ष की छात्रा है। यूक्रेन में युद्घ से हालात खराब होने पर 4 मार्च की फ्लाइट भी बुक कर ली थी, लेकिन रूस की ओर से बमबारी शुरू होने के कारण सभी फ्लाइट बंद हो गई। फिर एंबेसी ने छात्रों को अपने साधन से बार्डर पहुंचने की एडवाजरी जारी की, जिसके बाद हमलोग डेनिपरों से रोमानिया बार्डर तक अपने खर्चे से बस से पहुंचे। वहां शेल्टर होम में रखा गया। शुक्रवार की रात दिल्ली पहुचे। वहां से बाबतपुर होते हुए घर पहुँचे । रोमानिया बार्डर से घर तक सारे खर्चे भारतीय दूतावास ने उठाए । छात्रा ने बताया कि घर पहुंचने के बाद परिजनों से मिलकर बहुत खुश हैं, लेकिन भविष्य को लेकर चिंता भी है। दो वर्ष कोर्स पूरा होने में बचा है। बाकी का कोर्स कहां पूरा होगा ।युद्ध कब समाप्त होगा। यह सब अनिश्चितता बनी हुई है। जलालपुर चौराहा निवासी यूक्रेन में फंसे सौरभ यादव शनिवार को घर पहुंचे, जिसके बाद परिजन काफी खुश हुए और आसपास के लोगों में मिठाई बाटी। सौरभ ने यूक्रेन की हालत बताते हुआ कहा कि वहां की सड़कों पर सायरन व बमबारी की आवाज अभी भी उसके कानों में गूंज रही है।हम अगस्त 2021 में यूक्रेन के यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस की पढ़ाई करने गए थे, जहां बिनिसा के मेडिकल यूनिवर्सिटी में दाखिला लेकर सेकंड ईयर की पढ़ाई कर रहा था, जब 24 फरवरी को रूस ने पहला बंब यूक्रेन में गिराया गया तो हम लोग काफी भयभीत हो गए। बम गिरते ही हॉस्टल की कॉलिंग बेल बजी। हम लोगों को फर्स्ट फ्लोर से बुलाकर तुरंत ग्राउंड फ्लोर पर चले जाने का निर्देश दिया गया। हम लोग दो दिन भय में व्यतीत करने के बाद जिनके माध्यम से हम यूनिवर्सिटी में दाखिला लिए थे। वे बस की व्यवस्था कर यूनिवर्सिटी के सभी बच्चों को रोमानिया बॉर्डर भेज दिया। बस बॉर्डर से 8 किमी पहले ही भीड़ की वजह से उतार दिया। दो घंटे पैदल चलकर हम लोग बॉर्डर पहुंचे। वहां हम लोगों को कोई सुनने वाला नहीं था । दो दिन तक हम लोग बड़े ही मुश्किल से बिस्कुट और पानी पीकर समय गुजारा। माइनस 5 डिग्री तापमान में खुले आसमान के नीचे रहना पड़ा। ठंड अधिक होने की वजह से हम लोगों के साथ रह रहे 7 से 8 बच्चे बीमार होकर बेहोश हो जाते थे, जिन्हें एंबुलेंस आती थी और नजदीकी अस्पताल में ले जाकर उपचार कराकर पुन: बॉर्डर पर छोड़ जाती थी। 28 फरवरी को हम लोग रोमानिया में प्रवेश किए, जहां एमबीसी की ओर से सारी व्यवस्थाएं दी गई। शेल्टर होम में रहने से लेकर खाने-पीने की सुविधाएं अच्छी मिलने लगी। 4 दिन बाद हम लोगों को फ्लाइट का टिकट देकर दिल्ली भेजा गया। शनिवार को रात हम लोग दिल्ली पहुंचे हैं। वहां से हमारे बुआ और फूफा पहुंचकर हमें रिसीव कर 3 घंटे बाद बाबतपुर की फ्लाइट पर बैठा दिया, जिसके बाद हम घर पहुंच पाए।
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